संपादकीय: राजनीतिक दलों को आत्ममंथन की जरूरत

संपादकीय: राजनीतिक दलों को आत्ममंथन की जरूरत

राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए आज के दौर में विचारधारा, सिद्धांत और अनुशासन के मुकाबले क्या सत्ता अधिक महत्त्वपूर्ण हो चली है? मतलब सत्ता होती है तो नेताओं के लिए विचारधारा और अनुशासन के कुछ मायने होते हैं और सत्ता गई तो उन्हें न चिंता विचारधारा की रहती है और न अनुशासन की। पश्चिम बंगाल में चुनाव हारते ही तृणमूल कांग्रेस में आज बगावत की जो चिंगारी सुलग रही है वह कहीं सत्ता जाने की वजह से तो नहीं है?

बीते 15 साल से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज रही तृणमूल कांग्रेस को छिटपुट विद्रोह का सामना तो एकाध बार करना पड़ा लेकिन पार्टी के भीतर अब जो हो रहा है, वह खुली बगावत की तरह है। पहले पार्टी सांसदों ने पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोला तो अब विधायक बगावत पर उतर आए हैं। ये बगावत शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की तरह होगी या नहीं, कहना अभी मुश्किल है, लेकिन एक महीने पहले पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीतकर विधायक बनने वाले नेताओं में एकाएक पार्टी नेतृत्व में खामियां नजर क्यों आने लगी हैं? क्या ऐसे नेता पार्टी से किनारा करके सत्तारूढ़ भाजपा के पाले में जाने की भूमिका बना रहे हैं? महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले सालों शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में जिस तरह बगावत हुई थी, उसने राजनीतिक पर्यवेक्षकों को हैरत में डाल दिया था। उद्धव ठाकरे और शरद पवार सरीखे बड़े नेताओं को छोड़कर विधायकों ने अलग दल बना लिया और जनता का समर्थन भी हासिल कर लिया। बागी विधायकों ने पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न भी हासिल कर लिया। सवाल उठता है कि क्या महाराष्ट्र की राजनीति अब पश्चिम बंगाल में दोहराई जाने वाली है? और अगर महाराष्ट्र की दलबदल वाली राजनीति पश्चिम बंगाल में रंग दिखाती है तो इससे अनेक दूसरे सवाल भी खड़े होंगे। सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता वंशवाद की राजनीति से तंग आ चुके हैं?

महाराष्ट्र में शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने उद्धव ठाकरे को तो नेता माना लेकिन आदित्य ठाकरे का नेतृत्व स्वीकार नहीं किया। शरद पवार का नेतृत्व तो स्वीकार किया लेकिन सुप्रिया सुले का नेतृत्व उन्हें मंजूर नहीं। इसी तरह तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता ममता बनर्जी को तो नेता मानने को तैयार हैं लेकिन अभिषेक बनर्जी का नेतृत्व उन्हें मंजूर नहीं है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल फिर सत्ता में आ जाती तो शायद बगावत का ये खेल शुरू नहीं होता। पार्टी के हार जाने के बाद विधायक और दूसरे नेताओं को पार्टी की बजाय अब अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता सताने लगी है। पश्चिम बंगाल की ताजा राजनीतिक उठापटक भारतीय राजनीति की बदलती प्रवृत्तियों का संकेत भी है। राजनीतिक दलों को समय रहते संगठनात्मक लोकतंत्र को मजबूत करने की जरूरत है।

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