टेसला ड्राइवरलेस कार से चलने वाले फर्जी IAS की कुंडली:14 साल से चला रहा ठगी का नेटवर्क, अमेरिका-कनाडा से ट्रांजेक्शन; 5 Apple फोन और iPad खोलेगा राज

टेसला ड्राइवरलेस कार से चलने वाले फर्जी IAS की कुंडली:14 साल से चला रहा ठगी का नेटवर्क, अमेरिका-कनाडा से ट्रांजेक्शन; 5 Apple फोन और iPad खोलेगा राज

बिहार के खगड़िया से पकड़ा गया फर्जी IAS 100 करोड़ का मालिक मनीष कुमार गुप्ता लगातार अपने ही कारनामों में फंसता जा रहा है। सोमवार की रात उसके घर से एक कछुआ भी बरामद किया गया है, जिसकी कीमत लाखों में बताई जा रही है। मनीष कुमार को सरकारी अफसर बनने का ऐसा रौब चढ़ा कि उसने अपने गाड़ियों पर ‘GOVT OF INDIA’ का बोर्ड, खुद को IAS बताने का दावा और पूछताछ में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का अंडरकवर एजेंट तक बता दिया। पुलिस ने जब इस फर्जी IAS के घर की तलाशी ली तो वहां से 5 एप्पल फोन, मैकबुक, iPad, 4 TB की हार्ड डिस्क, 20 क्रेडिट कार्ड, 8 डेबिट कार्ड, 4 चेकबुक, एक-एक लाख की कई बोतल विदेशी शराब, बारहसिंगा के दो सींग, एक कछुआ और CCTV का DVR एक साथ मिले हैं। सोमवार को पुलिस ने आरोपी को कोर्ट में पेश किया, जहां थानाध्यक्ष ने इन सारे चीजों की जानकारी दी है। उन्होंने अपने FIR में ये भी बताया है कि आरोपी अपने फोन से लेकर किसी भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का पासवर्ड नहीं बता रहा है, जिसकी वजह से जांच आगे नहीं बढ़ पा रही है। कौन है मनीष कुमार? कैसे करता था ठगी? स्कूल के दोस्तों ने क्या दी जानकारी? इस पूरी खबर में पढ़िए फर्जी IAS मनीष की कहानी, क्लासमेट और पुलिस की जुबानी… पहले फर्जी IAS के घर रेड की तस्वीरें देखिए पढ़ाई में तेज था, फिर दोस्तों से हो गया अलग मनीष के पुराने दोस्त राम (बदला हुआ नाम) ने बताया, खगड़िया के गोगरी के जमालपुर बाजार में मनीष कुमार गुप्ता (41) का जन्म 1975 में हुआ था। इस दौरान उसके पिता स्व.परमेश्वर गुप्ता खगड़िया के केडीएस कॉलेज में हिन्दी के प्रोफेसर थे। इसी वजह से मनीष की शुरुआती पढ़ाई जमालपुर-गोगरी इलाके के सरकारी स्कूल में हुई। 1991 में मैट्रिक के एग्जाम में मनीष ने टॉप किया था। वो बचपन से ही पढ़ाई में तेज था। इंटर तक उसने अपनी पढ़ाई यहीं पर पूरी की। इसके बाद वो आगे की पढ़ाई के लिए अपने बड़े भाई के पास दिल्ली चला गया। दूरी ज्यादा होने की वजह से वो हमलोगों से अलग हो गया। लंबे समय तक उसके बारे में हम सभी दोस्तों में से किसी को उसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। राम ने आगे बताया, करीब 2020 के आसपास मुझे पता चला कि मनीष बड़ा अधिकारी बन गया है। पुराना दोस्त समझकर मैं उससे मिलने पहुंचा, लेकिन मुलाकात के दौरान मनीष ने मुझे अपने कमरे में एंट्री तक नहीं करने दिया। हम दोनों ने बाहर ही खड़े होकर बातचीत की। इस दौरान मनीष ने खुद को गाजियाबाद का DM बताया। बेटे की पैरवी के लिए दो साल चक्कर लगाया, काम नहीं हुआ राम ने आगे बताया, मैं अपने बेटे से जुड़े एक काम की पैरवी के लिए मनीष के पास गया था। मुझे लगा कि बचपन का दोस्त बड़ा अधिकारी है। वो मेरी मदद कर सकता है, लेकिन मैं करीब दो साल तक मनीष के पीछे दौड़ता रहा पर उसने मेरा कोई काम नहीं किया। इसके बाद मैंने उससे मिलना-जुलना छोड़ दिया। उस समय मुझे यह अंदाजा नहीं था कि जिस व्यक्ति को मैं बड़ा सरकारी अधिकारी समझ रहा हूं, उसकी पहचान ही पुलिस जांच में फर्जी निकल सकती है। अब जब मनीष की गिरफ्तारी और पुलिस की कार्रवाई की खबर सामने आई तो पहले मुझे भरोसा नहीं हुआ। बाद में पुलिस के बयान और बरामदगी की जानकारी सामने आने पर मुझे विश्वास हुआ। शिक्षक को भी CBI का नाम लेकर धमकाने का आरोप राम ने मनीष के पुराने व्यवहार का एक और किस्सा बताया है। उसके अनुसार, पूर्व में किसी विवाद को लेकर मध्य विद्यालय जमालपुर कचहरी के एक शिक्षक को मनीष ने दूर से ही अपना ID कार्ड दिखाया था। उसने खुद को CBI से जुड़ा बताते हुए शिक्षक को धमकाने की कोशिश की थी। वहीं, पुलिस के अनुसार, पूछताछ के दौरान आरोपी ने अपने मोबाइल में ऐसा परिचय पत्र दिखाया, जिसमें उसे केंद्रीय सतर्कता आयोग से जुड़ा अधिकारी बताया गया था। उस पर ‘चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर’ जैसे पदनाम भी दर्ज थे। पुलिस ने उसका प्रिंट निकालकर बरामद किया। बता दें कि मनीष 14 सालों से फर्जी IAS बनकर ठगी कर रहा था, लेकिन कहां और कैसे इसकी जानकारी पुलिस खंगाल रही है। इतना ही नहीं वो अमेरिका-कनाडा से ट्रैंजेक्शन भी कर रहा था। सरकारी बोर्ड वाली दो गाड़ियां, एक टेसला भी पुलिस को मनीष की फर्जी पहचान का सबसे बड़ा प्रदर्शन उसकी गाड़ियों पर नजर आया। गोगरी पुलिस को सूचना मिली थी कि जमालपुर में रहने वाला मनीष अपनी गाड़ियों पर ‘GOVT OF INDIA’ का बोर्ड लगाकर खुद को IAS बताता है। सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने 8 अगस्त की रात उसके घर पर छापेमारी की। घर के सामने दो गाड़ियां खड़ी थीं और दोनों पर सरकारी बोर्ड लगा था। पुलिस ने दोनों गाड़ियों को जब्त कर लिया। उपलब्ध रिपोर्टिंग में इनमें एक Tesla को ड्राइवरलेस/सेल्फ-ड्राइविंग कार के तौर पर पेश किया गया है। हालांकि, कार के फीचर या उसकी वास्तविक ड्राइविंग क्षमता को लेकर अलग से टेक्निकल पुष्टि की जानी बाकी है। लेकिन सरकारी बोर्ड लगाकर पर्सनल गाड़ियों को सरकारी पहचान देने की बात पुलिस की जांच का अहम हिस्सा है। 5 एप्पल फोन और iPad में छिपे हो सकते हैं सबसे बड़े सुराग मामले की जांच में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अब इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की हो सकती है। पुलिस ने आरोपी के पास से 5 Apple मोबाइल फोन, MacBook, iPad और 4 TB की हार्ड डिस्क बरामद की है। इन डिवाइस में मौजूद कॉल रिकॉर्ड, चैट, ई-मेल, सोशल मीडिया अकाउंट, फोटो, वीडियो, दस्तावेज और बैंकिंग गतिविधियों से पुलिस को पूरे नेटवर्क की जानकारी मिल सकती है। जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि मनीष किन लोगों से संपर्क में था, किसे खुद को सरकारी अधिकारी बताता था और क्या किसी व्यक्ति से सरकारी काम कराने या अधिकारी तक पहुंच बनाने के नाम पर कोई आर्थिक लेनदेन हुआ था। अगर इन डिवाइस से पुराने चैट या दस्तावेज मिलते हैं तो यह भी पता चल सकता है कि उसने कितने समय से इस पहचान का इस्तेमाल किया। 20 क्रेडिट कार्ड और 8 डेबिट कार्ड ने बढ़ाई जांच तलाशी के दौरान बड़ी संख्या में बैंकिंग दस्तावेज भी मिले हैं। पुलिस ने 20 क्रेडिट कार्ड, 8 डेबिट कार्ड और 4 चेकबुक बरामद किए हैं। कुछ कार्डों पर दूसरे नाम दर्ज होने की बात भी FIR में है। इतनी बड़ी संख्या में बैंकिंग कार्ड मिलने के बाद पुलिस अब इनके खातों और लेनदेन की जांच कर सकती है। किस कार्ड का इस्तेमाल किसने किया, किन खातों से पैसा आया और कहां गया, यह जानकारी बैंक स्टेटमेंट और KYC रिकॉर्ड से सामने आएगी। अगर अलग-अलग नामों से जुड़े कार्डों के इस्तेमाल के सबूत मिलते हैं तो यह जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। अमेरिका-कनाडा से लेनदेन की बात, अभी पुष्टि बाकी मनीष के नेटवर्क से अमेरिका और कनाडा से ट्रांजेक्शन होने की जानकारी भी सामने आई है। हालांकि, उपलब्ध FIR में विदेशी लेनदेन की स्पष्ट पुष्टि दर्ज नहीं है। इसलिए फिलहाल यह पुलिस जांच का विषय है। अगर बैंक खातों की जांच में अमेरिका, कनाडा या किसी अन्य देश से जुड़े लेनदेन मिलते हैं तो पुलिस को यह पता लगाना होगा कि पैसा किसके खाते से आया, किस खाते में गया और उसका उद्देश्य क्या था। विदेशी लेनदेन मिलने की स्थिति में जांच का दायरा स्थानीय स्तर की ठगी से बढ़कर अंतरराष्ट्रीय फाइनेंशियल लेनदेन तक पहुंच सकता है। 14 साल से नेटवर्क चलाने की बात, जांच में खुलेगी सच्चाई स्थानीय स्तर पर यह जानकारी सामने आई है कि मनीष पिछले करीब 14 सालों से फर्जी पहचान के जरिए अपना नेटवर्क चला रहा था। हालांकि, अभी तक पुलिस ने इतने लंबे समय के नेटवर्क की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। यदि यह दावा जांच में सही साबित होता है तो पुलिस को पिछले सालों के उसके संपर्क, संपत्ति, बैंक खातों, मोबाइल नंबरों, वाहनों और दूसरे शहरों में उसकी गतिविधियों की जांच करनी होगी। यह भी पता लगाना जरूरी होगा कि क्या उसने सिर्फ खुद को IAS बताया या कभी CBI, CVC, केंद्रीय मंत्रालय, खुफिया एजेंसी और दूसरे सरकारी संस्थानों के नाम का भी इस्तेमाल किया है। खुद को अजीत डोभाल का अंडरकवर एजेंट बताने का आरोप पुलिस के अनुसार, पूछताछ के दौरान मनीष ने खुद को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का अंडरकवर एजेंट भी बताया। पुलिस ने इस दावे का सत्यापन कराया और इसे प्रथमदृष्टया फर्जी पाया। किसी बड़े सरकारी या सुरक्षा पद से अपना नाम जोड़कर रौब जमाना इस मामले का गंभीर पहलू है। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि मनीष ने यह दावा किन लोगों के सामने किया और क्या इस पहचान का इस्तेमाल किसी काम या आर्थिक लाभ के लिए किया गया। घर से CCTV DVR भी मिला मनीष के घर में CCTV की व्यवस्था भी मिली है। पुलिस ने CCTV का DVR जब्त किया है। इससे घर पर आने-जाने वाले लोगों की पहचान करने में मदद मिल सकती है। अगर DVR में लंबे समय की रिकॉर्डिंग सुरक्षित है तो पुलिस यह पता कर सकती है कि उसके घर पर नियमित रूप से कौन लोग आते थे। इससे कथित नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों तक पहुंचने में भी मदद मिल सकती है। विदेशी शराब, बारहसिंगा के सींग और कछुआ भी बरामद छापेमारी के दौरान पुलिस को 31 लीटर विदेशी शराब भी मिली है। इसके संबंध में अलग से कानूनी कार्रवाई की जा रही है। इसके अलावा बारहसिंगा के दो सींग औक एक कछुआ भी बरामद किया गया है। वन्यजीव से जुड़ी इस बरामदगी की भी जांच की जा रही है। यानी फर्जी IAS की पहचान से शुरू हुई पुलिस की कार्रवाई में एक ही घर से कई तरह की सामग्री बरामद हुई है। पुलिस को सूचना कैसे मिली? गोगरी थानाध्यक्ष सह पुलिस निरीक्षक अरविंद कुमार के अनुसार, 8 अगस्त की शाम पुलिस को सूचना मिली थी कि जमालपुर में रहने वाला मनीष कुमार गुप्ता अपनी गाड़ियों पर ‘GOVT OF INDIA’ का बोर्ड लगाकर खुद को IAS बताता है और लोगों के बीच सरकारी अधिकारी होने की पहचान बनाता है। सूचना वरीय अधिकारियों को देने के बाद पुलिस टीम और DIU की टीम उसके घर पहुंची। देर रात तलाशी की कार्रवाई शुरू की गई। इसी दौरान दोनों गाड़ियों, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, बैंकिंग कार्ड और अन्य सामान को बरामद किया गया। बिहार के खगड़िया से पकड़ा गया फर्जी IAS 100 करोड़ का मालिक मनीष कुमार गुप्ता लगातार अपने ही कारनामों में फंसता जा रहा है। सोमवार की रात उसके घर से एक कछुआ भी बरामद किया गया है, जिसकी कीमत लाखों में बताई जा रही है। मनीष कुमार को सरकारी अफसर बनने का ऐसा रौब चढ़ा कि उसने अपने गाड़ियों पर ‘GOVT OF INDIA’ का बोर्ड, खुद को IAS बताने का दावा और पूछताछ में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का अंडरकवर एजेंट तक बता दिया। पुलिस ने जब इस फर्जी IAS के घर की तलाशी ली तो वहां से 5 एप्पल फोन, मैकबुक, iPad, 4 TB की हार्ड डिस्क, 20 क्रेडिट कार्ड, 8 डेबिट कार्ड, 4 चेकबुक, एक-एक लाख की कई बोतल विदेशी शराब, बारहसिंगा के दो सींग, एक कछुआ और CCTV का DVR एक साथ मिले हैं। सोमवार को पुलिस ने आरोपी को कोर्ट में पेश किया, जहां थानाध्यक्ष ने इन सारे चीजों की जानकारी दी है। उन्होंने अपने FIR में ये भी बताया है कि आरोपी अपने फोन से लेकर किसी भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का पासवर्ड नहीं बता रहा है, जिसकी वजह से जांच आगे नहीं बढ़ पा रही है। कौन है मनीष कुमार? कैसे करता था ठगी? स्कूल के दोस्तों ने क्या दी जानकारी? इस पूरी खबर में पढ़िए फर्जी IAS मनीष की कहानी, क्लासमेट और पुलिस की जुबानी… पहले फर्जी IAS के घर रेड की तस्वीरें देखिए पढ़ाई में तेज था, फिर दोस्तों से हो गया अलग मनीष के पुराने दोस्त राम (बदला हुआ नाम) ने बताया, खगड़िया के गोगरी के जमालपुर बाजार में मनीष कुमार गुप्ता (41) का जन्म 1975 में हुआ था। इस दौरान उसके पिता स्व.परमेश्वर गुप्ता खगड़िया के केडीएस कॉलेज में हिन्दी के प्रोफेसर थे। इसी वजह से मनीष की शुरुआती पढ़ाई जमालपुर-गोगरी इलाके के सरकारी स्कूल में हुई। 1991 में मैट्रिक के एग्जाम में मनीष ने टॉप किया था। वो बचपन से ही पढ़ाई में तेज था। इंटर तक उसने अपनी पढ़ाई यहीं पर पूरी की। इसके बाद वो आगे की पढ़ाई के लिए अपने बड़े भाई के पास दिल्ली चला गया। दूरी ज्यादा होने की वजह से वो हमलोगों से अलग हो गया। लंबे समय तक उसके बारे में हम सभी दोस्तों में से किसी को उसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। राम ने आगे बताया, करीब 2020 के आसपास मुझे पता चला कि मनीष बड़ा अधिकारी बन गया है। पुराना दोस्त समझकर मैं उससे मिलने पहुंचा, लेकिन मुलाकात के दौरान मनीष ने मुझे अपने कमरे में एंट्री तक नहीं करने दिया। हम दोनों ने बाहर ही खड़े होकर बातचीत की। इस दौरान मनीष ने खुद को गाजियाबाद का DM बताया। बेटे की पैरवी के लिए दो साल चक्कर लगाया, काम नहीं हुआ राम ने आगे बताया, मैं अपने बेटे से जुड़े एक काम की पैरवी के लिए मनीष के पास गया था। मुझे लगा कि बचपन का दोस्त बड़ा अधिकारी है। वो मेरी मदद कर सकता है, लेकिन मैं करीब दो साल तक मनीष के पीछे दौड़ता रहा पर उसने मेरा कोई काम नहीं किया। इसके बाद मैंने उससे मिलना-जुलना छोड़ दिया। उस समय मुझे यह अंदाजा नहीं था कि जिस व्यक्ति को मैं बड़ा सरकारी अधिकारी समझ रहा हूं, उसकी पहचान ही पुलिस जांच में फर्जी निकल सकती है। अब जब मनीष की गिरफ्तारी और पुलिस की कार्रवाई की खबर सामने आई तो पहले मुझे भरोसा नहीं हुआ। बाद में पुलिस के बयान और बरामदगी की जानकारी सामने आने पर मुझे विश्वास हुआ। शिक्षक को भी CBI का नाम लेकर धमकाने का आरोप राम ने मनीष के पुराने व्यवहार का एक और किस्सा बताया है। उसके अनुसार, पूर्व में किसी विवाद को लेकर मध्य विद्यालय जमालपुर कचहरी के एक शिक्षक को मनीष ने दूर से ही अपना ID कार्ड दिखाया था। उसने खुद को CBI से जुड़ा बताते हुए शिक्षक को धमकाने की कोशिश की थी। वहीं, पुलिस के अनुसार, पूछताछ के दौरान आरोपी ने अपने मोबाइल में ऐसा परिचय पत्र दिखाया, जिसमें उसे केंद्रीय सतर्कता आयोग से जुड़ा अधिकारी बताया गया था। उस पर ‘चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर’ जैसे पदनाम भी दर्ज थे। पुलिस ने उसका प्रिंट निकालकर बरामद किया। बता दें कि मनीष 14 सालों से फर्जी IAS बनकर ठगी कर रहा था, लेकिन कहां और कैसे इसकी जानकारी पुलिस खंगाल रही है। इतना ही नहीं वो अमेरिका-कनाडा से ट्रैंजेक्शन भी कर रहा था। सरकारी बोर्ड वाली दो गाड़ियां, एक टेसला भी पुलिस को मनीष की फर्जी पहचान का सबसे बड़ा प्रदर्शन उसकी गाड़ियों पर नजर आया। गोगरी पुलिस को सूचना मिली थी कि जमालपुर में रहने वाला मनीष अपनी गाड़ियों पर ‘GOVT OF INDIA’ का बोर्ड लगाकर खुद को IAS बताता है। सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने 8 अगस्त की रात उसके घर पर छापेमारी की। घर के सामने दो गाड़ियां खड़ी थीं और दोनों पर सरकारी बोर्ड लगा था। पुलिस ने दोनों गाड़ियों को जब्त कर लिया। उपलब्ध रिपोर्टिंग में इनमें एक Tesla को ड्राइवरलेस/सेल्फ-ड्राइविंग कार के तौर पर पेश किया गया है। हालांकि, कार के फीचर या उसकी वास्तविक ड्राइविंग क्षमता को लेकर अलग से टेक्निकल पुष्टि की जानी बाकी है। लेकिन सरकारी बोर्ड लगाकर पर्सनल गाड़ियों को सरकारी पहचान देने की बात पुलिस की जांच का अहम हिस्सा है। 5 एप्पल फोन और iPad में छिपे हो सकते हैं सबसे बड़े सुराग मामले की जांच में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अब इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की हो सकती है। पुलिस ने आरोपी के पास से 5 Apple मोबाइल फोन, MacBook, iPad और 4 TB की हार्ड डिस्क बरामद की है। इन डिवाइस में मौजूद कॉल रिकॉर्ड, चैट, ई-मेल, सोशल मीडिया अकाउंट, फोटो, वीडियो, दस्तावेज और बैंकिंग गतिविधियों से पुलिस को पूरे नेटवर्क की जानकारी मिल सकती है। जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि मनीष किन लोगों से संपर्क में था, किसे खुद को सरकारी अधिकारी बताता था और क्या किसी व्यक्ति से सरकारी काम कराने या अधिकारी तक पहुंच बनाने के नाम पर कोई आर्थिक लेनदेन हुआ था। अगर इन डिवाइस से पुराने चैट या दस्तावेज मिलते हैं तो यह भी पता चल सकता है कि उसने कितने समय से इस पहचान का इस्तेमाल किया। 20 क्रेडिट कार्ड और 8 डेबिट कार्ड ने बढ़ाई जांच तलाशी के दौरान बड़ी संख्या में बैंकिंग दस्तावेज भी मिले हैं। पुलिस ने 20 क्रेडिट कार्ड, 8 डेबिट कार्ड और 4 चेकबुक बरामद किए हैं। कुछ कार्डों पर दूसरे नाम दर्ज होने की बात भी FIR में है। इतनी बड़ी संख्या में बैंकिंग कार्ड मिलने के बाद पुलिस अब इनके खातों और लेनदेन की जांच कर सकती है। किस कार्ड का इस्तेमाल किसने किया, किन खातों से पैसा आया और कहां गया, यह जानकारी बैंक स्टेटमेंट और KYC रिकॉर्ड से सामने आएगी। अगर अलग-अलग नामों से जुड़े कार्डों के इस्तेमाल के सबूत मिलते हैं तो यह जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। अमेरिका-कनाडा से लेनदेन की बात, अभी पुष्टि बाकी मनीष के नेटवर्क से अमेरिका और कनाडा से ट्रांजेक्शन होने की जानकारी भी सामने आई है। हालांकि, उपलब्ध FIR में विदेशी लेनदेन की स्पष्ट पुष्टि दर्ज नहीं है। इसलिए फिलहाल यह पुलिस जांच का विषय है। अगर बैंक खातों की जांच में अमेरिका, कनाडा या किसी अन्य देश से जुड़े लेनदेन मिलते हैं तो पुलिस को यह पता लगाना होगा कि पैसा किसके खाते से आया, किस खाते में गया और उसका उद्देश्य क्या था। विदेशी लेनदेन मिलने की स्थिति में जांच का दायरा स्थानीय स्तर की ठगी से बढ़कर अंतरराष्ट्रीय फाइनेंशियल लेनदेन तक पहुंच सकता है। 14 साल से नेटवर्क चलाने की बात, जांच में खुलेगी सच्चाई स्थानीय स्तर पर यह जानकारी सामने आई है कि मनीष पिछले करीब 14 सालों से फर्जी पहचान के जरिए अपना नेटवर्क चला रहा था। हालांकि, अभी तक पुलिस ने इतने लंबे समय के नेटवर्क की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। यदि यह दावा जांच में सही साबित होता है तो पुलिस को पिछले सालों के उसके संपर्क, संपत्ति, बैंक खातों, मोबाइल नंबरों, वाहनों और दूसरे शहरों में उसकी गतिविधियों की जांच करनी होगी। यह भी पता लगाना जरूरी होगा कि क्या उसने सिर्फ खुद को IAS बताया या कभी CBI, CVC, केंद्रीय मंत्रालय, खुफिया एजेंसी और दूसरे सरकारी संस्थानों के नाम का भी इस्तेमाल किया है। खुद को अजीत डोभाल का अंडरकवर एजेंट बताने का आरोप पुलिस के अनुसार, पूछताछ के दौरान मनीष ने खुद को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का अंडरकवर एजेंट भी बताया। पुलिस ने इस दावे का सत्यापन कराया और इसे प्रथमदृष्टया फर्जी पाया। किसी बड़े सरकारी या सुरक्षा पद से अपना नाम जोड़कर रौब जमाना इस मामले का गंभीर पहलू है। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि मनीष ने यह दावा किन लोगों के सामने किया और क्या इस पहचान का इस्तेमाल किसी काम या आर्थिक लाभ के लिए किया गया। घर से CCTV DVR भी मिला मनीष के घर में CCTV की व्यवस्था भी मिली है। पुलिस ने CCTV का DVR जब्त किया है। इससे घर पर आने-जाने वाले लोगों की पहचान करने में मदद मिल सकती है। अगर DVR में लंबे समय की रिकॉर्डिंग सुरक्षित है तो पुलिस यह पता कर सकती है कि उसके घर पर नियमित रूप से कौन लोग आते थे। इससे कथित नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों तक पहुंचने में भी मदद मिल सकती है। विदेशी शराब, बारहसिंगा के सींग और कछुआ भी बरामद छापेमारी के दौरान पुलिस को 31 लीटर विदेशी शराब भी मिली है। इसके संबंध में अलग से कानूनी कार्रवाई की जा रही है। इसके अलावा बारहसिंगा के दो सींग औक एक कछुआ भी बरामद किया गया है। वन्यजीव से जुड़ी इस बरामदगी की भी जांच की जा रही है। यानी फर्जी IAS की पहचान से शुरू हुई पुलिस की कार्रवाई में एक ही घर से कई तरह की सामग्री बरामद हुई है। पुलिस को सूचना कैसे मिली? गोगरी थानाध्यक्ष सह पुलिस निरीक्षक अरविंद कुमार के अनुसार, 8 अगस्त की शाम पुलिस को सूचना मिली थी कि जमालपुर में रहने वाला मनीष कुमार गुप्ता अपनी गाड़ियों पर ‘GOVT OF INDIA’ का बोर्ड लगाकर खुद को IAS बताता है और लोगों के बीच सरकारी अधिकारी होने की पहचान बनाता है। सूचना वरीय अधिकारियों को देने के बाद पुलिस टीम और DIU की टीम उसके घर पहुंची। देर रात तलाशी की कार्रवाई शुरू की गई। इसी दौरान दोनों गाड़ियों, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, बैंकिंग कार्ड और अन्य सामान को बरामद किया गया।  

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