Breastfeeding Benefits: भारत में 6 महीने तक स्तनपान कराने की दर घटी, बच्चों को हो सकते हैं ये 5 बड़े स्वास्थ्य नुकसान

Breastfeeding Benefits: भारत में 6 महीने तक स्तनपान कराने की दर घटी, बच्चों को हो सकते हैं ये 5 बड़े स्वास्थ्य नुकसान

Breastfeeding Rate in India: देश में नवजात शिशुओं के पोषण और स्वास्थ्य को लेकर एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत में शुरुआती छह महीनों तक शिशुओं को केवल स्तनपान (Exclusive Breastfeeding) कराने की दर में भारी गिरावट दर्ज की गई है।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, जहां साल 2019-21 में छह महीने तक के शिशुओं को विशेष रूप से स्तनपान कराने का आंकड़ा 64% पर था, वहीं साल 2023-24 में यह घटकर मात्र 55.8% रह गया है। पिछले एक दशक से लगातार बढ़ रहे ग्राफ के अचानक इस तरह पलटने से सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण विशेषज्ञ हैरान हैं।

केरल टॉप पर, हरियाणा सबसे नीचे

NFHS की रिपोर्ट बताती है कि केरल, गुजरात और पश्चिम बंगाल जैसे गिने-चुने राज्यों को छोड़कर देश के लगभग सभी राज्यों में स्तनपान की दर गिरी है:

  • केरल में सबसे बेहतरीन सुधार: केरल ने इस मामले में सबसे शानदार प्रदर्शन किया है। यहां स्तनपान की दर 55.5% से बढ़कर सीधे 72.7% पर पहुंच गई है।
  • हरियाणा में सबसे बड़ी गिरावट: हरियाणा में सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई है, जहां यह दर 69.5% से गिरकर सीधे 41.2% पर आ गई है।
  • अन्य बड़े राज्यों का हाल: उत्तर प्रदेश में यह ग्राफ 59.7% से गिरकर 34.6% और मध्य प्रदेश में 74% से घटकर 56.4% पर आ गया है। राजस्थान में भी यह आंकड़ा घटकर 54.3% रह गया है।

स्तनपान घटने से बच्चों की सेहत पर क्या असर पड़ता है?

बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician) डॉ. सुगंध अग्रवाल के अनुसार, शुरुआती 6 महीनों में मां के दूध की जगह डब्बे का दूध (फार्मूला मिल्क) या ऊपर का पानी देने से बच्चों की सेहत पर सीधा और बेहद बुरा असर पड़ता है:

  • इम्युनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) का कमजोर होना: मां के शुरुआती दूध में प्रचुर मात्रा में एंटीबॉडीज होती हैं, जो बच्चे का प्राकृतिक सुरक्षा कवच हैं। स्तनपान न मिलने से बच्चों की इम्युनिटी कमजोर होती है, जिससे वे बार-बार बीमार पड़ते हैं।
  • डायरिया और निमोनिया का बढ़ा खतरा: जो बच्चे मां के दूध से वंचित रह जाते हैं, उनमें संक्रमण (Infections) होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे बच्चों में जानलेवा डायरिया (दस्त) और निमोनिया होने का खतरा सबसे ज्यादा होता है।
  • कुपोषण और शारीरिक विकास में रुकावट: मां के दूध में नवजात के विकास के लिए जरूरी सभी पोषक तत्व सही अनुपात में होते हैं। इसकी कमी से बच्चे वेस्टिंग (उम्र के हिसाब से वजन कम होना) और ‘स्टंटिंग’ (उम्र के हिसाब से लंबाई न बढ़ना) यानी कुपोषण का शिकार हो जाते हैं।
  • दिमागी विकास (IQ) पर असर: रिसर्च बताती हैं कि लंबे समय तक स्तनपान करने वाले बच्चों का कॉग्निटिव डेवलपमेंट (दिमागी विकास) उन बच्चों से बेहतर होता है जिन्हें मां का दूध नहीं मिलता।
  • भविष्य में लाइफस्टाइल बीमारियों का रिस्क: जिन बच्चों को शुरुआती 6 महीने एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग नहीं मिलती, उनमें बड़े होने पर मोटापा (Obesity), टाइप-2 डायबिटीज और अस्थमा जैसी बीमारियां होने का रिस्क काफी बढ़ जाता है।

जन्म के पहले घंटे में स्तनपान के आंकड़ों में सुधार

एक तरफ जहां छह महीने वाले स्तनपान में कमी आई है, वहीं एक सकारात्मक पहलू यह भी रहा कि जन्म के पहले घंटे के भीतर शिशु को मां का पहला गाढ़ा दूध (Colostrum) देने की दर में सुधार हुआ है। यह आंकड़ा 2015-16 के 42% से बढ़कर अब 50% पर पहुंच गया है। झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में इस पैरामीटर पर काफी अच्छा उछाल देखा गया है।

डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प है। लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।

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