नालंदा जिले में 355 नलकूपों में से सिर्फ 196 चालू:12 करोड़ की योजना भी फाइलों में दफन, धान की खेती से पहले किसानों की बढ़ी परेशानी

नालंदा जिले में 355 नलकूपों में से सिर्फ 196 चालू:12 करोड़ की योजना भी फाइलों में दफन, धान की खेती से पहले किसानों की बढ़ी परेशानी

जून का पहला सप्ताह बीतने को है और खरीफ अर्थात धान की खेती का सीजन सिर पर है। इसके बावजूद नालंदा जिले के खेतों की प्यास बुझाने वाला सिंचाई सिस्टम खुद ‘सूखा’ पड़ा है। नदियां और आहर-पइन धूल फांक रहे हैं। करोड़ों की लागत से लगे राजकीय नलकूप कबाड़ में तब्दील हो चुके हैं। स्थिति यह है कि जिले के विभिन्न प्रखंडों में मौजूद कुल 355 राजकीय नलकूपों में से मात्र 196 ही वर्तमान में चालू अवस्था में हैं। बिना पानी के धान का बिचड़ा कैसे तैयार होगा, इस चिंता ने अन्नदाताओं की नींद उड़ा दी है। मजबूरन किसानों को महंगे किराए पर निजी नलकूपों के भरोसे खेती करनी पड़ रही है, जिससे उन पर बिजली बिल और सिंचाई का आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। मामूली गड़बड़ी के बाद भी पंचायत प्रतिनिधियों की चुप्पी जिले में 159 राजकीय नलकूप पूरी तरह से खराब पड़े हैं। विभागीय जांच के अनुसार, इनमें से 43 में यांत्रिक दोष, 6 में विद्युत दोष, 93 में संयुक्त दोष और 17 नलकूप अन्य कारणों से बंद पड़े हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इनमें से 60 से ज्यादा नलकूप ऐसे हैं, जिनमें महज मामूली फॉल्ट है। अगर मुखिया या पंचायत प्रतिनिधि चाहते तो इन्हें तुरंत ठीक करा सकते थे, लेकिन कई वर्षों से इन्हें लावारिस छोड़ दिया गया है। ज्ञात हो कि एक नलकूप चालू रहने से करीब 20 हेक्टेयर खेतों का पटवन होता है। अगर ये सभी बंद पड़े नलकूप चालू रहते, तो जिले के करीब 3180 हेक्टेयर खेतों की सिंचाई आसानी से हो सकती थी। एकंगरसराय प्रखंड की स्थिति सबसे खराब लघु जल संसाधन विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो सबसे खराब हालत एकंगरसराय प्रखंड की है, जहां सबसे अधिक 25 नलकूप खराब पड़े हैं और महज 13 ही काम कर रहे हैं। इसी तरह इस्लामपुर में 31 में से 19 नलकूप कबाड़ बन चुके हैं, जबकि अस्थावां में 30 में से 21 नलकूप पूरी तरह बेकार हैं। सरमेरा प्रखंड में भी स्थिति बेहद दयनीय है, जहां महज चार नलकूप ही किसी तरह सांस ले रहे हैं। निजी बोरिंग के भरोसे किसान, बढ़ रही खेती की लागत सिंचाई की मुकम्मल व्यवस्था न होने से किसान परेशान हैं। सरदार बिगहा के धनंजय कुमार, नूरसराय के संजीत कुमार और चंडी के निरंजन कुमार जैसे कई किसानों का दर्द है कि मानसून का अब तक अता-पता नहीं है। जो छोटे किसान हैं और जिनके पास अपनी निजी बोरिंग नहीं है, वे महंगे किराये पर दूसरों से पानी खरीदने को मजबूर हैं। इसका सीधा असर खेती की लागत पर पड़ रहा है। फाइलों में दफन है 235 नए नलकूपों की योजना सिंचाई व्यवस्था को लेकर लापरवाही का आलम यह है कि 235 नए राजकीय नलकूप स्थापित करने की योजना सात साल बाद भी धरातल पर नहीं उतर सकी है। विभाग ने वित्तीय वर्ष 2019-20 में इन नलकूपों के लिए पहली किस्त जारी की थी। इसके बाद 2021-22, 2022-23 और 2023-24 में दूसरी और तीसरी किस्त के तौर पर 12 करोड़ रुपए से अधिक की भारी-भरकम राशि पंचायतों को दे दी गई। इतनी बड़ी सरकारी राशि जारी होने के बाद भी अधिकांश नए नलकूप चालू नहीं हो सके हैं। विभाग बार-बार नोटिस देकर राशि का हिसाब मांग रहा है, इसके बावजूद मुखिया हिसाब नहीं दे रहे हैं। पंचायत प्रतिनिधि सरकारी खजाने पर कुंडली मारकर बैठे हुए हैं। अधिकारियों का पक्ष- पंचायतों को राशि दी गई है लघु जल संसाधन विभाग के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर उमाशंकर कुमार ने बताया कि नए नलकूपों के अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिए पंचायतों को राशि दी जा चुकी है। पंचायत प्रतिनिधि काम कराने में कम रुचि ले रहे हैं, जिससे योजना को धरातल पर उतारने में परेशानी आ रही है। प्रतिनिधियों से जल्द से जल्द नलकूप चालू करने का अनुरोध किया गया है। जून का पहला सप्ताह बीतने को है और खरीफ अर्थात धान की खेती का सीजन सिर पर है। इसके बावजूद नालंदा जिले के खेतों की प्यास बुझाने वाला सिंचाई सिस्टम खुद ‘सूखा’ पड़ा है। नदियां और आहर-पइन धूल फांक रहे हैं। करोड़ों की लागत से लगे राजकीय नलकूप कबाड़ में तब्दील हो चुके हैं। स्थिति यह है कि जिले के विभिन्न प्रखंडों में मौजूद कुल 355 राजकीय नलकूपों में से मात्र 196 ही वर्तमान में चालू अवस्था में हैं। बिना पानी के धान का बिचड़ा कैसे तैयार होगा, इस चिंता ने अन्नदाताओं की नींद उड़ा दी है। मजबूरन किसानों को महंगे किराए पर निजी नलकूपों के भरोसे खेती करनी पड़ रही है, जिससे उन पर बिजली बिल और सिंचाई का आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। मामूली गड़बड़ी के बाद भी पंचायत प्रतिनिधियों की चुप्पी जिले में 159 राजकीय नलकूप पूरी तरह से खराब पड़े हैं। विभागीय जांच के अनुसार, इनमें से 43 में यांत्रिक दोष, 6 में विद्युत दोष, 93 में संयुक्त दोष और 17 नलकूप अन्य कारणों से बंद पड़े हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इनमें से 60 से ज्यादा नलकूप ऐसे हैं, जिनमें महज मामूली फॉल्ट है। अगर मुखिया या पंचायत प्रतिनिधि चाहते तो इन्हें तुरंत ठीक करा सकते थे, लेकिन कई वर्षों से इन्हें लावारिस छोड़ दिया गया है। ज्ञात हो कि एक नलकूप चालू रहने से करीब 20 हेक्टेयर खेतों का पटवन होता है। अगर ये सभी बंद पड़े नलकूप चालू रहते, तो जिले के करीब 3180 हेक्टेयर खेतों की सिंचाई आसानी से हो सकती थी। एकंगरसराय प्रखंड की स्थिति सबसे खराब लघु जल संसाधन विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो सबसे खराब हालत एकंगरसराय प्रखंड की है, जहां सबसे अधिक 25 नलकूप खराब पड़े हैं और महज 13 ही काम कर रहे हैं। इसी तरह इस्लामपुर में 31 में से 19 नलकूप कबाड़ बन चुके हैं, जबकि अस्थावां में 30 में से 21 नलकूप पूरी तरह बेकार हैं। सरमेरा प्रखंड में भी स्थिति बेहद दयनीय है, जहां महज चार नलकूप ही किसी तरह सांस ले रहे हैं। निजी बोरिंग के भरोसे किसान, बढ़ रही खेती की लागत सिंचाई की मुकम्मल व्यवस्था न होने से किसान परेशान हैं। सरदार बिगहा के धनंजय कुमार, नूरसराय के संजीत कुमार और चंडी के निरंजन कुमार जैसे कई किसानों का दर्द है कि मानसून का अब तक अता-पता नहीं है। जो छोटे किसान हैं और जिनके पास अपनी निजी बोरिंग नहीं है, वे महंगे किराये पर दूसरों से पानी खरीदने को मजबूर हैं। इसका सीधा असर खेती की लागत पर पड़ रहा है। फाइलों में दफन है 235 नए नलकूपों की योजना सिंचाई व्यवस्था को लेकर लापरवाही का आलम यह है कि 235 नए राजकीय नलकूप स्थापित करने की योजना सात साल बाद भी धरातल पर नहीं उतर सकी है। विभाग ने वित्तीय वर्ष 2019-20 में इन नलकूपों के लिए पहली किस्त जारी की थी। इसके बाद 2021-22, 2022-23 और 2023-24 में दूसरी और तीसरी किस्त के तौर पर 12 करोड़ रुपए से अधिक की भारी-भरकम राशि पंचायतों को दे दी गई। इतनी बड़ी सरकारी राशि जारी होने के बाद भी अधिकांश नए नलकूप चालू नहीं हो सके हैं। विभाग बार-बार नोटिस देकर राशि का हिसाब मांग रहा है, इसके बावजूद मुखिया हिसाब नहीं दे रहे हैं। पंचायत प्रतिनिधि सरकारी खजाने पर कुंडली मारकर बैठे हुए हैं। अधिकारियों का पक्ष- पंचायतों को राशि दी गई है लघु जल संसाधन विभाग के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर उमाशंकर कुमार ने बताया कि नए नलकूपों के अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिए पंचायतों को राशि दी जा चुकी है। पंचायत प्रतिनिधि काम कराने में कम रुचि ले रहे हैं, जिससे योजना को धरातल पर उतारने में परेशानी आ रही है। प्रतिनिधियों से जल्द से जल्द नलकूप चालू करने का अनुरोध किया गया है।  

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