एचएससी केंद्रों में वितरण के लिए दी जाती है दवा, किसने फेंका जानकारी नहीं

भास्कर न्यूज | केनगर सीएचसी केनगर की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। डायरिया जैसी बीमारी की रोकथाम के लिए बच्चों को दी जाने वाली जिंक टैबलेट अस्पताल के मुख्य गेट के उत्तर दिशा में स्थित एक बंद पड़ी मेडिकल दुकान के सामने फेंका जा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि फेंकी गई जिंक टैबलेट की करीब 15 पैकेट (1500 टैबलेट) अभी एक्सपायर भी नहीं हुई थीं। स्ट्रीप में दवा का एक्सपायरी डेट मार्च 2027 अंकित है। एक तरफ जहां दवाइयां फेंकी जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर अस्पताल पहुंचे मरीजों को दवा काउंटर से खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। सरकारी दावों के विपरीत अस्पताल परिसर में दवाओं की बर्बादी और मरीजों को बाहर से दवा खरीदने की मजबूरी ने स्वास्थ्य विभाग की पोल खोल दी है। डॉक्टर को दिखने केनगर सीएचसी पहुंची शिशवा निवासी रानी देवी और उनके भाई नीरज कुमार ने बताया कि पर्ची कटाने के बाद भी उन्हें पूरी दवाइयां नहीं दी गईं। रानी देवी को 50 कैप्सूल दिए गए, लेकिन सूची में शामिल मलहम और एलर्जी की दवा नहीं मिली। वहीं नीरज कुमार को 35 कैप्सूल और एक मलहम दिया गया, लेकिन उनकी भी एक महत्वपूर्ण दवा कम थी। मरीजों ने बताया की काउंटर पर मौजूद कर्मियों ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि जो दवा नहीं है, उसे बाहर से खरीद लें। केमिस्ट शशि कुमार से बात की गई, तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा, जो दवा उपलब्ध होगी, वही दी जाएगी। फेंकी गई दवाइयों के बारे में उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर करते हुए कहा कि जिंक टैबलेट इमरजेंसी, डिलीवरी वार्ड और क्षेत्र के 33 एचएससी केंद्रों में वितरण के लिए दी जाती है। उन्होंने तर्क दिया कि मीटिंग के दौरान सभी सेंटरों को दवा दी जाती है, अब कोई उसे कहां फेंक देता है, इसकी जिम्मेदारी उनकी नहीं है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी भास्कर कुमार ने पहले तो घटना की जानकारी होने से इंकार किया, फिर दवा वितरण में हो रही धांधली पर बेबसी जाहिर करते हुए कहा, “हम कर्मियों को बोलते-बोलते थक गए हैं। अब हम क्या करें? उन्हें मार तो नहीं सकते। हम खुद भी इन शिकायतों से परेशान हो गए हैं। भास्कर न्यूज | केनगर सीएचसी केनगर की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। डायरिया जैसी बीमारी की रोकथाम के लिए बच्चों को दी जाने वाली जिंक टैबलेट अस्पताल के मुख्य गेट के उत्तर दिशा में स्थित एक बंद पड़ी मेडिकल दुकान के सामने फेंका जा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि फेंकी गई जिंक टैबलेट की करीब 15 पैकेट (1500 टैबलेट) अभी एक्सपायर भी नहीं हुई थीं। स्ट्रीप में दवा का एक्सपायरी डेट मार्च 2027 अंकित है। एक तरफ जहां दवाइयां फेंकी जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर अस्पताल पहुंचे मरीजों को दवा काउंटर से खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। सरकारी दावों के विपरीत अस्पताल परिसर में दवाओं की बर्बादी और मरीजों को बाहर से दवा खरीदने की मजबूरी ने स्वास्थ्य विभाग की पोल खोल दी है। डॉक्टर को दिखने केनगर सीएचसी पहुंची शिशवा निवासी रानी देवी और उनके भाई नीरज कुमार ने बताया कि पर्ची कटाने के बाद भी उन्हें पूरी दवाइयां नहीं दी गईं। रानी देवी को 50 कैप्सूल दिए गए, लेकिन सूची में शामिल मलहम और एलर्जी की दवा नहीं मिली। वहीं नीरज कुमार को 35 कैप्सूल और एक मलहम दिया गया, लेकिन उनकी भी एक महत्वपूर्ण दवा कम थी। मरीजों ने बताया की काउंटर पर मौजूद कर्मियों ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि जो दवा नहीं है, उसे बाहर से खरीद लें। केमिस्ट शशि कुमार से बात की गई, तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा, जो दवा उपलब्ध होगी, वही दी जाएगी। फेंकी गई दवाइयों के बारे में उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर करते हुए कहा कि जिंक टैबलेट इमरजेंसी, डिलीवरी वार्ड और क्षेत्र के 33 एचएससी केंद्रों में वितरण के लिए दी जाती है। उन्होंने तर्क दिया कि मीटिंग के दौरान सभी सेंटरों को दवा दी जाती है, अब कोई उसे कहां फेंक देता है, इसकी जिम्मेदारी उनकी नहीं है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी भास्कर कुमार ने पहले तो घटना की जानकारी होने से इंकार किया, फिर दवा वितरण में हो रही धांधली पर बेबसी जाहिर करते हुए कहा, “हम कर्मियों को बोलते-बोलते थक गए हैं। अब हम क्या करें? उन्हें मार तो नहीं सकते। हम खुद भी इन शिकायतों से परेशान हो गए हैं।  

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