कटिहार शहर की इमरजेंसी कॉलोनी स्थित जागृति संघ में दुर्गा पूजा का आयोजन महिला सशक्तीकरण और सांस्कृतिक परंपरा की मिसाल है। यहां वर्ष 1967 से महिला संगठन दुर्गा पूजा की पूरी जिम्मेदारी संभाल रहा है। पूजा की तैयारी से लेकर चंदा संग्रह, पंडाल निर्माण और मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने तक की व्यवस्था महिलाएं स्वयं करती हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाई जा रही है। जागृति संघ में हर साल दुर्गा पूजा के अवसर पर भव्य पंडाल बनाया जाता है। इसमें महिला संगठन की सदस्य मिलकर योगदान देती हैं। पूजा की तैयारियों से लेकर आयोजन के संचालन तक महिलाएं सक्रिय भूमिका निभाती हैं। उनके सामूहिक प्रयास से यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि महिलाओं की एकजुटता और आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक बन गया है। चंदा संग्रह से पूजा की व्यवस्था तक महिलाओं की जिम्मेदारी महिला संगठन की सचिव मनोरमा देवी, अध्यक्ष सुनीता झा और मीणा कुमारी ने बताया कि जागृति संघ में दुर्गा पूजा की परंपरा वर्ष 1967 से चली आ रही है। संगठन की महिलाएं मिलकर पूजा की तैयारियां करती हैं और आयोजन से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाती हैं। चंदा जुटाने से लेकर प्रतिमा स्थापना और पूजा की व्यवस्था तक में उनकी भागीदारी रहती है। उन्होंने बताया कि संगठन की महिलाएं पूरे उत्साह और आपसी सहयोग से इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। उनका प्रयास रहता है कि हर साल पूजा का आयोजन बेहतर तरीके से हो और धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाए। कई दशकों से जारी यह पहल नई पीढ़ी की महिलाओं को भी सामूहिक जिम्मेदारी निभाने के लिए प्रेरित करती है। विजयादशमी पर सिंदूर खेला की परंपरा जागृति संघ में दुर्गा पूजा के अंतिम दिन विजयादशमी पर सिंदूर खेला का आयोजन विशेष आकर्षण रहता है। बंगाली परंपरा से जुड़ी इस रस्म में महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और मां दुर्गा से परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली और मंगल की कामना करती हैं। महिला संगठन की सदस्यों ने बताया कि जागृति संघ में वर्षों से इस परंपरा का पालन किया जा रहा है। विजयादशमी के दिन महिलाएं पारंपरिक तरीके से सिंदूर खेला में भाग लेती हैं। यह रस्म महिलाओं के बीच प्रेम, सौहार्द और आपसी जुड़ाव को मजबूत करने का अवसर भी बनती है। धार्मिक आयोजन के साथ महिला एकजुटता का संदेश महिला संगठन की सदस्यों का कहना है कि जागृति संघ में दुर्गा पूजा आयोजित करने का उद्देश्य केवल धार्मिक परंपराओं का निर्वहन करना नहीं है, बल्कि महिलाओं की एकजुटता और सांस्कृतिक विरासत को भी मजबूत करना है। सभी सदस्य मिलकर आयोजन को सफल बनाने में योगदान देती हैं। वर्ष 1967 से जारी यह पहल बताती है कि सामूहिक इच्छाशक्ति और सहयोग से महिलाएं लंबे समय तक किसी परंपरा को सहेज सकती हैं। जागृति संघ की दुर्गा पूजा इसी विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम बनी हुई है। इस अवसर पर संगठन की उपाध्यक्ष पायल कुमारी, सीमा कुमारी, पूजा कुमारी, मंजू देवी, राज कुमार कमेटी, संजय कुमार शाह, चेयरमैन विश्वजीत घोष और पुरोहित यदुनंदन सौरभ सहित अन्य लोग उपस्थित रहे। कटिहार शहर की इमरजेंसी कॉलोनी स्थित जागृति संघ में दुर्गा पूजा का आयोजन महिला सशक्तीकरण और सांस्कृतिक परंपरा की मिसाल है। यहां वर्ष 1967 से महिला संगठन दुर्गा पूजा की पूरी जिम्मेदारी संभाल रहा है। पूजा की तैयारी से लेकर चंदा संग्रह, पंडाल निर्माण और मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने तक की व्यवस्था महिलाएं स्वयं करती हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाई जा रही है। जागृति संघ में हर साल दुर्गा पूजा के अवसर पर भव्य पंडाल बनाया जाता है। इसमें महिला संगठन की सदस्य मिलकर योगदान देती हैं। पूजा की तैयारियों से लेकर आयोजन के संचालन तक महिलाएं सक्रिय भूमिका निभाती हैं। उनके सामूहिक प्रयास से यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि महिलाओं की एकजुटता और आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक बन गया है। चंदा संग्रह से पूजा की व्यवस्था तक महिलाओं की जिम्मेदारी महिला संगठन की सचिव मनोरमा देवी, अध्यक्ष सुनीता झा और मीणा कुमारी ने बताया कि जागृति संघ में दुर्गा पूजा की परंपरा वर्ष 1967 से चली आ रही है। संगठन की महिलाएं मिलकर पूजा की तैयारियां करती हैं और आयोजन से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाती हैं। चंदा जुटाने से लेकर प्रतिमा स्थापना और पूजा की व्यवस्था तक में उनकी भागीदारी रहती है। उन्होंने बताया कि संगठन की महिलाएं पूरे उत्साह और आपसी सहयोग से इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। उनका प्रयास रहता है कि हर साल पूजा का आयोजन बेहतर तरीके से हो और धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाए। कई दशकों से जारी यह पहल नई पीढ़ी की महिलाओं को भी सामूहिक जिम्मेदारी निभाने के लिए प्रेरित करती है। विजयादशमी पर सिंदूर खेला की परंपरा जागृति संघ में दुर्गा पूजा के अंतिम दिन विजयादशमी पर सिंदूर खेला का आयोजन विशेष आकर्षण रहता है। बंगाली परंपरा से जुड़ी इस रस्म में महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और मां दुर्गा से परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली और मंगल की कामना करती हैं। महिला संगठन की सदस्यों ने बताया कि जागृति संघ में वर्षों से इस परंपरा का पालन किया जा रहा है। विजयादशमी के दिन महिलाएं पारंपरिक तरीके से सिंदूर खेला में भाग लेती हैं। यह रस्म महिलाओं के बीच प्रेम, सौहार्द और आपसी जुड़ाव को मजबूत करने का अवसर भी बनती है। धार्मिक आयोजन के साथ महिला एकजुटता का संदेश महिला संगठन की सदस्यों का कहना है कि जागृति संघ में दुर्गा पूजा आयोजित करने का उद्देश्य केवल धार्मिक परंपराओं का निर्वहन करना नहीं है, बल्कि महिलाओं की एकजुटता और सांस्कृतिक विरासत को भी मजबूत करना है। सभी सदस्य मिलकर आयोजन को सफल बनाने में योगदान देती हैं। वर्ष 1967 से जारी यह पहल बताती है कि सामूहिक इच्छाशक्ति और सहयोग से महिलाएं लंबे समय तक किसी परंपरा को सहेज सकती हैं। जागृति संघ की दुर्गा पूजा इसी विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम बनी हुई है। इस अवसर पर संगठन की उपाध्यक्ष पायल कुमारी, सीमा कुमारी, पूजा कुमारी, मंजू देवी, राज कुमार कमेटी, संजय कुमार शाह, चेयरमैन विश्वजीत घोष और पुरोहित यदुनंदन सौरभ सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।

