माननीय प्रधानमंत्री जी!
पिछले दिनों ही आपने दिल्ली में भारतीय मिशनों के प्रमुखों के साथ बैठक में इस बात पर असन्तोष जताया था कि कई मामलों में हमारे राजदूत न तो भारत की सकारात्मक छवि विदेशों में पेश कर पा रहे हैं और न ही पड़ोसी देशों में बड़े बदलावों की जानकारी समय पर पहुंचा रहे हैं। अतः आपका यह मत उचित ही है कि राजदूतों के पदों पर क्यों नहीं विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी लोगों को नियुक्त किया जाए।
मान्यवर ! आपका यह विचार देश की छवि को नए सिरे से चमका देगा। यह अंग्रेजों की व्यवस्था है जिसको अभी तक हमने शिरोधार्य कर रखा है। हमने अंग्रेजों को देश से निकालते समय उनके कपड़े भारतीयों को पहना दिए। आज भी सभी केन्द्रीय सेवाओं का परीक्षण अंग्रेजी संस्कृति के ही अधीन है। न भारतीय दर्शन, न माटी का दर्द और न ही समष्टि भाव है। धर्म निरपेक्ष अधिकारी अर्थ और काम में दक्ष हो रहे हैं।
चाहे आइएएस, आइपीएस, आइएफएस, आइआरएस इत्यादि कोई सेवा का इस दृष्टि से आकलन करके देख लीजिए, अधिकतर अधिकारी दूसरे से भ्रष्ट और समाज से दूर ही दिखाई देगा। यही देश का वह वर्ग है जो देश के बजट को नीचे तक पहुंचने से पहले ही बिखेर देता है। हर लोकतांत्रिक सरकार बदनाम होकर जाती है। देश में बड़े-बड़े माफिया भी इन्हीं के आश्रित रहकर देश की जड़ों को खोखला कर रहे हैं। नई पीढ़ी को नशे में झोंक रहे हैं। जिनकी नौकरी करते हैं, उनकी ही थाली में छेद कर रहे हैं। माननीय केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह जी को भी उनके जैसलमेर प्रवास के दौरान इन विचारों से अवगत कराया था।
हमें अच्छे सहायक सलाहकार पैदा करने चाहिए। भारतीय संस्कारों और जीवनशैली को अंगीकार करने वाले अधिकारी चाहिए। आज भोगी-स्वार्थी और सुविधाभोगियों की भीड़ है। जहां एक मुख्य सचिव सम्पूर्ण राज्य का काम संभालता है, वहीं हर विभाग में 6-8 आइएएस अपनी कार्यशैली से भद पिटवा रहे हैं। एक समय जहां एक आइजी पूरे प्रान्त को देखता था, आज दर्जनभर डीजीपी हैं और कानून व्यवस्था?
यमराज के हाथों! यही इनकी दक्षता का प्रमाण है। वन विभाग, आयकर, अपराध अन्वेषण, विदेश… आप कहीं भी हाथ डाल दें, देश के लिए जीने और मर मिटने वाले ढूंढने ही पड़ेंगे। पूरी गंगा मैली है। ऊपर से सब ‘वायसरॉय’ हैं। सजा किसी को नहीं, बचाने को पूरा तंत्र है। इनमें आत्म-बोध भरना होगा। शरीर से तो पशुवत ही जीएंगे। आहार-निद्रा-भय-मैथुन ! अर्थ और काम के जीवन की यही सीमा है।
श्रीमान्! आपसे एक और अनुरोध है- जनप्रतिनिधियों की शिक्षा, योग्यता, और मनोवैज्ञानिक परीक्षणों की नियमावली घोषित करें। अल्पज्ञ जनप्रतिनिधि भी अधिकारियों पर ही आश्रित रहता है। भ्रष्टाचार में रंगे हाथ पकड़े जाने वाले नेता-अधिकारी की जांच की आवश्यकता-साक्ष्य आदि के नाटक बंद हो जाने से ही अपराधी को बचाने की मानसिकता को चोट लगेगी।
यह तो नहीं मालूम कि राजनीति की लाचारी क्या है, किन्तु राष्ट्रहित के विरुद्ध हर गतिविधि को रोकना है तो हर उस व्यक्ति को भी धिक्कारना तो पड़ेगा जो अपनी मां के दूध को अपमानित कराने में भी नहीं लजाता। हमें सेवक चाहिए। सेवक पैदा करने का मार्ग प्रशस्त करें।
आपने जो उदाहरण फिल्म अभिनेता स्व. राजकपूर के जन्मशती उत्सव पर देश के समक्ष रखा कि उन्होंने मध्य एशिया में देश की छवि का जो उत्थान किया अद्भुत था। ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी लोग युवाओं में भारत की प्रतिष्ठा की मशाल उठाकर चलते हैं। भारत जैसे देश में विभिन्न क्षेत्रों में सैकड़ों अनुभवी, प्रतिष्ठित विभूतियां यदि राजदूत बनकर जाएंगी तो निश्चित ही देश को पुनः शिखर पर ले जाने में गति आएगी। आपके ‘योग’ शब्द ने जो चमत्कार किया, वह विश्व के समक्ष है। जैसे आपने स्व. राजकपूर को ‘सांस्कृतिक राजदूत’ कहकर उनके योगदान की सराहना की। वैसे ही राजदूत बनकर सैकड़ों सांस्कृतिक राजदूत भारत के साथ विदेशी युवाओं को एकाकार कर सकेंगे। ईश्वर आपके स्वप्न को शीघ्र साकार करे।
क्रमशः gulabkothari@epatrika.com


