Otzi the Iceman: इटैलियन आल्प्स की बर्फीली पहाड़ियों में 5,300 वर्ष पहले तीर से मारे गए गए प्रागैतिहासिक मानव ‘ओत्जी द आइसमैन’ को लेकर एक नई खोज ने वैज्ञानिकों को चौंका दिया है। जर्नल ‘माइक्रोबायोम’ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार म्यूजियम में जिस डीप-फ्रीज चैंबर को माइनस छह डिग्री सेल्सियस तापमान पर इसलिए बनाया गया था ताकि समय के चक्र को पूरी तरह रोका जा सके, वहां ओत्जी के भीतर मौजूद सूक्ष्मजीव न सिर्फ जिंदा हैं बल्कि बदलते माहौल के अनुसार खुद को ढालकर तेजी से विकसित हो रहे हैं।
आखिरी भोजन का सुराग अब भी मौजूद
यूराक रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने ममी की त्वचा, आंतरिक ऊतकों और उसके आसपास के पिघले पानी का विश्लेषण किया। विश्लेषण के दौरान उन्हें ऐसे बैक्टीरिया मिले जिनकी गतिविधियां ओत्जी के अंतिम भोजन से मेल खाती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार उसके पेट में वसायुक्त जंगली मांस, प्राचीन अनाज और एक जहरीले फर्न पौधे के अवशेषों के संकेत अब भी संरक्षित हैं।
आधुनिक इंसानों से गायब हो चुके जीवाणु
वैज्ञानिकों को ममी के भीतर रोमबोट्सिया होमिनिस और क्लोस्ट्रीडियम मोनिलिफॉर्म जैसी दुर्लभ जीवाणु प्रजातियां मिली हैं। ये बैक्टीरिया आज के अधिकांश शहरी लोगों के माइक्रोबायोम से लगभग गायब हो चुके हैं, हालांकि अफ्रीका और दक्षिण अमरीका के कुछ पारंपरिक आदिवासी समुदायों में अब भी पाए जाते हैं।
कीटाणुनाशक खाकर जिंदा है ‘सुपर-यीस्ट’
सबसे हैरान करने वाली खोज ममी के भीतर मौजूद यीस्ट से जुड़ी है। पिछले नौ वर्षों में इसकी संख्या बढ़ी है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये सूक्ष्मजीव ममी को सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले फिनोल-आधारित कीटाणुनाशकों को ही भोजन की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। यानी संरक्षण के लिए डाले गए रसायन ही इनके जीवित रहने का साधन बन गए हैं।
संग्रहालयों के लिए नई चुनौती
वैज्ञानिकों की यह खोज बताती है कि सूक्ष्मजीव बेहद कठोर परिस्थितियों में भी जीवित रह सकते हैं और आधुनिक रसायनों के अनुकूल भी हो सकते हैं। इससे दुनिया भर के संग्रहालयों और पुरातत्वविदों के सामने नया सवाल खड़ा हो गया है यदि ऐसे सूक्ष्मजीव हजारों साल पुरानी धरोहरों के भीतर सक्रिय रह सकते हैं, तो ऐतिहासिक विरासतों को लंबे समय तक सुरक्षित कैसे रखा जाए?


