Inspector Avinash 2 Review | Randeep Hooda का ‘स्वैग’ और यूपी का क्राइम ड्रामा, इंस्पेक्टर अविनाश सीजन 2 में कितना है दम?

Inspector Avinash 2 Review | Randeep Hooda का ‘स्वैग’ और यूपी का क्राइम ड्रामा, इंस्पेक्टर अविनाश सीजन 2 में कितना है दम?
भारतीय ओटीटी (OTT) की दुनिया में उत्तर प्रदेश के अपराध और पुलिसिया कहानियों का एक अलग ही क्रेज है। ‘मिर्जापुर’ और ‘पाताल लोक’ जैसी सीरीज ने जो पैमाना सेट किया है, उसी कड़ी में अब रणदीप हुड्डा की सीरीज ‘इंस्पेक्टर अविनाश’ का दूसरा सीजन दस्तक दे चुका है। नीरज पाठक के निर्देशन में बनी यह सीरीज पहले सीजन की कहानी को और भी भव्य और हिंसक अंदाज में आगे बढ़ाती है।’इंस्पेक्टर अविनाश सीजन 2′ की कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ पहला सीजन खत्म हुआ था। एसटीएफ (STF) ऑफिसर अविनाश मिश्रा (रणदीप हुड्डा) एक ऐसा किरदार है जिसके नाम सौ से ज्यादा एनकाउंटर दर्ज हैं। इस बार कहानी का दायरा केवल यूपी तक सीमित नहीं है, बल्कि नेपाल, मध्य प्रदेश, बिहार और ओडिशा तक फैल जाता है।

इंस्पेक्टर अविनाश 2: कहानी

सीज़न 2 ठीक वहीं से शुरू होता है जहाँ पहला सीज़न खत्म हुआ था, लेकिन इस बार इसका दायरा काफ़ी बड़ा है। कहानी सिर्फ़ उत्तर प्रदेश की सड़कों तक ही सीमित नहीं रहती, बल्कि नेपाल, मध्य प्रदेश, बिहार और ओडिशा तक फैल जाती है। कहानी STF अफ़सर अविनाश मिश्रा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो न सिर्फ़ बाहर अपराधियों से लड़ रहे हैं, बल्कि सिस्टम के अंदर चल रही विभागीय राजनीति और सस्पेंशन के ख़तरे का भी सामना कर रहे हैं। इस बार, उनका सामना शेख़ (अमित सियाल) के हथियारों के कार्टेल और बेकाबू अपराधी देविकांत त्रिवेदी (अभिमन्यु सिंह) से होता है। हालाँकि, इस सीज़न की सबसे बड़ी ताक़त इसका निजी पहलू है। जब अविनाश के बेटे वरुण पर अपने एक क्लासमेट की हत्या का आरोप लगता है, तो कहानी एक एक्शन-बेस्ड पुलिस ड्रामा से बदलकर एक इमोशनल कहानी बन जाती है। यह ट्रैक दिखाता है कि कैसे एक पुलिसवाला, जो बाहर गोलियों के दम पर इंसाफ़ दिलाता है, अपने ही घर के अंदर पैदा हुए कानूनी और नैतिक उथल-पुथल में फँसकर बेबस हो जाता है। स्क्रीनप्ले इस निजी त्रासदी को राजनीतिक साज़िशों और गैंगवार के साथ जोड़ने की कोशिश करता है, जिससे दर्शक कहानी से जुड़े रहते हैं; हालाँकि कई छोटी-छोटी कहानियों (subplots) की वजह से कभी-कभी कहानी थोड़ी बोझिल भी लगने लगती है।
 

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अभिनय: रणदीप हुड्डा का वन-मैन शो

इस सीरीज की जान और शान रणदीप हुड्डा हैं। उन्होंने अविनाश मिश्रा के किरदार को महज एक ‘फिल्मी हीरो’ नहीं, बल्कि एक हाड़-मांस के इंसान के रूप में पेश किया है।
 
रणदीप हुड्डा: उनके चेहरे का घमंड, परिवार के लिए चिंता और दमदार फिजीक सीरीज को जीवंत कर देती है। राइटिंग कमजोर होने के बावजूद हुड्डा अपने हाव-भाव से सीन को संभाल लेते हैं।
 
अमित सियाल और अभिमन्यु सिंह: अमित सियाल अपनी सधी हुई अदाकारी से एक निरंतर खतरा बनाए रखते हैं, वहीं अभिमन्यु सिंह का पागलपन दर्शकों को बेचैन करता है।
 
उर्वशी रौतेला: पूनम के किरदार में उर्वशी एक सरप्राइज पैकेज की तरह हैं। खासकर बेटे की गिरफ्तारी वाले दृश्यों में उनका अभिनय काफी सच्चा लगता है।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

नीरज पाठक का निर्देशन बारीकियों से ज्यादा माहौल (Atmosphere) बनाने पर केंद्रित है। यह सीरीज पुराने जमाने के ‘मास एंटरटेनमेंट’ की याद दिलाती है। चिरंतन दास की सिनेमैटोग्राफी इस शो का सबसे मजबूत तकनीकी हिस्सा है। 90 के दशक के उत्तर प्रदेश के धूल भरे और हिंसक मिजाज को उन्होंने बेहतरीन हवाई शॉट्स और चौड़े फ्रेम के साथ कैद किया है। एडिटिंग कहानी को कसा हुआ रखने की कोशिश करती है, जबकि बैकग्राउंड स्कोर तनाव भरे पलों में जान फूंक देता है। एडिटिंग का काम अर्चित डी. रस्तोगी ने संभाला है। वह इस लंबी और उलझी हुई कहानी को कसा हुआ रखने की कोशिश करते हैं, हालाँकि स्क्रिप्ट की गति में उतार-चढ़ाव की वजह से कई जगहों पर दोहराव महसूस होता है। बैकग्राउंड स्कोर और साउंड डिज़ाइन भी तारीफ़ के काबिल हैं, जो तनाव भरे पलों में कहानी को और गहरा बनाते हैं। तकनीकी तौर पर यह शो काफ़ी समृद्ध है, लेकिन तकनीकी चमक हमेशा लेखन की कमियों को नहीं छिपा सकती।
 

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Inspector Avinash 2: यह सीरीज़ कहाँ कमज़ोर पड़ती है?

Inspector Avinash Season 2 की सबसे बड़ी कमज़ोरी इसकी राइटिंग है। इसके डायलॉग्स अक्सर वैसे ही घिसे-पिटे लगते हैं, जो पिछले दो दशकों में नॉर्थ इंडियन क्राइम फ़िल्मों में बार-बार सुनने को मिले हैं। सिस्टम और वर्दी के बारे में कही गई बड़ी-बड़ी बातें सुनने में तो दमदार लग सकती हैं, लेकिन दर्शकों पर उनका कोई खास असर नहीं पड़ता। किरदारों की भीड़ भी एक और समस्या है। इतने सारे विलेन और सब-प्लॉट्स होने की वजह से, मुख्य कहानी कभी-कभी अपनी धार खो देती है।
कुछ एक्शन सीन, खासकर सचिन पहाड़ी वाला एनकाउंटर, ज़रूरत से ज़्यादा ड्रामैटिक और अफरा-तफरी भरे लगते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि यह शो असलियत के बजाय “स्वैग” को ज़्यादा अहमियत देता है। इसके अलावा, महिला किरदारों को भी बहुत सीमित तरीके से दिखाया गया है; वे या तो मुखबिर हैं या फिर पुरुषों के फ़ैसलों से प्रभावित होने वाली सिर्फ़ मोहरे। डबिंग और ऑडियो ट्रांज़िशन में भी कुछ कमियाँ साफ़ नज़र आती हैं, जिससे कुछ सीन का असर कम हो जाता है।

Inspector Avinash 2: आख़िरी फ़ैसला

कुल मिलाकर, Inspector Avinash Season 2 उन दर्शकों के लिए एक अच्छा ऑप्शन है, जिन्हें देसी-स्टाइल के पुलिस ड्रामा पसंद हैं। यह कोई ऐसी सीरीज़ नहीं है जो नैतिकता और कानून के बीच के दार्शनिक बहसों में बहुत गहराई तक जाती हो; बल्कि, यह एक ऐसी कहानी है जो अपनी तेज़ रफ़्तार और माहौल की वजह से आगे बढ़ती है। रणदीप हुड्डा की ज़बरदस्त परफ़ॉर्मेंस और चिरंतन दास की सिनेमैटोग्राफ़ी इस सफ़र को देखने लायक बनाती है। भले ही इसमें कुछ नयापन न हो और यह घिसी-पिटी चीज़ों पर ज़्यादा निर्भर हो, लेकिन यह अपने टारगेट ऑडियंस का मनोरंजन करना बखूबी जानती है। यह थोड़ी बिखरी हुई और कभी-कभी दोहराव वाली लग सकती है, लेकिन हुड्डा की शानदार परफ़ॉर्मेंस और इसकी क्राइम की दुनिया की पेचीदगियाँ इसे बोरिंग होने से बचा लेती हैं। अगर आपको नॉर्थ इंडिया की कच्ची और हिंसक कहानियाँ पसंद हैं, तो यह सीज़न आपको निराश नहीं करेगा।
रणदीप हुड्डा की Inspector Avinash Season 2 को 5 में से 3 स्टार।
 
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