झारखंड में कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त नीड बेस्ड असिस्टेंट प्रोफेसरों के न्यूनतम वेतनमान और वेतन कटौती का मामला अब झारखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने तीन दिन पहले 30 सितंबर को राज्य सरकार से पूछा है कि जब याचिकाकर्ता यूजीसी रेगुलेशन के तहत न्यूनतम वेतनमान का दावा कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में 10 मई वर्ष 2023 के संकल्प की कानूनी वैधता क्या है, जिसके आधार पर क्लास नहीं लेने वालों के वेतन से कटौती की जा रही है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की अदालत के आदेश में इस मामले का मुख्य सवाल असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए न्यूनतम पे-स्केल यूजीसी रेगुलेशन में निर्धारित न्यूनतम पे-स्केल पर अधिकार बताया गया है। इस मामले में अगली सुनवाई अब 28 अगस्त को होनी है। क्या है पूरा विवाद कॉन्ट्रैक्ट असिस्टेंट प्रोफेसरों का पक्ष है कि उन्हें यूजीसी के निर्धारित न्यूनतम वेतनमान का लाभ मिलना चाहिए। दूसरी ओर, राज्य की ओर से जारी संकल्प के आधार पर क्लास नहीं लेने की स्थिति में वेतन में कटौती किए जाने का मुद्दा सामने आया है। अब हाईकोर्ट ने सरकार से इसी संकल्प की कानूनी वैधता और उसके आधार पर स्पष्टीकरण मांगा है। यूजीसी रेगुलेशन में मानदेय को लेकर नियम यूजीसी दिशा-निर्देशों में अनुबंध आधारित नियुक्ति के लिए कई शर्तें तय हैं। इनमें सबसे अहम प्रावधान मानदेय से जुड़ा है। दस्तावेज के अनुसार कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त शिक्षक को दिया जाने वाला मानदेय नियमित रूप से नियुक्त असिस्टेंट प्रोफेसर के कुल मासिक ग्रॉस वेतन से कम नहीं होना चाहिए। चयन प्रक्रिया भी नियमित शिक्षकों जैसी अनुबंध पर नियुक्त शिक्षक के लिए योग्यता और चयन प्रक्रिया वही रखी गई है, जो नियमित रूप से नियुक्त शिक्षक के लिए लागू होती है। प्रारंभिक अनुबंध एक शैक्षणिक सत्र से अधिक का नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अहम सुप्रीम कोर्ट ने 22 अगस्त 2025 को कॉन्ट्रैक्ट असिस्टेंट प्रोफेसरों के वेतन पर महत्वपूर्ण फैसला दिया था। कोर्ट ने अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कॉन्ट्रैक्ट असिस्टेंट प्रोफेसरों को असिस्टेंट प्रोफेसरों के लिए स्वीकार्य न्यूनतम पे-स्केल का हकदार माना और रिट याचिका दाखिल करने से पहले के तीन वर्षों के बकाए के भुगतान का निर्देश दिया। झारखंड में कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त नीड बेस्ड असिस्टेंट प्रोफेसरों के न्यूनतम वेतनमान और वेतन कटौती का मामला अब झारखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने तीन दिन पहले 30 सितंबर को राज्य सरकार से पूछा है कि जब याचिकाकर्ता यूजीसी रेगुलेशन के तहत न्यूनतम वेतनमान का दावा कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में 10 मई वर्ष 2023 के संकल्प की कानूनी वैधता क्या है, जिसके आधार पर क्लास नहीं लेने वालों के वेतन से कटौती की जा रही है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की अदालत के आदेश में इस मामले का मुख्य सवाल असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए न्यूनतम पे-स्केल यूजीसी रेगुलेशन में निर्धारित न्यूनतम पे-स्केल पर अधिकार बताया गया है। इस मामले में अगली सुनवाई अब 28 अगस्त को होनी है। क्या है पूरा विवाद कॉन्ट्रैक्ट असिस्टेंट प्रोफेसरों का पक्ष है कि उन्हें यूजीसी के निर्धारित न्यूनतम वेतनमान का लाभ मिलना चाहिए। दूसरी ओर, राज्य की ओर से जारी संकल्प के आधार पर क्लास नहीं लेने की स्थिति में वेतन में कटौती किए जाने का मुद्दा सामने आया है। अब हाईकोर्ट ने सरकार से इसी संकल्प की कानूनी वैधता और उसके आधार पर स्पष्टीकरण मांगा है। यूजीसी रेगुलेशन में मानदेय को लेकर नियम यूजीसी दिशा-निर्देशों में अनुबंध आधारित नियुक्ति के लिए कई शर्तें तय हैं। इनमें सबसे अहम प्रावधान मानदेय से जुड़ा है। दस्तावेज के अनुसार कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त शिक्षक को दिया जाने वाला मानदेय नियमित रूप से नियुक्त असिस्टेंट प्रोफेसर के कुल मासिक ग्रॉस वेतन से कम नहीं होना चाहिए। चयन प्रक्रिया भी नियमित शिक्षकों जैसी अनुबंध पर नियुक्त शिक्षक के लिए योग्यता और चयन प्रक्रिया वही रखी गई है, जो नियमित रूप से नियुक्त शिक्षक के लिए लागू होती है। प्रारंभिक अनुबंध एक शैक्षणिक सत्र से अधिक का नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अहम सुप्रीम कोर्ट ने 22 अगस्त 2025 को कॉन्ट्रैक्ट असिस्टेंट प्रोफेसरों के वेतन पर महत्वपूर्ण फैसला दिया था। कोर्ट ने अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कॉन्ट्रैक्ट असिस्टेंट प्रोफेसरों को असिस्टेंट प्रोफेसरों के लिए स्वीकार्य न्यूनतम पे-स्केल का हकदार माना और रिट याचिका दाखिल करने से पहले के तीन वर्षों के बकाए के भुगतान का निर्देश दिया।

