जमुई के खैरा प्रखंड स्थित तरी दाबिल गांव के किसान खेतों की उर्वरा शक्ति और मिट्टी के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की दिशा में एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं। युवा किसान विकास कुमार की पहल और कृषि विभाग के सहयोग से यहां जैविक खेती का दायरा लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान में, लगभग 125 किसान 200 एकड़ भूमि पर बिना रासायनिक खाद और कीटनाशकों के खेती कर रहे हैं। यह पहल केंद्र सरकार की नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग योजना के तहत संचालित हो रही है। मिट्टी की गुणवत्ता हुई बेहतर किसान स्वयं जैविक खाद और जैविक कीटनाशक तैयार कर फसलों की खेती कर रहे हैं। इससे खेती की लागत कम होने के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर बनी हुई है। किसानों का कहना है कि रासायनिक खेती से जमीन की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है, जबकि जैविक खेती से मिट्टी और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रहते हैं। जैविक खेती अभियान की शुरुआत करने वाले विकास कुमार ने बताया कि वर्ष 2017 में उन्होंने हैदराबाद जाकर प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने अपने घर के किचन गार्डन से इसकी शुरुआत की और धीरे-धीरे अन्य किसानों को भी इससे जोड़ने का प्रयास किया। जैविक खाद बनाने का दिया जाता है प्रशिक्षण जागरूकता अभियान और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने किसानों का एक समूह तैयार किया, जो आज सफलतापूर्वक जैविक खेती कर रहा है। विकास कुमार ने बताया कि वर्तमान में 125 किसान इस अभियान से जुड़े हैं। किसानों को जैविक खाद और कीटनाशक बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। कृषि विभाग की ओर से किसानों को दो हजार रुपये की सहायता राशि प्रदान की गई है, जबकि प्रशिक्षण केंद्र के संचालन के लिए भी आर्थिक सहयोग मिला है। उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं से भविष्य में जैविक खेती को और बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्पादों का उचित बाजार मूल्य नहीं मिलना है। किसानों का कहना है कि जैविक तरीके से उगाई गई सब्जियों और अन्य उत्पादों की अलग पहचान और बाजार नहीं होने के कारण उन्हें सामान्य फसलों की तरह ही कीमत मिलती है। इसके बावजूद, किसान प्राकृतिक खेती को अपनाकर स्वस्थ कृषि और बेहतर भविष्य की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। जमुई के खैरा प्रखंड स्थित तरी दाबिल गांव के किसान खेतों की उर्वरा शक्ति और मिट्टी के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की दिशा में एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं। युवा किसान विकास कुमार की पहल और कृषि विभाग के सहयोग से यहां जैविक खेती का दायरा लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान में, लगभग 125 किसान 200 एकड़ भूमि पर बिना रासायनिक खाद और कीटनाशकों के खेती कर रहे हैं। यह पहल केंद्र सरकार की नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग योजना के तहत संचालित हो रही है। मिट्टी की गुणवत्ता हुई बेहतर किसान स्वयं जैविक खाद और जैविक कीटनाशक तैयार कर फसलों की खेती कर रहे हैं। इससे खेती की लागत कम होने के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर बनी हुई है। किसानों का कहना है कि रासायनिक खेती से जमीन की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है, जबकि जैविक खेती से मिट्टी और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रहते हैं। जैविक खेती अभियान की शुरुआत करने वाले विकास कुमार ने बताया कि वर्ष 2017 में उन्होंने हैदराबाद जाकर प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने अपने घर के किचन गार्डन से इसकी शुरुआत की और धीरे-धीरे अन्य किसानों को भी इससे जोड़ने का प्रयास किया। जैविक खाद बनाने का दिया जाता है प्रशिक्षण जागरूकता अभियान और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने किसानों का एक समूह तैयार किया, जो आज सफलतापूर्वक जैविक खेती कर रहा है। विकास कुमार ने बताया कि वर्तमान में 125 किसान इस अभियान से जुड़े हैं। किसानों को जैविक खाद और कीटनाशक बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। कृषि विभाग की ओर से किसानों को दो हजार रुपये की सहायता राशि प्रदान की गई है, जबकि प्रशिक्षण केंद्र के संचालन के लिए भी आर्थिक सहयोग मिला है। उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं से भविष्य में जैविक खेती को और बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्पादों का उचित बाजार मूल्य नहीं मिलना है। किसानों का कहना है कि जैविक तरीके से उगाई गई सब्जियों और अन्य उत्पादों की अलग पहचान और बाजार नहीं होने के कारण उन्हें सामान्य फसलों की तरह ही कीमत मिलती है। इसके बावजूद, किसान प्राकृतिक खेती को अपनाकर स्वस्थ कृषि और बेहतर भविष्य की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।


