इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और स्त्रीधन हड़पने के मामले में आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग में याचिका को खारिज कर दिया है।
न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने कहा कि धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका पर विचार करते समय अदालत सबूतों की गहन जांच या “मिनी ट्रायल” नहीं कर सकती। अदालत ने माना कि शिकायत में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनाते हैं, इसलिए मामले का परीक्षण ट्रायल कोर्ट में होना चाहिए। जानिये क्या है मामला गाजियाबाद के टीला मोड़ थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। जिसमें पति और सास पर दहेज की मांग, मारपीट, मानसिक उत्पीड़न, स्त्रीधन वापस न करने तथा अन्य गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पीड़िता का कहना था कि विवाह के बाद से उसे लगातार प्रताड़ित किया गया और अंततः घर से निकाल दिया गया। याचियो का कहना था कि एफआईआर झूठी है और वैवाहिक विवाद के कारण प्रतिशोध स्वरूप दर्ज कराई गई है। पीड़िता अपनी इच्छा से घर छोड़कर गई थी और आरोपों में कोई ठोस आधार नहीं है। हालांकि, राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि जांच में जुटाई गई सामग्री आरोपों का समर्थन करती है। अदालत ने कहा कि केवल प्रतिशोध की आशंका के आधार पर एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती और मामले का निर्णय साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल के दौरान ही होगा। हाईकोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगी।


