Mamata Banerjee Saree Price : सीएम होकर भी सिंपल लाइफ जीने का उदाहरण देना हो तो ममता बनर्जी से बेहतर शायद ही कोई हो! आपने भी देखा ही होगा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हमेशा सफेद साड़ी में दिखती हैं। पर, ये कोई ऐसी-वैसी नहीं बल्कि इस बंगाली साड़ी का इतिहास 500 साल पुराना बताया जाता है। इसको खास बनाने के लिए ममता खुद भी डिजाइन कर चुकी हैं।
“ममता साड़ी” नाम पड़ गया
ममता बनर्जी ने इस बंगाली साड़ी को सड़क, संसद से लेकर देश-दुनिया में इतना पहना है कि ये इनकी पहचान बन चुका है। इतना ही नहीं, बंगाल के बाजारों में ये अब “ममता साड़ी” के नाम से भी बिकती हैं।
सफेद या ऑफ-व्हाइट रंग की सूती साड़ी पहनती हैं, जिसमें किनारों (बॉर्डर) पर नीली, हरी या काली पतली धारियां होती हैं। इस लुक को अक्सर “मदर टेरेसा स्टाइल” भी कहा जाता है।
साड़ी का इतिहास और शैली
ममता बनर्जी की साड़ियों को अक्सर ‘धनियाखाली’ (Dhanekhali) या ‘तांत’ (Tant) की साड़ियां कहा जाता है। इनका संबंध पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के धनियाखाली क्षेत्र से है, जो अपनी उत्कृष्ट बुनाई के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
डिजाइनर के रूप में ममता बनर्जी
साल 2013 में, उन्होंने स्वयं डिजाइनर की भूमिका निभाई और लगभग 400 बुनकरों के साथ मिलकर साड़ियों के नए पैटर्न तैयार किए। इन साड़ियों में पत्तों, फूलों और “धरती माता” जैसे प्राकृतिक मोटिफ्स (आकृतियों) का उपयोग किया गया था।
यह साड़ी उनके “स्ट्रीट फाइटर” और जमीन से जुड़ी नेता वाली छवि को दर्शाती है। दिलचस्प बात यह है कि वे लंदन में जॉगिंग करते समय भी इसी पारंपरिक वेशभूषा और हवाई चप्पल में नजर आई थीं।
Mamata Banerjee Saree Cost : ममता बनर्जी की साड़ी की कीमत
ममता बनर्जी की साड़ियों की सबसे बड़ी खासियत है- आरामदेह फैब्रिक। इसके अलावा किफायती कीमत है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उनकी नियमित साड़ियों की कीमत आमतौर पर 400 रुपये से 800 रुपये के बीच होती है।
मसलिन (Muslin) साड़ियां
कभी-कभी वे बंगाल की प्रसिद्ध ‘मसलिन’ साड़ियां भी पहनती हैं, जो बहुत बारीक और मुलायम होती हैं। इनकी कीमत थोड़ी अधिक हो सकती है, लेकिन वे अभी भी लग्जरी ब्रांडों की तुलना में बहुत कम होती हैं।
‘धनियाखाली तांत’ (Dhaniakhali Tant) साड़ियों की बुनाई का इतिहास 15वीं शताब्दी से शुरू होकर अबतक चला आ रहा है। इसकी शुरुआत पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के शांतिपुर क्षेत्र से हुई थी। मुगल काल (16वीं से 18वीं शताब्दी) के दौरान इस कला को शाही संरक्षण मिला, जिससे यह मलमल और जामदानी के साथ-साथ काफी समृद्ध हुई।
धनियाखाली साड़ी का विकास
1935 के आसपास धनियाखाली हाथ से बुनी जाने वाली साड़ियों के एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा। पहले ये साड़ियां केवल ‘कोरा’ (प्राकृतिक ग्रे/ऑफ-व्हाइट) रंग में होती थीं और इनके बॉर्डर सादे लाल या काले होते थे। 1940 के शुरुआती वर्षों में साड़ियों में डिजाइन डालने के लिए ‘कट-कल’ या ‘बैरल डॉबी’ (एक प्रकार की बुनाई मशीन) का उपयोग शुरू हुआ।
1942 में धनियाखाली साड़ियों में रंगीन धागों (Dyed Yarn) का प्रयोग पहली बार शुरू किया गया, जिससे ये और आकर्षक बनने लगीं। धनियाखाली साड़ी की विशिष्टता के कारण इसे Geographical Indication (GI) दर्जा प्राप्त है।


