IGIMS में MBBS-PG पेपर लीक जांच अटकी:दो कमेटियां बनीं, डेडलाइन खत्म होने पर भी रिपोर्ट नहीं; पारदर्शिता पर उठे सवाल

IGIMS में MBBS-PG पेपर लीक जांच अटकी:दो कमेटियां बनीं, डेडलाइन खत्म होने पर भी रिपोर्ट नहीं; पारदर्शिता पर उठे सवाल

पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में MBBS-PG परीक्षाओं में कथित प्रश्नपत्र लीक और अनियमितताओं की जांच अधर में लटक गई है। इस मामले की जांच के लिए गठित दो समितियों में से किसी ने भी अब तक अपनी रिपोर्ट नहीं सौंपी है, जिससे संस्थान की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। संस्थान ने आंतरिक जांच के लिए एक फैक्ट-इनवेस्टिगेशन कमेटी का गठन किया था, जिसे 14 अप्रैल तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी। हालांकि, समिति इस समय सीमा का पालन करने में विफल रही। दोनों समितियों को शुरुआत में एक सप्ताह का समय दिया गया था। IGIMS प्रशासन ने एक ही प्रवक्ता नियुक्त किया जांच में हो रही देरी और बढ़ते दबाव के बीच IGIMS प्रशासन ने सख्त कदम उठाए हैं। संस्थान के निदेशक डॉ. बिंदे कुमार ने 15 अप्रैल को एक आदेश जारी कर उप-निदेशक (प्रशासन) डॉ. बिभूति प्रसन्न सिन्हा को संस्थान का एकमात्र आधिकारिक प्रवक्ता नियुक्त किया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि अब कोई अन्य अधिकारी मीडिया से बातचीत नहीं करेगा। निर्देश का उल्लंघन करने पर प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब यह मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है और मीडिया में विभिन्न प्रकार की जानकारी सामने आ रही है। चार सदस्यीय समिति कर रही मुख्य जांच मुख्य जांच के लिए गठित चार सदस्यीय समिति की अध्यक्षता डीन (अकादमिक) डॉ. ओम कुमार कर रहे हैं। इस समिति में डॉ. बिभूति प्रसन्न सिन्हा, रजिस्ट्रार डॉ. सर्वेश कुमार सिंह और मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रफुल रंजन शामिल हैं। यह टीम परीक्षा प्रक्रिया, उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन और संभावित गड़बड़ियों के सभी पहलुओं की जांच कर रही है। सूत्रों के अनुसार, समिति ने परीक्षा सेल से जुड़े कई अधिकारियों और कर्मचारियों के बयान दर्ज किए हैं और उन्हें उपलब्ध दस्तावेजों व अन्य साक्ष्यों से मिलान किया जा रहा है।
CCTV फुटेज की पूरी जांच अब तक नहीं जांच में सबसे बड़ी बाधा सीमित निगरानी व्यवस्था बन रही है। संस्थान के सूत्र बताते हैं कि परीक्षा कक्ष के कई महत्वपूर्ण हिस्से सीसीटीवी कवरेज के बावजूद प्रभावी निगरानी में नहीं हैं। कुछ हिस्सों को ‘ब्लाइंड जोन’ माना जा रहा है, जहां की गतिविधियों का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज की भी अब तक पूरी तरह से जांच नहीं की जा सकी है। अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के निर्देशों के बावजूद संस्थान में व्यापक और प्रभावी सीसीटीवी कवरेज सुनिश्चित नहीं हो पाया। दूसरी कमेटी भी गठित, मीडिया रिपोर्ट्स की जांच मामले के तूल पकड़ने के बाद संस्थान ने 10 अप्रैल को एक दूसरी तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। इस समिति की अध्यक्षता डॉ. संजय कुमार कर रहे हैं, जबकि इसमें डॉ. ज्ञान भास्कर और डॉ. अवनीश कुमार को सदस्य बनाया गया है। इस समिति का काम मुख्य रूप से मीडिया में आई रिपोर्टों और दावों की जांच करना है। हालांकि, दूसरी समिति का गठन पहली समिति को भंग किए बिना ही किया गया, जबकि पहली समिति अपनी जांच लगभग पूरी करने के करीब बताई जा रही थी। ऐसे में दो समानांतर जांचों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। दो कमेटियां बनी, लेकिन किसी ने रिपोर्ट नहीं सौंपी सूत्रों के अनुसार, मुख्य जांच समिति का गठन करने के बाद दूसरी समिति अप्रैल में बनाई गई। दोनों को एक सप्ताह में रिपोर्ट देने का निर्देश था, लेकिन समयसीमा बीतने के बाद भी किसी ने अपनी रिपोर्ट नहीं सौंपी है।
इस देरी से न केवल जांच की गति पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि संस्थान की कार्यप्रणाली पर भी चर्चा शुरू हो गई है। निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से जांच होगा- डॉ. विभूति प्रसन्न सिन्हा इस मामले में उप-निदेशक (प्रशासन) डॉ. विभूति प्रसन्न सिन्हा ने दैनिक भास्कर डिजिटल से बातचीत में बताया कि, ‘सभी संभावित पहलुओं को ध्यान में रखकर पड़ताल की जा रही है। जांच अभी जारी है और इस स्तर पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।’ उन्होंने भरोसा दिलाया है कि, ‘जांच प्रक्रिया में भले ही विलंब हो रहा हो, लेकिन जांच पूरी तरह से निष्पक्ष और पारदर्शी होगा।’ प्रिंसिपल को दोनों कमेटियों से बाहर रखने पर उठे सवाल पूरे मामले में एक और अहम बिंदु यह है कि IGIMS मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. रंजीत गुहा को दोनों ही समितियों में शामिल नहीं किया गया है। इसे लेकर संस्थान के अंदर और बाहर सवाल उठ रहे हैं कि इतनी महत्वपूर्ण जांच के दायरे से प्रिंसिपल को बाहर क्यों रखा गया है? गुमनाम ईमेल से खुला मामला, बड़े रैकेट के आरोप यह पूरा मामला 11 मार्च को सामने आया, जब IGIMS के वरिष्ठ अधिकारियों और मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड को एक गुमनाम ईमेल भेजा गया। इस शिकायत में गंभीर आरोप लगाए गए थे कि एक आउटसोर्स गैर-शैक्षणिक कर्मचारी और अन्य लोगों की मिलीभगत से एक रैकेट संचालित हो रहा है। शिकायत के अनुसार, यह गिरोह पैसे लेकर छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर करता था। इतना ही नहीं, कुछ छात्रों को परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिकाओं में बदलाव करने की अनुमति देने का भी आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि 2021 बैच के करीब 40-50 छात्र इस कथित गड़बड़ी में शामिल हो सकते हैं। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि इस तरह की अनियमितताएं पिछले कई वर्षों से चल रही थीं। जांच रिपोर्ट पर टिकी नजरें इस पूरे मामले में सभी की निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मेडिकल शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करेगा। वहीं, देरी से रिपोर्ट आने के कारण यह मामला और भी संवेदनशील होता जा रहा है। अब देखना होगा कि जांच समितियां कब तक अपनी रिपोर्ट सौंपती हैं और IGIMS प्रशासन इस पूरे मामले में क्या ठोस कार्रवाई करता है। पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में MBBS-PG परीक्षाओं में कथित प्रश्नपत्र लीक और अनियमितताओं की जांच अधर में लटक गई है। इस मामले की जांच के लिए गठित दो समितियों में से किसी ने भी अब तक अपनी रिपोर्ट नहीं सौंपी है, जिससे संस्थान की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। संस्थान ने आंतरिक जांच के लिए एक फैक्ट-इनवेस्टिगेशन कमेटी का गठन किया था, जिसे 14 अप्रैल तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी। हालांकि, समिति इस समय सीमा का पालन करने में विफल रही। दोनों समितियों को शुरुआत में एक सप्ताह का समय दिया गया था। IGIMS प्रशासन ने एक ही प्रवक्ता नियुक्त किया जांच में हो रही देरी और बढ़ते दबाव के बीच IGIMS प्रशासन ने सख्त कदम उठाए हैं। संस्थान के निदेशक डॉ. बिंदे कुमार ने 15 अप्रैल को एक आदेश जारी कर उप-निदेशक (प्रशासन) डॉ. बिभूति प्रसन्न सिन्हा को संस्थान का एकमात्र आधिकारिक प्रवक्ता नियुक्त किया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि अब कोई अन्य अधिकारी मीडिया से बातचीत नहीं करेगा। निर्देश का उल्लंघन करने पर प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब यह मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है और मीडिया में विभिन्न प्रकार की जानकारी सामने आ रही है। चार सदस्यीय समिति कर रही मुख्य जांच मुख्य जांच के लिए गठित चार सदस्यीय समिति की अध्यक्षता डीन (अकादमिक) डॉ. ओम कुमार कर रहे हैं। इस समिति में डॉ. बिभूति प्रसन्न सिन्हा, रजिस्ट्रार डॉ. सर्वेश कुमार सिंह और मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रफुल रंजन शामिल हैं। यह टीम परीक्षा प्रक्रिया, उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन और संभावित गड़बड़ियों के सभी पहलुओं की जांच कर रही है। सूत्रों के अनुसार, समिति ने परीक्षा सेल से जुड़े कई अधिकारियों और कर्मचारियों के बयान दर्ज किए हैं और उन्हें उपलब्ध दस्तावेजों व अन्य साक्ष्यों से मिलान किया जा रहा है।
CCTV फुटेज की पूरी जांच अब तक नहीं जांच में सबसे बड़ी बाधा सीमित निगरानी व्यवस्था बन रही है। संस्थान के सूत्र बताते हैं कि परीक्षा कक्ष के कई महत्वपूर्ण हिस्से सीसीटीवी कवरेज के बावजूद प्रभावी निगरानी में नहीं हैं। कुछ हिस्सों को ‘ब्लाइंड जोन’ माना जा रहा है, जहां की गतिविधियों का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज की भी अब तक पूरी तरह से जांच नहीं की जा सकी है। अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के निर्देशों के बावजूद संस्थान में व्यापक और प्रभावी सीसीटीवी कवरेज सुनिश्चित नहीं हो पाया। दूसरी कमेटी भी गठित, मीडिया रिपोर्ट्स की जांच मामले के तूल पकड़ने के बाद संस्थान ने 10 अप्रैल को एक दूसरी तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। इस समिति की अध्यक्षता डॉ. संजय कुमार कर रहे हैं, जबकि इसमें डॉ. ज्ञान भास्कर और डॉ. अवनीश कुमार को सदस्य बनाया गया है। इस समिति का काम मुख्य रूप से मीडिया में आई रिपोर्टों और दावों की जांच करना है। हालांकि, दूसरी समिति का गठन पहली समिति को भंग किए बिना ही किया गया, जबकि पहली समिति अपनी जांच लगभग पूरी करने के करीब बताई जा रही थी। ऐसे में दो समानांतर जांचों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। दो कमेटियां बनी, लेकिन किसी ने रिपोर्ट नहीं सौंपी सूत्रों के अनुसार, मुख्य जांच समिति का गठन करने के बाद दूसरी समिति अप्रैल में बनाई गई। दोनों को एक सप्ताह में रिपोर्ट देने का निर्देश था, लेकिन समयसीमा बीतने के बाद भी किसी ने अपनी रिपोर्ट नहीं सौंपी है।
इस देरी से न केवल जांच की गति पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि संस्थान की कार्यप्रणाली पर भी चर्चा शुरू हो गई है। निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से जांच होगा- डॉ. विभूति प्रसन्न सिन्हा इस मामले में उप-निदेशक (प्रशासन) डॉ. विभूति प्रसन्न सिन्हा ने दैनिक भास्कर डिजिटल से बातचीत में बताया कि, ‘सभी संभावित पहलुओं को ध्यान में रखकर पड़ताल की जा रही है। जांच अभी जारी है और इस स्तर पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।’ उन्होंने भरोसा दिलाया है कि, ‘जांच प्रक्रिया में भले ही विलंब हो रहा हो, लेकिन जांच पूरी तरह से निष्पक्ष और पारदर्शी होगा।’ प्रिंसिपल को दोनों कमेटियों से बाहर रखने पर उठे सवाल पूरे मामले में एक और अहम बिंदु यह है कि IGIMS मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. रंजीत गुहा को दोनों ही समितियों में शामिल नहीं किया गया है। इसे लेकर संस्थान के अंदर और बाहर सवाल उठ रहे हैं कि इतनी महत्वपूर्ण जांच के दायरे से प्रिंसिपल को बाहर क्यों रखा गया है? गुमनाम ईमेल से खुला मामला, बड़े रैकेट के आरोप यह पूरा मामला 11 मार्च को सामने आया, जब IGIMS के वरिष्ठ अधिकारियों और मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड को एक गुमनाम ईमेल भेजा गया। इस शिकायत में गंभीर आरोप लगाए गए थे कि एक आउटसोर्स गैर-शैक्षणिक कर्मचारी और अन्य लोगों की मिलीभगत से एक रैकेट संचालित हो रहा है। शिकायत के अनुसार, यह गिरोह पैसे लेकर छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर करता था। इतना ही नहीं, कुछ छात्रों को परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिकाओं में बदलाव करने की अनुमति देने का भी आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि 2021 बैच के करीब 40-50 छात्र इस कथित गड़बड़ी में शामिल हो सकते हैं। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि इस तरह की अनियमितताएं पिछले कई वर्षों से चल रही थीं। जांच रिपोर्ट पर टिकी नजरें इस पूरे मामले में सभी की निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मेडिकल शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करेगा। वहीं, देरी से रिपोर्ट आने के कारण यह मामला और भी संवेदनशील होता जा रहा है। अब देखना होगा कि जांच समितियां कब तक अपनी रिपोर्ट सौंपती हैं और IGIMS प्रशासन इस पूरे मामले में क्या ठोस कार्रवाई करता है।  

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