सहरसा के सौर बाजार प्रखंड के रौता खेम गांव के 14 साल के छात्र मयंक कुमार ने वह कर दिखाया है, जिसकी कल्पना बड़े-बड़े संसाधनों वाले लोग भी आसानी से नहीं कर पाते। गांव में रहकर केवल एक स्मार्टफोन की मदद से मयंक ने ‘स्मार्ट बजट’ नामक मोबाइल ऐप विकसित किया है। उनकी इस उपलब्धि से प्रभावित होकर दक्षिण कोरिया की दिग्गज टेक कंपनी सैंमसंग ने उन्हें अपना आधिकारिक बिजनेस पार्टनर बनाया है। सबसे खास बात यह है कि मयंक ने बिना किसी लैपटॉप या कंप्यूटर के यह उपलब्धि हासिल की है। वह फिलहाल गांव में रहकर दसवीं कक्षा की पढ़ाई कर रहे हैं और पढ़ाई के साथ-साथ टेक्नोलॉजी की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। बचपन से टेक्नोलॉजी में थी रुचि मयंक, मुकेश कुमार सिंह के इकलौते पुत्र हैं। परिवार के मुताबिक बचपन से ही उन्हें मोबाइल, टेक्नोलॉजी और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में गहरी रुचि थी। जहां गांव के अधिकांश बच्चे खेलकूद में समय बिताते थे, वहीं मयंक घंटों मोबाइल पर नई-नई तकनीकों को समझने में लगे रहते थे। उन्होंने यूट्यूब वीडियो देखकर खुद से HTML और अन्य कोडिंग भाषाएं सीखीं। धीरे-धीरे उनका स्मार्टफोन ही उनकी “डिजिटल लैब” बन गया। उसी छोटे मोबाइल स्क्रीन पर उन्होंने कोडिंग सीखी, प्रयोग किए और आखिरकार अपना ऐप तैयार कर लिया। 10 महीने की मेहनत से तैयार किया ‘स्मार्ट बजट’ ऐप मयंक ने बताया कि ‘स्मार्ट बजट’ ऐप तैयार करने में उन्हें करीब 10 महीने का समय लगा। यह ऐप लोगों को अपने खर्च और बजट को ट्रैक करने में मदद करेगा। हालांकि यह ऐप अभी मार्केट में लॉन्च नहीं हुआ है, लेकिन इसकी तकनीक और डिजाइन से सैमसंग कंपनी काफी प्रभावित हुई। ऐप तैयार होने के बाद मयंक ने इसे ईमेल के जरिए सैमसंग कंपनी को भेज दिया। कुछ दिनों बाद उनके पास कंपनी की ओर से ईमेल और मैसेज आया, जिसमें उनके काम की सराहना की गई और पार्टनरशिप के लिए पंजीकरण करने को कहा गया। अब अपनी कंपनी के मालिक हैं मयंक सैमसंग से प्रतिक्रिया मिलने के बाद मयंक ने अपनी कंपनी का पंजीकरण भी करा लिया। अब वह आधिकारिक रूप से अपनी टेक कंपनी के मालिक बन चुके हैं। मयंक ने कहा, “अब मेरी खुद की कंपनी है। भविष्य में मैं जो भी सॉफ्टवेयर, विंडो या टेक प्रोजेक्ट बनाऊंगा, उसे सैमसंग सहित दुनिया की अन्य कंपनियां भी खरीद सकेंगी।” उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी को सैमसंग की वॉलेट सर्विस के लिए भी पार्टनर अप्रूवल दिया गया है। इसके अलावा उन्हें ‘ग्लोबल इनोवेटर 2026’ सम्मान से भी सम्मानित किया गया है। दक्षिण कोरिया की टीम के साथ करेंगे काम जानकारी के अनुसार मयंक आने वाले समय में सैमसंग के कई प्रोजेक्ट्स पर दक्षिण कोरियाई टीम के साथ काम करेंगे। इतनी कम उम्र में वैश्विक तकनीकी कंपनी के साथ जुड़ना न सिर्फ मयंक बल्कि पूरे बिहार के लिए गर्व की बात मानी जा रही है। ग्रामीण परिवेश से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना युवाओं के लिए प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है। मां बोलीं- पिता मोबाइल इस्तेमाल से नाराज होते थे मयंक की मां गुड्डी कुमारी ने बताया कि उनका बेटा बचपन से ही सॉफ्टवेयर डेवलपर बनने का सपना देखता था। परिवार के अन्य सदस्य उसे पढ़ाई करके अधिकारी बनने की सलाह देते थे, लेकिन मयंक हमेशा टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में कुछ बड़ा करने की बात करता था। उन्होंने कहा, “उसके पिताजी ज्यादा मोबाइल इस्तेमाल पसंद नहीं करते थे, लेकिन वह मेरे मोबाइल पर घंटों यूट्यूब देखकर कोडिंग सीखता रहता था। आज बेटे की सफलता पर पूरा परिवार गर्व महसूस कर रहा है।” गांव से ग्लोबल टेक दुनिया तक का सफर सहरसा जैसे छोटे शहर और गांव की पृष्ठभूमि से निकलकर मयंक ने यह साबित कर दिया कि बड़े सपनों के लिए महंगे संसाधनों की नहीं, बल्कि जुनून, मेहनत और लगन की जरूरत होती है। जहां आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी संसाधनों की कमी है, वहीं मयंक ने केवल एक स्मार्टफोन के सहारे वैश्विक तकनीकी दुनिया में अपनी पहचान बना ली। उनकी कहानी अब देशभर के युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है। खासकर उन छात्रों के लिए, जो सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को अधूरा मान लेते हैं। मयंक ने दिखा दिया कि यदि इरादे मजबूत हों तो गांव की छोटी गलियों से निकलकर भी दुनिया की बड़ी कंपनियों तक पहुंचा जा सकता है। सहरसा के सौर बाजार प्रखंड के रौता खेम गांव के 14 साल के छात्र मयंक कुमार ने वह कर दिखाया है, जिसकी कल्पना बड़े-बड़े संसाधनों वाले लोग भी आसानी से नहीं कर पाते। गांव में रहकर केवल एक स्मार्टफोन की मदद से मयंक ने ‘स्मार्ट बजट’ नामक मोबाइल ऐप विकसित किया है। उनकी इस उपलब्धि से प्रभावित होकर दक्षिण कोरिया की दिग्गज टेक कंपनी सैंमसंग ने उन्हें अपना आधिकारिक बिजनेस पार्टनर बनाया है। सबसे खास बात यह है कि मयंक ने बिना किसी लैपटॉप या कंप्यूटर के यह उपलब्धि हासिल की है। वह फिलहाल गांव में रहकर दसवीं कक्षा की पढ़ाई कर रहे हैं और पढ़ाई के साथ-साथ टेक्नोलॉजी की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। बचपन से टेक्नोलॉजी में थी रुचि मयंक, मुकेश कुमार सिंह के इकलौते पुत्र हैं। परिवार के मुताबिक बचपन से ही उन्हें मोबाइल, टेक्नोलॉजी और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में गहरी रुचि थी। जहां गांव के अधिकांश बच्चे खेलकूद में समय बिताते थे, वहीं मयंक घंटों मोबाइल पर नई-नई तकनीकों को समझने में लगे रहते थे। उन्होंने यूट्यूब वीडियो देखकर खुद से HTML और अन्य कोडिंग भाषाएं सीखीं। धीरे-धीरे उनका स्मार्टफोन ही उनकी “डिजिटल लैब” बन गया। उसी छोटे मोबाइल स्क्रीन पर उन्होंने कोडिंग सीखी, प्रयोग किए और आखिरकार अपना ऐप तैयार कर लिया। 10 महीने की मेहनत से तैयार किया ‘स्मार्ट बजट’ ऐप मयंक ने बताया कि ‘स्मार्ट बजट’ ऐप तैयार करने में उन्हें करीब 10 महीने का समय लगा। यह ऐप लोगों को अपने खर्च और बजट को ट्रैक करने में मदद करेगा। हालांकि यह ऐप अभी मार्केट में लॉन्च नहीं हुआ है, लेकिन इसकी तकनीक और डिजाइन से सैमसंग कंपनी काफी प्रभावित हुई। ऐप तैयार होने के बाद मयंक ने इसे ईमेल के जरिए सैमसंग कंपनी को भेज दिया। कुछ दिनों बाद उनके पास कंपनी की ओर से ईमेल और मैसेज आया, जिसमें उनके काम की सराहना की गई और पार्टनरशिप के लिए पंजीकरण करने को कहा गया। अब अपनी कंपनी के मालिक हैं मयंक सैमसंग से प्रतिक्रिया मिलने के बाद मयंक ने अपनी कंपनी का पंजीकरण भी करा लिया। अब वह आधिकारिक रूप से अपनी टेक कंपनी के मालिक बन चुके हैं। मयंक ने कहा, “अब मेरी खुद की कंपनी है। भविष्य में मैं जो भी सॉफ्टवेयर, विंडो या टेक प्रोजेक्ट बनाऊंगा, उसे सैमसंग सहित दुनिया की अन्य कंपनियां भी खरीद सकेंगी।” उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी को सैमसंग की वॉलेट सर्विस के लिए भी पार्टनर अप्रूवल दिया गया है। इसके अलावा उन्हें ‘ग्लोबल इनोवेटर 2026’ सम्मान से भी सम्मानित किया गया है। दक्षिण कोरिया की टीम के साथ करेंगे काम जानकारी के अनुसार मयंक आने वाले समय में सैमसंग के कई प्रोजेक्ट्स पर दक्षिण कोरियाई टीम के साथ काम करेंगे। इतनी कम उम्र में वैश्विक तकनीकी कंपनी के साथ जुड़ना न सिर्फ मयंक बल्कि पूरे बिहार के लिए गर्व की बात मानी जा रही है। ग्रामीण परिवेश से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना युवाओं के लिए प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है। मां बोलीं- पिता मोबाइल इस्तेमाल से नाराज होते थे मयंक की मां गुड्डी कुमारी ने बताया कि उनका बेटा बचपन से ही सॉफ्टवेयर डेवलपर बनने का सपना देखता था। परिवार के अन्य सदस्य उसे पढ़ाई करके अधिकारी बनने की सलाह देते थे, लेकिन मयंक हमेशा टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में कुछ बड़ा करने की बात करता था। उन्होंने कहा, “उसके पिताजी ज्यादा मोबाइल इस्तेमाल पसंद नहीं करते थे, लेकिन वह मेरे मोबाइल पर घंटों यूट्यूब देखकर कोडिंग सीखता रहता था। आज बेटे की सफलता पर पूरा परिवार गर्व महसूस कर रहा है।” गांव से ग्लोबल टेक दुनिया तक का सफर सहरसा जैसे छोटे शहर और गांव की पृष्ठभूमि से निकलकर मयंक ने यह साबित कर दिया कि बड़े सपनों के लिए महंगे संसाधनों की नहीं, बल्कि जुनून, मेहनत और लगन की जरूरत होती है। जहां आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी संसाधनों की कमी है, वहीं मयंक ने केवल एक स्मार्टफोन के सहारे वैश्विक तकनीकी दुनिया में अपनी पहचान बना ली। उनकी कहानी अब देशभर के युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है। खासकर उन छात्रों के लिए, जो सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को अधूरा मान लेते हैं। मयंक ने दिखा दिया कि यदि इरादे मजबूत हों तो गांव की छोटी गलियों से निकलकर भी दुनिया की बड़ी कंपनियों तक पहुंचा जा सकता है।


