साल में एक बार नागपंचमी खुलता है नाग कूप:महर्षि पतंजलि ने यहीं की थी योग की शुरुआत; आज भी होता है शास्त्रार्थ

साल में एक बार नागपंचमी खुलता है नाग कूप:महर्षि पतंजलि ने यहीं की थी योग की शुरुआत; आज भी होता है शास्त्रार्थ

वाराणसी के जैतपुरा इलाके में विश्व का एकमात्र नाग कूप स्थित है। यह कूप साल में सिर्फ एक बार नागपंचमी के दिन खोला जाता है। मान्यता है कि यह स्थान धरती से पाताल लोक यानी नागलोक तक जाने वाले मार्ग से जुड़ा है। नागपंचमी पर यहां पूजा के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर के प्रधान पुजारी शास्त्री चंदन पांडेय ने बताया कि यह कूप 80 फीट गहरा है। यहां नागेश्वर महादेव और कार्कोटेश्वर महादेव की पूजा की जाती है। महर्षि पतंजलि ने भी यहीं तपस्या की थी और इसी स्थान पर योगसूत्र और महाभाष्य ग्रंथ की रचना की। आज भी यहां शास्त्रार्थ की परंपरा है। नागपंचमी को यहां शास्त्रार्थ किया जाता है। राजा जनमेजय के नाग यज्ञ से जुड़ी है मान्यता मंदिर के पुजारी चंदन पांडेय ने बताया कि नाग कूप का उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खंड में मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, काशी के ओंकारेश्वर खंड में स्थित नाग मंदिर का संबंध नागों और भगवान शिव से जुड़ी प्राचीन कथा से है। मान्यता है कि राजा जनमेजय ने नागों के विनाश के लिए नाग यज्ञ कराया था। यज्ञ में बड़ी संख्या में नागों के मारे जाने और जलने से नाग जाति पर संकट आ गया। इसी दौरान नागराज कार्कोटक ने नाग जाति को बचाने के लिए इसी स्थान पर पंचाग्नि तपस्या शुरू की। पंचाग्नि तपस्या में साधक चारों दिशाओं में अग्नि और ऊपर सूर्य की गर्मी के बीच बैठकर कठोर तप करता है। कार्कोटक नाग की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वयंभू रूप में दर्शन दिए। भगवान शिव के दर्शन और आशीर्वाद मिलने के बाद कार्कोटक नाग अपनी पूरी नाग जाति के साथ इसी स्थान से पाताल लोक यानी नागलोक चले गए। और यहां के शिवलिंग को नागेश्वर महादेव और कार्कोटेश्वर महादेव कहा जाने लगा। नागपंचमी पर क्यों चढ़ाया जाता है दूध-लावा पुजारी ने बताया कि राजा जनमेजय के यज्ञ में कई नाग जलकर घायल हो गए थे। उस समय आस्तिक मुनि ने यज्ञ को रोककर घायल नागों पर दूध डालकर उन्हें ठंडक दी और उनके घाव शांत किए। यह घटना श्रावण शुक्ल पक्ष की नागपंचमी से जुड़ी मानी जाती है। इसी वजह से नागपंचमी पर नाग देवता को दूध और लावा चढ़ाने की परंपरा है। कालसर्प दोष की पूजा के लिए खास स्थान नागपंचमी पर श्रद्धालु नाग-नागिन के चित्र की पूजा करते हैं और उन्हें घर में स्थापित करते हैं। यहां दर्शन-पूजन के बाद लोग कुंड का जल घर ले जाकर उसका छिड़काव भी करते हैं। कहा जाता है कि इससे नागदंश का भय दूर रहता है। साथ ही कुंडली में कालसर्प दोष होने पर भी लोग यहां विशेष पूजा कराते हैं। मंदिर के पुजारी ने बताया कि कालसर्प दोष से मुक्ति काशी में सिर्फ यहीं मिलती है। महर्षि पाणिनि और पतंजलि ने यहीं की तपस्या महर्षि पतंजलि और महर्षि पाणिनि ने यहां आकर नागेश्वर महादेव और कार्कोटेश्वर महादेव की पूजा और तपस्या की थी। इसी स्थान पर उन्होंने महाभाष्य और योगसूत्र ग्रंथ की रचना की। यहां लोग पतंजलि को शेषनाग का अवतार भी मानते हैं। इसी वजह से नागपंचमी को कई लोग महर्षि पतंजलि के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। बच्चे बेचते हैं छोटे गुरु-बड़े गुरु का नाग यहां नागपंचमी के दिन बच्चे नागों की फोटो बेचते हैं और कहते हैं- बड़े गुरु और छोटे गुरु का नाग ले लो। पुजारी ने बताया कि यहां ऐसी परंपरा है कि बच्चे नाग की फोटो बेचते हैं। यहां महर्षि पतंजलि और महर्षि पाणिनि को छोटे गुरु और बड़े गुरु के नाम से भी जाना जाता है। नागपंचमी पर होता है शास्त्रार्थ नागपंचमी के दिन नाग कूप पूजा के साथ शास्त्रार्थ की परंपरा भी है। मंदिर में बने शास्त्रार्थ हॉल में विद्वानों के बीच चर्चा होती है। प्राचीन समय में यहां शास्त्रार्थ का ग्रैंड फिनाले होता था। सभी जगहों से जीते हुए विद्वान यहां आकर शास्त्रार्थ करते थे। जो जीतता था, वह सबसे विद्वान की उपाधि से नवाजा जाता था। आज यहां नागपंचमी पर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति, अन्नपूर्णा मंदिर से जुड़े विद्वान, शंकराचार्य परंपरा के संत, बटुक और शास्त्रार्थ समिति के सदस्य शामिल होते हैं। इसमें वेद, विज्ञान और आने वाले समय से जुड़े विषयों पर चर्चा होती है।

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