इतिहास की कई सदियां गुजर गईं, राजवंश बदले, शहरों का स्वरूप बदला, लेकिन मुंगेर की धरती पर खड़ा एक विशाल वट वृक्ष आज भी अपनी जड़ों के साथ मजबूती से खड़ा है। करीब 700 वर्ष पुराने इस बरगद को अब देश के महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहरों में शामिल करने की तैयारी शुरू हो गई है। वन विभाग ने इसे हेरिटेज ट्री घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके बाद वैज्ञानिक तरीके से इसके संरक्षण और देखरेख की योजना बनाई जाएगी। मुंगेर के आईटीसी पार्क परिसर में स्थित यह विशाल वट वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि सात सौ वर्षों के इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। माना जाता है कि इस वृक्ष ने कई साम्राज्यों के उत्थान-पतन, सामाजिक बदलाव और ऐतिहासिक घटनाओं को अपनी आंखों के सामने गुजरते देखा है। वैज्ञानिक जांच में हुई 700 वर्ष पुराना होने की पुष्टि वर्ष 2022 में बिहार जैव विविधता बोर्ड की ओर से राज्य के 32 प्राचीन वृक्षों का सर्वेक्षण कराया गया था। इस सर्वेक्षण में मुंगेर के तीन पुराने वृक्षों को भी शामिल किया गया। इसके बाद लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने आईटीसी परिसर में मौजूद इस बरगद का वैज्ञानिक अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने कार्बन डेटिंग पद्धति के माध्यम से वृक्ष के तने और सूख चुकी जटाओं के नमूने एकत्र किए। लंबे समय तक चले शोध और जांच के बाद यह पुष्टि हुई कि यह वट वृक्ष लगभग 700 वर्ष पुराना है। अध्ययन में इसे देश के सबसे पुराने जीवित वृक्षों में से एक माना गया है। इसकी उम्र और संरचना ने वैज्ञानिकों को भी हैरान किया है। 100 मीटर क्षेत्र में फैला है विशाल बरगद यह वट वृक्ष अपनी विशालता के कारण लोगों के आकर्षण का केंद्र है। करीब 100 मीटर के दायरे में फैले इस पेड़ की ऊंचाई लगभग 60 फीट है। इसकी सैकड़ों हवाई जड़ें जमीन तक पहुंचकर नए तनों का रूप ले चुकी हैं। दूर से देखने पर यह वृक्ष किसी छोटे जंगल की तरह दिखाई देता है। इसकी मजबूत जड़ प्रणाली और प्राकृतिक विस्तार के कारण तेज आंधी और तूफान भी इसे नुकसान नहीं पहुंचा सके। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह वृक्ष वर्षों से लोगों के लिए पहचान का केंद्र रहा है। कई पीढ़ियों ने इस बरगद को उसी स्थान पर खड़ा देखा है। 1934 के भूकंप में भी नहीं हिला था यह वृक्ष इतिहास के कई कठिन दौरों का यह वट वृक्ष गवाह रहा है। वर्ष 1934 में आए विनाशकारी बिहार-नेपाल भूकंप ने मुंगेर सहित आसपास के कई क्षेत्रों को प्रभावित किया था। उस समय कई इमारतें और संरचनाएं क्षतिग्रस्त हो गई थीं, लेकिन यह विशाल बरगद मजबूती के साथ खड़ा रहा। आईटीसी प्रबंधन के अनुसार, वर्ष 1906 में जब फैक्ट्री की स्थापना हुई थी, उस समय भी यह वृक्ष परिसर में मौजूद था। यानी यह पेड़ औद्योगिक इतिहास के एक बड़े दौर का भी साक्षी रहा है। हेरिटेज ट्री बनने के बाद वैज्ञानिक तरीके से होगा संरक्षण वन प्रमंडल पदाधिकारी अमरीश कुमार मल्ल ने बताया कि इस वृक्ष को हेरिटेज ट्री घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। दर्जा मिलने के बाद इसके संरक्षण के लिए विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की मदद ली जाएगी। उन्होंने बताया कि वृक्ष की नियमित निगरानी, वैज्ञानिक परीक्षण और जैविक उपचार के जरिए इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इतना पुराना वृक्ष केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक धरोहर भी है। इसलिए इसके संरक्षण को प्राथमिकता दी जा रही है। शाखाओं और जड़ों की देखभाल होगी बड़ी चुनौती बिहार वानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान संस्थान (बीएफसीआरआई) के अधिष्ठाता डॉ. अनिल कुमार पासवान ने बताया कि इतने पुराने और विशाल वृक्ष का संरक्षण आसान काम नहीं है। इसकी भारी शाखाओं और दूर तक फैली जड़ों की नियमित देखभाल जरूरी है। उन्होंने बताया कि वृक्ष से निकलने वाली हवाई जड़ों को सुरक्षित तरीके से जमीन तक पहुंचाने के लिए बांस या अन्य कृत्रिम सहारों की जरूरत पड़ सकती है। इससे नई जड़ों को मजबूती मिलेगी और वृक्ष का विस्तार सुरक्षित रहेगा। दीमक और संक्रमण से बचाने की होगी तैयारी डॉ. पासवान ने बताया कि उम्र बढ़ने के साथ पुराने वृक्षों में दीमक, फंगल संक्रमण और आंतरिक क्षरण जैसी समस्याएं आ सकती हैं। इससे बचाने के लिए समय-समय पर वैज्ञानिक जांच जरूरी होगी। उन्होंने कहा कि वृक्ष की जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषक तत्व मिलते रहें, इसके लिए बेहतर जल प्रबंधन और आसपास संरक्षित क्षेत्र का विकास भी आवश्यक है। यदि संरक्षण की यह योजना सफल रही तो मुंगेर का यह ऐतिहासिक बरगद आने वाली कई सदियों तक अपनी कहानी सुनाता रहेगा। यह वृक्ष केवल प्रकृति की देन नहीं, बल्कि इतिहास की एक ऐसी धरोहर है जो समय के बदलावों के बीच आज भी जीवित खड़ी है। इतिहास की कई सदियां गुजर गईं, राजवंश बदले, शहरों का स्वरूप बदला, लेकिन मुंगेर की धरती पर खड़ा एक विशाल वट वृक्ष आज भी अपनी जड़ों के साथ मजबूती से खड़ा है। करीब 700 वर्ष पुराने इस बरगद को अब देश के महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहरों में शामिल करने की तैयारी शुरू हो गई है। वन विभाग ने इसे हेरिटेज ट्री घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके बाद वैज्ञानिक तरीके से इसके संरक्षण और देखरेख की योजना बनाई जाएगी। मुंगेर के आईटीसी पार्क परिसर में स्थित यह विशाल वट वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि सात सौ वर्षों के इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। माना जाता है कि इस वृक्ष ने कई साम्राज्यों के उत्थान-पतन, सामाजिक बदलाव और ऐतिहासिक घटनाओं को अपनी आंखों के सामने गुजरते देखा है। वैज्ञानिक जांच में हुई 700 वर्ष पुराना होने की पुष्टि वर्ष 2022 में बिहार जैव विविधता बोर्ड की ओर से राज्य के 32 प्राचीन वृक्षों का सर्वेक्षण कराया गया था। इस सर्वेक्षण में मुंगेर के तीन पुराने वृक्षों को भी शामिल किया गया। इसके बाद लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने आईटीसी परिसर में मौजूद इस बरगद का वैज्ञानिक अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने कार्बन डेटिंग पद्धति के माध्यम से वृक्ष के तने और सूख चुकी जटाओं के नमूने एकत्र किए। लंबे समय तक चले शोध और जांच के बाद यह पुष्टि हुई कि यह वट वृक्ष लगभग 700 वर्ष पुराना है। अध्ययन में इसे देश के सबसे पुराने जीवित वृक्षों में से एक माना गया है। इसकी उम्र और संरचना ने वैज्ञानिकों को भी हैरान किया है। 100 मीटर क्षेत्र में फैला है विशाल बरगद यह वट वृक्ष अपनी विशालता के कारण लोगों के आकर्षण का केंद्र है। करीब 100 मीटर के दायरे में फैले इस पेड़ की ऊंचाई लगभग 60 फीट है। इसकी सैकड़ों हवाई जड़ें जमीन तक पहुंचकर नए तनों का रूप ले चुकी हैं। दूर से देखने पर यह वृक्ष किसी छोटे जंगल की तरह दिखाई देता है। इसकी मजबूत जड़ प्रणाली और प्राकृतिक विस्तार के कारण तेज आंधी और तूफान भी इसे नुकसान नहीं पहुंचा सके। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह वृक्ष वर्षों से लोगों के लिए पहचान का केंद्र रहा है। कई पीढ़ियों ने इस बरगद को उसी स्थान पर खड़ा देखा है। 1934 के भूकंप में भी नहीं हिला था यह वृक्ष इतिहास के कई कठिन दौरों का यह वट वृक्ष गवाह रहा है। वर्ष 1934 में आए विनाशकारी बिहार-नेपाल भूकंप ने मुंगेर सहित आसपास के कई क्षेत्रों को प्रभावित किया था। उस समय कई इमारतें और संरचनाएं क्षतिग्रस्त हो गई थीं, लेकिन यह विशाल बरगद मजबूती के साथ खड़ा रहा। आईटीसी प्रबंधन के अनुसार, वर्ष 1906 में जब फैक्ट्री की स्थापना हुई थी, उस समय भी यह वृक्ष परिसर में मौजूद था। यानी यह पेड़ औद्योगिक इतिहास के एक बड़े दौर का भी साक्षी रहा है। हेरिटेज ट्री बनने के बाद वैज्ञानिक तरीके से होगा संरक्षण वन प्रमंडल पदाधिकारी अमरीश कुमार मल्ल ने बताया कि इस वृक्ष को हेरिटेज ट्री घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। दर्जा मिलने के बाद इसके संरक्षण के लिए विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की मदद ली जाएगी। उन्होंने बताया कि वृक्ष की नियमित निगरानी, वैज्ञानिक परीक्षण और जैविक उपचार के जरिए इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इतना पुराना वृक्ष केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक धरोहर भी है। इसलिए इसके संरक्षण को प्राथमिकता दी जा रही है। शाखाओं और जड़ों की देखभाल होगी बड़ी चुनौती बिहार वानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान संस्थान (बीएफसीआरआई) के अधिष्ठाता डॉ. अनिल कुमार पासवान ने बताया कि इतने पुराने और विशाल वृक्ष का संरक्षण आसान काम नहीं है। इसकी भारी शाखाओं और दूर तक फैली जड़ों की नियमित देखभाल जरूरी है। उन्होंने बताया कि वृक्ष से निकलने वाली हवाई जड़ों को सुरक्षित तरीके से जमीन तक पहुंचाने के लिए बांस या अन्य कृत्रिम सहारों की जरूरत पड़ सकती है। इससे नई जड़ों को मजबूती मिलेगी और वृक्ष का विस्तार सुरक्षित रहेगा। दीमक और संक्रमण से बचाने की होगी तैयारी डॉ. पासवान ने बताया कि उम्र बढ़ने के साथ पुराने वृक्षों में दीमक, फंगल संक्रमण और आंतरिक क्षरण जैसी समस्याएं आ सकती हैं। इससे बचाने के लिए समय-समय पर वैज्ञानिक जांच जरूरी होगी। उन्होंने कहा कि वृक्ष की जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषक तत्व मिलते रहें, इसके लिए बेहतर जल प्रबंधन और आसपास संरक्षित क्षेत्र का विकास भी आवश्यक है। यदि संरक्षण की यह योजना सफल रही तो मुंगेर का यह ऐतिहासिक बरगद आने वाली कई सदियों तक अपनी कहानी सुनाता रहेगा। यह वृक्ष केवल प्रकृति की देन नहीं, बल्कि इतिहास की एक ऐसी धरोहर है जो समय के बदलावों के बीच आज भी जीवित खड़ी है।


