बालेन शाह के ‘भारत की जमीन पर कब्जा करने’ वाले बयान पर नेपाल में बवाल, विपक्ष ने मांगा इस्तीफा

बालेन शाह के ‘भारत की जमीन पर कब्जा करने’ वाले बयान पर नेपाल में बवाल, विपक्ष ने मांगा इस्तीफा

Encroachment: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह लिपुलेख और कालापानी सीमा विवाद पर अपने ही बयान दिए गए बयान के मामले में बुरी तरह घिर गए हैं। संसद में उनके द्वारा दिए गए अतिक्रमण वाले बयान के बाद पूरे नेपाल में तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। शाह ने दावा किया था कि केवल भारत ने ही नहीं, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर कब्जा किया है। प्रधानमंत्री के मुंह से यह बात निकलते ही नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी समेत तमाम विपक्षी दलों, पूर्व राजनयिकों और सीमा विशेषज्ञों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। देश की जनता और राजनीतिक विश्लेषक इसे कूटनीतिक लिहाज से एक बेहद अपरिपक्व बयान मान रहे हैं, जिससे नेपाल की अपनी ही स्थिति कमजोर हो रही है।

संसदीय रिकॉर्ड से तत्काल हटाने की मांग

बालेन शाह के बयान पर सबसे उग्र प्रतिक्रिया नेपाली संसद में देखने को मिली। नेपाली कांग्रेस की प्रमुख नेता बासना थापा और कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद रमेश मल्ला ने इस बयान पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे संसदीय रिकॉर्ड से तत्काल हटाने की मांग की। विपक्ष ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि प्रधानमंत्री या तो अपने दावे का प्रामाणिक सबूत पेश करें या फिर देश से अपने शब्द वापस लें। बात सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रही; नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने इसे राष्ट्रीय शर्म का विषय बताते हुए पीएम से सार्वजनिक माफी की मांग कर डाली है।

नेपाल द्वारा भारतीय जमीन पर कब्जे का कोई रिकॉर्ड मौजूद ही नहीं

पूर्व नेपाली राजदूत नीलांबर आचार्य और दीप कुमार उपाध्याय ने इस दावे की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि नेपाल द्वारा भारतीय जमीन पर कब्जे का कोई आधिकारिक या ऐतिहासिक रिकॉर्ड मौजूद ही नहीं है। जाने-माने सीमा विशेषज्ञ बुद्धी नारायण श्रेष्ठ ने भी इस बयान को खारिज करते हुए कहा कि किसानों द्वारा की जाने वाली क्रॉस-बॉर्डर खेती को सरकारी अतिक्रमण कहना प्रधानमंत्री की भारी भूल है। सोशल मीडिया पर भी नेपाली जनता पीएम को जमकर ट्रोल कर रही है।

विपक्ष लगातार पीएम के इस्तीफे या माफी पर अड़ा हुआ है

संसद में हुए भारी हंगामे और चौतरफा घिरने के बाद नेपाल सरकार पूरी तरह बैकफुट पर आ गई। विवाद को बढ़ता देख नेपाल के विदेश मंत्रालय को डैमेज कंट्रोल के लिए आगे आना पड़ा। मंत्रालय ने आनन-फानन में एक आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करते हुए सफाई दी कि प्रधानमंत्री का तात्पर्य किसी तरह के ‘आधिकारिक क्षेत्रीय दावे’ या सैन्य कब्जे से बिल्कुल नहीं था। मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि पीएम शाह का आशय केवल ‘नो-मैन्स लैंड’ (दशगजा) क्षेत्रों में सीमा पार आवाजाही और स्थानीय किसानों द्वारा भूलवश एक-दूसरे की जमीन पर की जा रही खेती से था। हालांकि, इस सफाई के बावजूद राजनीतिक गलियारों में तूफान शांत होने का नाम नहीं ले रहा है और विपक्ष लगातार पीएम के इस्तीफे या माफी पर अड़ा हुआ है। इस पूरे राजनीतिक विवाद का एक बड़ा पहलू नेपाल की बदलती कूटनीति और घरेलू राजनीति है।

भारत के साथ सीमा विवाद पर बालेनशाह का रुख घरेलू राजनीति में कमजोर

गौरतलब है कि पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली के कार्यकाल में लिपुलेख और कालापानी विवाद ने जो तूल पकड़ा था, बालेन शाह उसे कूटनीति से सुलझाने का दावा करते हुए सत्ता में आए थे। बालेन खुद को एक बेबाक और कड़क सुधारवादी नेता के तौर पर पेश करते रहे हैं। लेकिन, भारत के साथ इस बेहद संवेदनशील सीमा विवाद पर उनका यह हल्का रुख उन्हें घरेलू राजनीति में कमजोर कर चुका है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि बिना पुख्ता होमवर्क के ऐसा बयान देना बालेन शाह की राजनीतिक अनुभवहीनता को दर्शाता है। इससे न केवल भारत बल्कि चीन के साथ भी नेपाल के कूटनीतिक समीकरणों पर असर पड़ सकता है, क्योंकि नेपाल इसे एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश में था।

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