1200 मिसाइलें दागीं, शुरुआती 48 घंटों में 5.6 अरब डॉलर खर्च हुए, ईरान युद्ध में अमेरिका को लगा बड़ा फटका

1200 मिसाइलें दागीं, शुरुआती 48 घंटों में 5.6 अरब डॉलर खर्च हुए, ईरान युद्ध में अमेरिका को लगा बड़ा फटका

ईरान युद्ध की शुरुआत होने के बाद अमेरिका को पहले ही दो दिनों में बड़ा फटका लगा गया था। अमेरिका के रक्षा विभाग ने जो आंकड़े जारी किए हैं, उससे यह साफ होता है कि मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष ने सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी बड़ा असर दिखाना शुरू कर दिया है। युद्ध के शुरुआती दो दिनों में ही हथियारों पर जितना खर्च हुआ है, उसने दुनिया को चौंका दिया है।

दो दिन में अरबों डॉलर का खर्च

अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ चलाए गए सैन्य अभियान के पहले दो दिनों में करीब 5.6 अरब डॉलर के हथियार इस्तेमाल किए गए। यह आंकड़ा दिखाता है कि आधुनिक युद्ध कितने महंगे हो चुके हैं।

इस अभियान में सबसे ज्यादा चर्चा पेट्रियट मिसाइल सिस्टम की हो रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पहले दो दिनों में करीब 1200 पैट्रियट मिसाइलें दागी गईं।

एक-एक मिसाइल की कीमत 4 मिलियन डॉलर से ज्यादा बताई जा रही है। यानी सिर्फ इन मिसाइलों पर ही अरबों डॉलर खर्च हो गए।

आधुनिक युद्ध की बढ़ती कीमत

विशेषज्ञों का मानना है कि आज के समय में युद्ध सिर्फ सैनिकों की ताकत का नहीं, बल्कि आर्थिक क्षमता का भी खेल बन गया है। इतने बड़े पैमाने पर हथियारों का इस्तेमाल यह दिखाता है कि किसी भी देश के लिए लंबे समय तक युद्ध चलाना कितना महंगा साबित हो सकता है।

अमेरिका-इजराइल की रणनीति

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुरुआती हमलों में एयर डिफेंस और मिसाइल सिस्टम का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इसका मकसद था दुश्मन के हमलों को रोकना और अपने ठिकानों की सुरक्षा करना। इस रणनीति में हाई-टेक हथियारों का इस्तेमाल प्राथमिकता में रखा गया।

आर्थिक दबाव भी बनेगा बड़ा मुद्दा

इतना भारी खर्च सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। अगर संघर्ष लंबा चलता है, तो यह खर्च और बढ़ेगा, जिससे बजट और संसाधनों पर दबाव पड़ेगा।

वैश्विक असर भी दिखने की उम्मीद

मिडिल ईस्ट में किसी भी बड़े संघर्ष का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। तेल की कीमतों से लेकर वैश्विक बाजार तक, हर जगह इसका असर दिखाई देता है। ऐसे में यह युद्ध सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इसी तरह भारी मात्रा में हथियारों का इस्तेमाल जारी रहा, तो आने वाले दिनों में यह संघर्ष और महंगा होता जाएगा।

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