इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी कर्मचारी की सेवा को विभाग ने मान्य कर दिया है, तो उसे केवल नियमितीकरण न होने के आधार पर पदोन्नति से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि कनिष्ठ कर्मचारियों को पदोन्नति देकर वरिष्ठ को नजरअंदाज करना भेदभावपूर्ण रवैया है। यह आदेश न्यायमूर्ति करुणेश सिंह पवार की एकल पीठ ने देवानंद श्रीवास्तव की याचिका स्वीकार करते हुए पारित किया। न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याची को उसके कनिष्ठ कर्मचारियों की पदोन्नति की तिथि से सहायक चकबंदी अधिकारी के पद पर पदोन्नति का लाभ दिया जाए। याची की ओर से अधिवक्ता अभिनीत जायसवाल ने न्यायालय को बताया कि देवानंद श्रीवास्तव की नियुक्ति वर्ष 1986 में चकबंदी लेखपाल के रूप में हुई थी। वर्ष 1991 में उनकी सेवा विभाग द्वारा पुष्ट कर दी गई थी। बाद में उन्हें चकबंदीकर्ता के पद पर भी पदोन्नति मिली। हालांकि, सहायक चकबंदी अधिकारी के पद पर पदोन्नति के समय विभाग ने उनका दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उनकी प्रारंभिक नियुक्ति स्थानापन्न आधार पर हुई थी और उनका नियमितीकरण नहीं हुआ था। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि उनके कई कनिष्ठ कर्मचारियों को पदोन्नति दे दी गई थी, जबकि उन्हें तकनीकी आधार पर रोक दिया गया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि चार दशक तक सेवा लेने के बाद भी कर्मचारी का नियमितीकरण न होना प्रशासनिक विफलता है। इसका नुकसान कर्मचारी को नहीं उठाना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि वरिष्ठ कर्मचारी को केवल तकनीकी आधार पर पदोन्नति से वंचित करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।


