SI Recruitment 2021: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से SI भर्ती पर लगा ‘ताला’, हनुमान बेनीवाल ने उठाए सिस्टम पर सवाल

SI Recruitment 2021: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से SI भर्ती पर लगा ‘ताला’, हनुमान बेनीवाल ने उठाए सिस्टम पर सवाल

जयपुर। राजस्थान की बहुचर्चित और विवादों में घिरी सब-इंस्पेक्टर (SI) भर्ती-2021 को लेकर लंबे समय से चल रहा कानूनी संघर्ष आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने इस भर्ती को रद्द रखने के निर्णय पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है। कोर्ट ने चयनित अभ्यर्थियों की ओर से दायर स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) को खारिज करते हुए स्पष्ट संकेत दिया कि जिस भर्ती प्रक्रिया में बड़े स्तर पर गड़बड़ी हो चुकी हो, उसे सही ठहराया नहीं जा सकता।

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सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब पूरी चयन प्रक्रिया ही संदिग्ध हो, तब यह तय करना संभव नहीं रह जाता कि कौन अभ्यर्थी सही तरीके से चयनित हुआ और कौन गलत तरीके से। ऐसे में पूरी भर्ती को निरस्त करना ही न्यायसंगत विकल्प है। कोर्ट की इस टिप्पणी ने पूरे मामले की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है।

‘मेहनतकश युवाओं की बड़ी जीत’

इस फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। नागौर सांसद और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के प्रमुख हनुमान बेनीवाल ने इसे मेहनतकश युवाओं की बड़ी जीत बताया है। उन्होंने कहा कि इस भर्ती को रद्द करने की मांग को लेकर उनकी पार्टी ने लगातार संघर्ष किया। सड़क से लेकर सदन तक युवाओं की आवाज उठाई गई और लोकसभा में भी इस मुद्दे को प्रमुखता से रखा गया। जयपुर के शहीद स्मारक पर लंबे समय तक धरना और बड़ी रैली आयोजित कर इस मुद्दे को जनआंदोलन का रूप दिया गया।

भाजपा सरकार पर साधा निशाना

उन्होंने कहा कि जब राजस्थान की भाजपा सरकार ने इस मामले में दोहरा रवैया अपनाते हुए, इस भर्ती में बड़े स्तर पर हुए भ्रष्टाचार के प्रमाण सामने आने के बावजूद इसे यथावत रखने का पुरजोर प्रयास किया। बेनीवाल ने कहा कि जब राज्य सरकार पर इस भर्ती को बचाने के आरोप लग रहे थे, तब न्यायपालिका से ही निष्पक्ष फैसले की उम्मीद थी। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न केवल एक भर्ती प्रक्रिया पर फैसला है, बल्कि यह न्याय, पारदर्शिता और युवाओं के विश्वास की पुनर्स्थापना का प्रतीक भी है। उन्होंने कहा कि ऐसे फैसलों से आम जनता का न्यायपालिका पर भरोसा और मजबूत होता है।

उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि दूषित चयन प्रक्रिया को स्वीकार नहीं किया जा सकता और राजस्थान हाईकोर्ट का तत्कालीन आरपीएससी चेयरमैन के खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाने से इनकार करना, यह दर्शाता है कि पूरे मामले में गंभीर खामियां थीं। इस घटनाक्रम ने आरपीएससी के पुनर्गठन की मांग को भी और मजबूती दी है। इस फैसले के बाद अब राज्य के हजारों अभ्यर्थियों के भविष्य को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। वहीं, युवाओं के बीच यह संदेश गया है कि पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए संघर्ष करने पर न्याय जरूर मिलता है।

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