Overtime Rules: ”थोड़ा रुक जाओ, बस यह काम निपटा दो।” यह एक लाइन लाखों नौकरीपेशा लोगों की जिंदगी में रोज बोली जाती है और ज्यादातर लोग चुपचाप मान भी लेते हैं। घर की EMI है, बच्चों की फीस है, राशन का हिसाब है। ऐसे में बॉस ने देर तक रोक लिया तो “ना” कहना उतना आसान नहीं जितना सुनने में लगता है। यही वजह है कि भारत के दफ्तरों में ओवरटाइम एक आम बात बन गई है। लेकिन क्या यह कानूनी है? और अगर आपसे जबरदस्ती देर तक काम करवाया जाए तो आप क्या कर सकते हैं?
आम बात है, लेकिन कानूनी नहीं
NM Law Chambers की फाउंडिंग पार्टनर मलक भट्ट कहती हैं कि IT कंपनियों, प्राइवेट कॉरपोरेट दफ्तरों और MNCs में यह रोज का किस्सा है। बॉस बस मुंह से कह देता है, “आज थोड़ा रुकना पड़ेगा।” कोई लिखित आदेश नहीं, कोई ईमेल नहीं, कोई रिकॉर्ड नहीं। यह चलन इतना पुराना हो गया है कि लोग इसे सामान्य मान बैठे हैं। लेकिन “आम बात” और “कानूनी बात” में फर्क होता है।
भट्ट साफ कहती हैं कि भारत में किसी भी कर्मचारी को ओवरटाइम के लिए जबरदस्ती नहीं कहा जा सकता। यह काम पूरी तरह स्वैच्छिक होना चाहिए। और अगर कोई लिखित आदेश नहीं है, तो गलती कर्मचारी की नहीं, नियोक्ता की है।
कानून क्या कहता है?
भट्ट ने बताया कि भारत में ओवरटाइम और काम के घंटों को लेकर कई कानून हैं। फैक्ट्रीज एक्ट 1948 कहता है कि एक दिन में 9 घंटे और हफ्ते में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं करवाया जा सकता। अगर इससे ज्यादा काम हो तो उसका दोगुना मेहनताना देना जरूरी है।
OSH लेबर कोड 2020 यानी Occupational Safety, Health and Working Conditions Code में भी यही बात है। 13 पुराने श्रम कानूनों को समेटकर बना यह कोड कहता है कि ओवरटाइम का पैसा तनख्वाह की सामान्य दर से दोगुना होना चाहिए और उसी वेतन चक्र में मिलना चाहिए।
इसके अलावा हर राज्य का अपना Shops and Establishments Act है। दिल्ली हो, महाराष्ट्र हो या कर्नाटक, सभी जगह दफ्तरों और IT कंपनियों पर ये नियम लागू होते हैं।
Industrial Employment Act 1946 तो यहां तक कहता है कि नियोक्ता को काम के घंटे, शिफ्ट और ओवरटाइम सब लिखकर देना होगा। जो बॉस मुंह से आदेश देकर इन लिखित नियमों को दरकिनार करते हैं, वे कानून तोड़ रहे हैं।
अपना बचाव खुद करें, सबूत इकट्ठा करें
भट्ट कहती हैं कि कागज पर कर्मचारी की स्थिति मजबूत है, लेकिन सबूत के बिना यह ताकत बेकार है। तो सबसे पहले क्या करें? जो भी WhatsApp मैसेज हों, ईमेल हों, कैलेंडर इनवाइट हों, सब संभाल के रखें। अगर बॉस ने मुंह से कहा है तो उसके बाद एक ईमेल लिख दें जिसमें लिखा हो “जैसा आपने बताया, मैं आज शाम 8 बजे तक रुककर यह काम पूरा कर रहा हूं।” बस, आपका सबूत तैयार।
इसके बाद के रास्ते ये हैं:
कंपनी की Internal Grievance Committee में शिकायत दर्ज करें। 20 से ज्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों में यह कमेटी बनाना जरूरी है। राज्य के Labour Commissioner या Labour Inspector के पास लिखित शिकायत भी कर सकते हैं।
अगर आप “वर्कमैन” की श्रेणी में आते हैं तो Industrial Disputes Act 1947 की धारा 33C(2) के तहत लेबर कर्ट में जाकर बकाया ओवरटाइम का पैसा मांग सकते हैं। मैनेजर या सुपरवाइजर हैं? तो सिविल कोर्ट का रास्ता है।
मैनेजर हैं तो शायद आपको ओवरटाइम नहीं मिलेगा
अगर आप मैनेजर या सुपरवाइजर हैं, तो ओवरटाइम के अधिकार आप पर लागू नहीं होते। Factories Act के तहत एक तय तनख्वाह से ऊपर काम करने वाले मैनेजर इस दायरे से बाहर हैं और यह छूट कई कंपनियां खूब भुनाती हैं।
कंपनी का पक्ष क्या होगा?
भट्ट बताती हैं कि अगर कर्मचारी शिकायत करे तो कंपनियां आमतौर पर तीन दलीलें देती हैं। पहली, कि यह कर्मचारी मैनेजर है इसलिए ओवरटाइम लागू नहीं होता। दूसरी, कि ऑफर लेटर में लिखा था “business requirements के अनुसार काम करना होगा।” तीसरी, कि कर्मचारी खुद अपनी मर्जी से रुका था। इसीलिए सबूत रखना सबसे जरूरी काम है।


