इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विचाराधीन एक संवेदनशील एवं चर्चित दोहरे हत्याकांड प्रकरण में महत्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रम सामने आया।
यह मामला थाना झूंसी प्रयागराज में वर्ष 2018 में दर्ज दोहरे हत्याकांड से संबंधित है। इसमें दो युवकों की मृत्यु हुई थी तथा मामला भारतीय दण्ड संहिता की गंभीर धाराओं 147, 148, 149, 302, 201 एवं 120-बी के अंतर्गत विचाराधीन है। उक्त प्रकरण में लगभग 70 वर्ष आयु के एक अभियुक्त द्वारा तृतीय जमानत प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया था। अभिलेखों के अनुसार अभियुक्त लगभग साढ़े सात वर्षों से न्यायिक अभिरक्षा में निरुद्ध था तथा इससे पूर्व उसकी दो जमानत प्रार्थना पत्रों को गुण-दोष के आधार पर अस्वीकार किया जा चुका था। कोर्ट ने कई पहलुओं पर विचार किया मामले ने विशेष महत्व तब आया जब उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रकरण के शीघ्र विचार का अनुरोध किया गया। इसके पश्चात न्यायमूर्ति समित गोपाल की न्यायालय में मामले की सुनवाई हुई, जहां न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विचारण की प्रगति, साक्ष्य की स्थिति, पीड़ित पक्ष की आशंकाओं तथा न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता जैसे अनेक पहलुओं पर विस्तार से विचार किया। वकील ने पीड़ित परिवार के हालात बयां किए मृतक पक्ष की ओर से अधिवक्ता आशीष कुमार श्रीवास्तव ने न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर अभिलेखों, विचारण की प्रगति, पीड़ित परिवार की ओर से व्यक्त आशंकाओं तथा अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों पर प्रकाश डाला। सुनवाई के दौरान पीड़ित पक्ष की ओर से यह भी निवेदन किया गया कि विचारण में विलंब का कारण शिकायतकर्ता पक्ष नहीं है तथा पीड़ित परिवार निरंतर मानसिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का सामना कर रहा है।
सभी पक्षों की दलीलों एवं उपलब्ध अभिलेखों पर विचार करने के उपरांत न्यायालय ने नियमित जमानत प्रदान करने के स्थान पर सीमित अवधि के लिए अंतरिम व्यवस्था पारित की तथा उसके साथ कई कठोर शर्तें एवं अनुपालन संबंधी निर्देश भी निर्धारित किए। विधि क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि यह प्रकरण केवल एक जमानत विवाद तक सीमित नहीं था, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया के उस पक्ष को भी रेखांकित करता है जहां एक साधारण परिवार की चिंता और न्याय की अपेक्षा को भी गंभीरता से सुना जाता है।


