मुजफ्फरपुर जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर गायघाट प्रखंड का कोदई गांव इन दिनों एक बार फिर चर्चा में है। वजह 43 साल पहले हुए चर्चित “कोदई कांड” में सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला है। दरअसल, होली के दिन यहां 5 लोगों का मर्डर हुआ था। एक हत्या के बाद 7 गांव के लोगों ने आरोपी के घर में आग लगाई थी। 26 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की बेंच ने इस मामले में 39 दोषियों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। साथ ही कहा है कि यह घटना न्यायिक विवेक को झकझोरने वाली है और इसमें किसी प्रकार की नरमी की गुंजाइश नहीं है। इसी फैसले के बाद दैनिक भास्कर के रिपोर्टर गांव पहुंचे, जहां आज भी उस खूनी होली की चर्चा लोगों की आंखें नम कर देती हैं। गांव के बुजुर्ग आज भी 29 मार्च 1983 को “काला दिन” बताते हैं। गांव में आज भी सन्नाटा और डर कोदई गांव पहुंचने पर शुरुआत में कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं था। गांव के चौक पर पान की दुकान चला रहे अशोक झा ने धीरे-धीरे बात शुरू की। उन्होंने कहा, “घटना बहुत बड़ी थी। जब हम पहुंचे थे, तब सिर्फ चीख-पुकार और लाशें दिख रही थीं। पूरा गांव दहशत में था।” थोड़ा आगे बढ़ने पर गांव के बरगद के पेड़ के नीचे बैठे बुजुर्गों के समूह से बातचीत हुई। गांव के कर्मवीर प्रसाद सिंह ने उस दिन को याद करते हुए कहा, “आज भी आंखों के सामने वही मंजर घूम जाता है। होली के दिन गांव में खून की होली खेली गई थी। दो कट्ठे जमीन पूरी तरह खून से लाल हो गई थी।” जानिए क्या है पूरा मामला… ₹600 के पंपसेट से शुरू हुआ खूनी विवाद ग्रामीणों के मुताबिक, विवाद की जड़ एक पंपसेट मशीन थी, जिसकी कीमत महज ₹600 थी। गांव के चंद्रशेखर चौधरी, महेंद्र राय समेत पांच लोगों ने मिलकर उसे खरीदा था। खेत की पटवन और मशीन के इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। 28 मार्च 1983 को भी दोनों पक्षों के बीच कहासुनी हुई थी। अगले दिन यानी 29 मार्च को होली थी। उसी दिन चंद्रशेखर चौधरी के बेटे बृजभूषण चौधरी और ललन चौधरी पंपसेट को अपने दरवाजे पर ले जा रहे थे। इसका विरोध करने पहुंचे उमेश राय पर दोनों भाइयों ने चाकू से हमला कर दिया। इलाज के दौरान उमेश राय की मौत हो गई। एक मौत के बाद भड़क गई हिंसा उमेश राय की मौत के बाद गांव में तनाव फैल गया। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर आरोपियों के घर से हथियार जब्त किए। लेकिन इसके बाद भीड़ उग्र हो गई। आसपास के पांच से सात गांवों के लोग भी वहां जुट गए। ग्रामीणों के अनुसार, आक्रोशित भीड़ ने पहले आरोपी पक्ष के घर में आग लगा दी। फिर भाग रहे लोगों का पीछा कर बर्बर तरीके से हत्या की गई। इस हिंसा में चंद्रशेखर चौधरी के दोनों बेटों, उनके दामाद, नाती और नातिन-दामाद की हत्या कर दी गई। महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। ग्रामीण बताते हैं, “लोग मारने के बाद भी लाठियां बरसा रहे थे। पूरा गांव रणक्षेत्र बन गया था।” तीन महीने तक गांव बना रहा पुलिस छावनी घटना के बाद गांव में भारी तनाव फैल गया। करीब तीन महीने तक गांव पुलिस छावनी बना रहा। चार अलग-अलग जगहों पर पुलिस कैंप लगाया गया था। ग्रामीणों के अनुसार, गांव के अधिकतर पुरुष डर के कारण दूसरे गांवों में छिपे रहे। इस मामले में 52 लोगों को नामजद किया गया था, जबकि पुलिस ने 81 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। निचली अदालत ने 49 लोगों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में पटना हाईकोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी। 26 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी दोषियों की अपील खारिज कर दी। “कई निर्दोष भी फंस गए थे” गांव के लोगों का कहना है कि इस मामले में कई निर्दोष लोगों के नाम भी शामिल कर दिए गए थे। कर्मवीर सिंह भावुक होकर बताते हैं कि उनके पिता और चाचा भी इस केस में आरोपी बनाए गए थे और जेल में ही उनकी मौत हो गई। उन्होंने कहा, “मैं पढ़ना चाहता था। 1983 में मैट्रिक सेकेंड डिवीजन से पास किया था। सपना था नौकरी करूंगा, लेकिन घर की हालत ऐसी हो गई कि सब खत्म हो गया। मेरे साथ पढ़ने वाले लोग नौकरी कर रहे हैं और मैं जिंदगीभर उसी घटना में उलझ कर रह गया।” यह कहते-कहते उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े। गांव छोड़कर चला गया पूरा परिवार ग्रामीणों ने बताया कि घटना के करीब दस साल बाद चंद्रशेखर चौधरी की भी मौत हो गई। इसके बाद उनका परिवार गांव छोड़कर दरभंगा चला गया। आज गांव में उनका मकान पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुका है। बताया जाता है कि बृजभूषण चौधरी और ललन चौधरी की पत्नियां उस समय गर्भवती थीं। दोनों के एक-एक बेटे हैं, जो आज गुजरात और दिल्ली में रहते हैं। आज भी गांव में जिंदा है खूनी होली की याद 43 साल बीत जाने के बाद भी कोदई गांव उस होली को भूल नहीं पाया है। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि छोटी सी बात कैसे सामूहिक हिंसा में बदल गई, यह आज भी लोगों के लिए सीख है। गांव में अब शांति जरूर है, लेकिन 29 मार्च 1983 की याद आज भी लोगों को सिहरा देती है। मुजफ्फरपुर जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर गायघाट प्रखंड का कोदई गांव इन दिनों एक बार फिर चर्चा में है। वजह 43 साल पहले हुए चर्चित “कोदई कांड” में सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला है। दरअसल, होली के दिन यहां 5 लोगों का मर्डर हुआ था। एक हत्या के बाद 7 गांव के लोगों ने आरोपी के घर में आग लगाई थी। 26 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की बेंच ने इस मामले में 39 दोषियों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। साथ ही कहा है कि यह घटना न्यायिक विवेक को झकझोरने वाली है और इसमें किसी प्रकार की नरमी की गुंजाइश नहीं है। इसी फैसले के बाद दैनिक भास्कर के रिपोर्टर गांव पहुंचे, जहां आज भी उस खूनी होली की चर्चा लोगों की आंखें नम कर देती हैं। गांव के बुजुर्ग आज भी 29 मार्च 1983 को “काला दिन” बताते हैं। गांव में आज भी सन्नाटा और डर कोदई गांव पहुंचने पर शुरुआत में कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं था। गांव के चौक पर पान की दुकान चला रहे अशोक झा ने धीरे-धीरे बात शुरू की। उन्होंने कहा, “घटना बहुत बड़ी थी। जब हम पहुंचे थे, तब सिर्फ चीख-पुकार और लाशें दिख रही थीं। पूरा गांव दहशत में था।” थोड़ा आगे बढ़ने पर गांव के बरगद के पेड़ के नीचे बैठे बुजुर्गों के समूह से बातचीत हुई। गांव के कर्मवीर प्रसाद सिंह ने उस दिन को याद करते हुए कहा, “आज भी आंखों के सामने वही मंजर घूम जाता है। होली के दिन गांव में खून की होली खेली गई थी। दो कट्ठे जमीन पूरी तरह खून से लाल हो गई थी।” जानिए क्या है पूरा मामला… ₹600 के पंपसेट से शुरू हुआ खूनी विवाद ग्रामीणों के मुताबिक, विवाद की जड़ एक पंपसेट मशीन थी, जिसकी कीमत महज ₹600 थी। गांव के चंद्रशेखर चौधरी, महेंद्र राय समेत पांच लोगों ने मिलकर उसे खरीदा था। खेत की पटवन और मशीन के इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। 28 मार्च 1983 को भी दोनों पक्षों के बीच कहासुनी हुई थी। अगले दिन यानी 29 मार्च को होली थी। उसी दिन चंद्रशेखर चौधरी के बेटे बृजभूषण चौधरी और ललन चौधरी पंपसेट को अपने दरवाजे पर ले जा रहे थे। इसका विरोध करने पहुंचे उमेश राय पर दोनों भाइयों ने चाकू से हमला कर दिया। इलाज के दौरान उमेश राय की मौत हो गई। एक मौत के बाद भड़क गई हिंसा उमेश राय की मौत के बाद गांव में तनाव फैल गया। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर आरोपियों के घर से हथियार जब्त किए। लेकिन इसके बाद भीड़ उग्र हो गई। आसपास के पांच से सात गांवों के लोग भी वहां जुट गए। ग्रामीणों के अनुसार, आक्रोशित भीड़ ने पहले आरोपी पक्ष के घर में आग लगा दी। फिर भाग रहे लोगों का पीछा कर बर्बर तरीके से हत्या की गई। इस हिंसा में चंद्रशेखर चौधरी के दोनों बेटों, उनके दामाद, नाती और नातिन-दामाद की हत्या कर दी गई। महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। ग्रामीण बताते हैं, “लोग मारने के बाद भी लाठियां बरसा रहे थे। पूरा गांव रणक्षेत्र बन गया था।” तीन महीने तक गांव बना रहा पुलिस छावनी घटना के बाद गांव में भारी तनाव फैल गया। करीब तीन महीने तक गांव पुलिस छावनी बना रहा। चार अलग-अलग जगहों पर पुलिस कैंप लगाया गया था। ग्रामीणों के अनुसार, गांव के अधिकतर पुरुष डर के कारण दूसरे गांवों में छिपे रहे। इस मामले में 52 लोगों को नामजद किया गया था, जबकि पुलिस ने 81 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। निचली अदालत ने 49 लोगों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में पटना हाईकोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी। 26 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी दोषियों की अपील खारिज कर दी। “कई निर्दोष भी फंस गए थे” गांव के लोगों का कहना है कि इस मामले में कई निर्दोष लोगों के नाम भी शामिल कर दिए गए थे। कर्मवीर सिंह भावुक होकर बताते हैं कि उनके पिता और चाचा भी इस केस में आरोपी बनाए गए थे और जेल में ही उनकी मौत हो गई। उन्होंने कहा, “मैं पढ़ना चाहता था। 1983 में मैट्रिक सेकेंड डिवीजन से पास किया था। सपना था नौकरी करूंगा, लेकिन घर की हालत ऐसी हो गई कि सब खत्म हो गया। मेरे साथ पढ़ने वाले लोग नौकरी कर रहे हैं और मैं जिंदगीभर उसी घटना में उलझ कर रह गया।” यह कहते-कहते उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े। गांव छोड़कर चला गया पूरा परिवार ग्रामीणों ने बताया कि घटना के करीब दस साल बाद चंद्रशेखर चौधरी की भी मौत हो गई। इसके बाद उनका परिवार गांव छोड़कर दरभंगा चला गया। आज गांव में उनका मकान पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुका है। बताया जाता है कि बृजभूषण चौधरी और ललन चौधरी की पत्नियां उस समय गर्भवती थीं। दोनों के एक-एक बेटे हैं, जो आज गुजरात और दिल्ली में रहते हैं। आज भी गांव में जिंदा है खूनी होली की याद 43 साल बीत जाने के बाद भी कोदई गांव उस होली को भूल नहीं पाया है। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि छोटी सी बात कैसे सामूहिक हिंसा में बदल गई, यह आज भी लोगों के लिए सीख है। गांव में अब शांति जरूर है, लेकिन 29 मार्च 1983 की याद आज भी लोगों को सिहरा देती है।


