राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (आरयूएचएस) जयपुर द्वारा सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत आंसर बुक की सर्टिफाइड कॉपी देने पर वसूले जा रहे 1000 रुपए के प्रोसेसिंग शुल्क को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने वर्ष 2021 में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए 6 मार्च को यह रिपोर्टेबल जजमेंट दिया। मामले के अनुसार जोधपुर के विष्णु नगर निवासी याचिकाकर्ता विपिका पुत्री सुभाष गहलोत बी.एससी. नर्सिंग कोर्स के अंतिम वर्ष में मिडवाइफरी ऑब्स्टेट्रिकल नर्सिंग और कम्युनिटी हेल्थ नर्सिंग-II विषयों में फेल हो गई थी। रिजल्ट के बाद याचिकाकर्ता ने आरटीआई कानून के तहत अपनी आंसर बुक्स की कॉपी के लिए आवेदन कर निर्धारित शुल्क जमा करवाया। इसके जवाब में विश्वविद्यालय ने 2 फरवरी 2021 को पत्र भेजकर याचिकाकर्ता से प्रति आंसर बुक 1000 रुपए प्रोसेसिंग फीस, 80 रुपए पेज शुल्क (2 रुपए प्रति पेज के हिसाब से 40 पेज) और 145 रुपए डाक शुल्क सहित कुल 1225 रुपए की मांग की, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। प्रोसेसिंग फीस आरटीआई का खुला उल्लंघन याचिकाकर्ता के वकील रज्जाक खान और सरवर खान ने तर्क दिया कि 1000 रुपए प्रोसेसिंग फीस वसूलना सीधे तौर पर आरटीआई कानून और सूचना का अधिकार (फीस और लागत का विनियमन) नियम, 2005 का स्पष्ट उल्लंघन है। वकील ने तर्क दिया कि नियम 3 के तहत आवेदन शुल्क केवल 10 रुपए तय है। वकील ने तर्क दिया कि इतना अधिक शुल्क वसूलकर विश्वविद्यालय इस कानून को ही निष्प्रभावी बनाने का प्रयास कर रहा है। इसके समर्थन में वकील ने पूर्व में आए अल्का मटोरिया बनाम महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय मामले का हवाला दिया, जिसमें इसी तरह के 1000 रुपए के शुल्क को अवैध ठहराया गया था। विवि का तर्क: तीन कर्मचारी संभालते हैं 6.50 लाख आंसर बुक्स विश्वविद्यालय के वकील ने आरटीआई कानून की धारा 7 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि विश्वविद्यालय सूचना उपलब्ध कराने की लागत वसूलने के लिए स्वतंत्र है। वकील ने तर्क दिया कि शुल्क प्रबंधन बोर्ड की 1 दिसंबर 2014 की बैठक में स्वीकृत किया गया था। विवि में लगभग 6.50 लाख आंसर बुक्स सुरक्षित रखी जाती हैं और इसके लिए संविदा पर रखे गए तीन कर्मचारियों के वार्षिक वेतन 3.60 लाख रुपए का हिसाब लगाकर तथा उसे हर साल आने वाले 350 आवेदनों से भाग देकर 1028 रुपए प्रति आवेदन की लागत आती है। वकील ने तर्क दिया कि राज्य सरकार के 12 अक्टूबर 2018 के परिपत्र के अनुसार विशेष नियमों के तहत अलग शुल्क लगाया जा सकता है। आरटीआई कानून का सर्वोपरि होना कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरटीआई कानून की धारा 22 इस कानून को अन्य किसी भी कानून या नियमों पर प्राथमिकता प्रदान करती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब आवेदन आरटीआई कानून के तहत किया जा रहा है, तो विवि के अपने दिशा-निर्देश इस अधिनियम के प्रावधानों को खत्म नहीं कर सकते। नियम 2012 के तहत ए-3 या उससे छोटे साइज के पेपर की फोटोकॉपी के लिए अधिकतम 2 रुपए प्रति पेज ही लिया जा सकता है। पारदर्शिता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संदर्भ कोर्ट ने इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (ICAI) बनाम शौनक एच. सत्या मामले का संदर्भ देते हुए लिखा कि पारदर्शी युग में अनुचित गोपनीयता की पुरानी प्रथाओं के लिए कोई जगह नहीं है तथा अतिरिक्त कार्यभार कोई बचाव नहीं है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) बनाम आदित्य बंदोपाध्याय मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परीक्षा निकाय नियमों का हवाला देकर छात्रों को उत्तर पुस्तिका देखने या कॉपी लेने से नहीं रोक सकते। इसके अलावा इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरीज ऑफ इंडिया बनाम पारस जैन का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि RTI के तहत आवेदन होने पर केवल उसी अधिनियम के नियमों के अनुसार ही शुल्क लिया जा सकता है। हाईकोर्ट: फीस वसूली दुर्भावनापूर्ण प्रयास कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि विश्वविद्यालय द्वारा 1000 रुपए प्रोसेसिंग शुल्क वसूलना न्यायोचित नहीं है। अल्का मटोरिया मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह छात्रों को आंसर बुक की सर्टिफाइड कॉपी मांगने से हतोत्साहित करने का एक दुर्भावनापूर्ण प्रयास लग रहा है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि 6 सितंबर 2012 के दिशा-निर्देशों और 20 दिसंबर 2014 के मैनेजमेंट बोर्ड के फैसले को प्रति आवेदन 1000 रुपए प्रोसेसिंग फीस वसूलने की सीमा तक रद्द किया जाता है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि विश्वविद्यालय अब आरटीआई नियम 2012 में निर्धारित शुल्क वसूलने के बाद ही छात्रों को जानकारी प्रदान करे।


