‘बिहार की जीत हमारी है; अब बंगाल की बारी है।’ 14 नवंबर 2025 को शुभेंदु अधिकारी ने यह दावा किया था। उनका दावा 4 मई 2026 को सच साबित हो गया। बंगाल के आसमान में केसरिया रंग उड़ा, तो हर तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे, अमित शाह की चाणक्य नीति और योगी आदित्यनाथ के तेवर की चर्चा हो रही है। लेकिन इस महाविजय की पटकथा के पीछे बिहार के 300 से ज्यादा नेता-कार्यकर्ता भी हैं, जिनका नाम हेडलाइंस में नहीं चमका। जिन्होंने पूर्व मंत्री मंगल पांडेय के नेतृत्व में बंगाल की गलियों और बूथों पर पसीना बहाया। न कोई बड़ा मंच, न कोई भारी-भरकम भाषण। बस मिशन था बंगाल फतह। आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में कैसे इन नेताओं ने बिना शोर मचाए ममता बनर्जी के किले में सेंध लगाई। शाह-मोदी की हर बारीक स्ट्रैटेजी को जमीन पर उतारा। 1. बिहार के नेताओं को 5-जोन स्ट्रैटेजी में बड़ी भूमिका बिहार की तरह बंगाल को भाजपा ने प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से 5 जोन में बांटा था। प्रत्येक जोन के लिए एक केंद्रीय प्रभारी नियुक्त किया गया, जो सीधे दिल्ली (केंद्रीय नेतृत्व) को रिपोर्ट करता था। इससे स्थानीय अंतर्कलह कम हो रही थी और पार्टी के फैसलों में तेजी आई। बिहार के पूर्व मंत्री मंगल पांडेय के पास उत्तर बंगाल से साउथ/सेंट्रल बंगाल में पैठ बनाने और बिहार की सफल रणनीति ट्रांसफर करने की जिम्मेदारी थी। उनके साथ राजेश कुमार वर्मा (जनरल सेक्रेटरी), सुरेश चौधरी, जगन्नाथ ठाकुर, अखिलेश सिंह, राम सूरत राय, निक्की हेम्ब्रम, मिथिलेश कुमार, देवेश कुमार सहित 300 से ज्यादा लीडर लगे थे। ये नेता डेली सुबह उठते और पार्टी के नाराज लोकल नेताओं को मनाने से लेकर नए वोटरों तक पहुंचते थे। चुनाव से 4 महीने पहले ही ये बंगाल पहुंचे और लगातार जमीन पर काम किया। 2. बूथ से जिले तक का माइक्रो-मैनेजमेंट बिहार में भाजपा की जीत का सबसे बड़ा स्तंभ उनका माइक्रो-मैनेजमेंट रहा था। जिसे बंगाल में बूथ विजय संकल्प के रूप में लागू किया गया। 3. आर्थिक और जातीय आधार पर मैनेजमेंट बंगाल में कैडर वॉर की स्थिति रहती है। इसे संभालने के लिए भाजपा ने हर विधानसभा सीट को जातीय और आर्थिक समीकरणों (जैसे मतुआ, राजबंशी, और महतो समुदाय) के आधार पर डिकोड किया। हर बूथ पर ‘व्हाट्सएप ग्रुप्स’ के जरिए सूचनाएं फैलाईं। बिहार के नेताओं को उनकी जाति के वोटरों के बीच भी भेजा गया। वे लगातार अपने समाज के लोगों को मोटिवेट करते रहे। इसका रिजल्ट चुनाव में भी दिखा। भाजपा ने लगातार समय-समय पर अपनी रणनीति में बदलाव किया। जैसे-बीच चुनाव में मैथिली ठाकुर से जमकर प्रचार कराया। जबकि उनका नाम स्टार प्रचारकों की लिस्ट में भी नहीं था। पीएम, 12 सीएम, 15 केंद्रीय मंत्रियों ने मांगे वोट 15 दिन तक बंगाल में रहे शाह 4 केंद्रीय + 4 बंगाली नेताओं का कोर ग्रुप बनाया ‘बिहार की जीत हमारी है; अब बंगाल की बारी है।’ 14 नवंबर 2025 को शुभेंदु अधिकारी ने यह दावा किया था। उनका दावा 4 मई 2026 को सच साबित हो गया। बंगाल के आसमान में केसरिया रंग उड़ा, तो हर तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे, अमित शाह की चाणक्य नीति और योगी आदित्यनाथ के तेवर की चर्चा हो रही है। लेकिन इस महाविजय की पटकथा के पीछे बिहार के 300 से ज्यादा नेता-कार्यकर्ता भी हैं, जिनका नाम हेडलाइंस में नहीं चमका। जिन्होंने पूर्व मंत्री मंगल पांडेय के नेतृत्व में बंगाल की गलियों और बूथों पर पसीना बहाया। न कोई बड़ा मंच, न कोई भारी-भरकम भाषण। बस मिशन था बंगाल फतह। आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में कैसे इन नेताओं ने बिना शोर मचाए ममता बनर्जी के किले में सेंध लगाई। शाह-मोदी की हर बारीक स्ट्रैटेजी को जमीन पर उतारा। 1. बिहार के नेताओं को 5-जोन स्ट्रैटेजी में बड़ी भूमिका बिहार की तरह बंगाल को भाजपा ने प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से 5 जोन में बांटा था। प्रत्येक जोन के लिए एक केंद्रीय प्रभारी नियुक्त किया गया, जो सीधे दिल्ली (केंद्रीय नेतृत्व) को रिपोर्ट करता था। इससे स्थानीय अंतर्कलह कम हो रही थी और पार्टी के फैसलों में तेजी आई। बिहार के पूर्व मंत्री मंगल पांडेय के पास उत्तर बंगाल से साउथ/सेंट्रल बंगाल में पैठ बनाने और बिहार की सफल रणनीति ट्रांसफर करने की जिम्मेदारी थी। उनके साथ राजेश कुमार वर्मा (जनरल सेक्रेटरी), सुरेश चौधरी, जगन्नाथ ठाकुर, अखिलेश सिंह, राम सूरत राय, निक्की हेम्ब्रम, मिथिलेश कुमार, देवेश कुमार सहित 300 से ज्यादा लीडर लगे थे। ये नेता डेली सुबह उठते और पार्टी के नाराज लोकल नेताओं को मनाने से लेकर नए वोटरों तक पहुंचते थे। चुनाव से 4 महीने पहले ही ये बंगाल पहुंचे और लगातार जमीन पर काम किया। 2. बूथ से जिले तक का माइक्रो-मैनेजमेंट बिहार में भाजपा की जीत का सबसे बड़ा स्तंभ उनका माइक्रो-मैनेजमेंट रहा था। जिसे बंगाल में बूथ विजय संकल्प के रूप में लागू किया गया। 3. आर्थिक और जातीय आधार पर मैनेजमेंट बंगाल में कैडर वॉर की स्थिति रहती है। इसे संभालने के लिए भाजपा ने हर विधानसभा सीट को जातीय और आर्थिक समीकरणों (जैसे मतुआ, राजबंशी, और महतो समुदाय) के आधार पर डिकोड किया। हर बूथ पर ‘व्हाट्सएप ग्रुप्स’ के जरिए सूचनाएं फैलाईं। बिहार के नेताओं को उनकी जाति के वोटरों के बीच भी भेजा गया। वे लगातार अपने समाज के लोगों को मोटिवेट करते रहे। इसका रिजल्ट चुनाव में भी दिखा। भाजपा ने लगातार समय-समय पर अपनी रणनीति में बदलाव किया। जैसे-बीच चुनाव में मैथिली ठाकुर से जमकर प्रचार कराया। जबकि उनका नाम स्टार प्रचारकों की लिस्ट में भी नहीं था। पीएम, 12 सीएम, 15 केंद्रीय मंत्रियों ने मांगे वोट 15 दिन तक बंगाल में रहे शाह 4 केंद्रीय + 4 बंगाली नेताओं का कोर ग्रुप बनाया


