रूस के राष्ट्रपति पुतिन के करीबी माने जाने वाले सर्बिया के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुचिच को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है। करीब दो साल से उनके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों के गठबंधन ‘स्टूडेंट लिस्ट’ ने चुनाव जीत लिया है। छात्र सरकार के भ्रष्टाचार और तानाशाही रवैये के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। वुचिच के मुताबिक, छात्रों के गठबंधन को संसद की 250 में से कम से कम 135 सीटें मिली हैं, जबकि उनकी पार्टी को करीब 105 सीटें मिलने का अनुमान है। वुचिच 2012 से सर्बिया की राजनीति के सबसे ताकतवर नेताओं में शामिल रहे हैं। वे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दोनों पदों पर रह चुके हैं। वुचिच के हार मानते ही राजधानी बेलग्रेड में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। इनमें ज्यादातर युवा थे। लोगों ने सर्बिया के झंडे लहराए, गाड़ियों के हॉर्न बजाए और पटाखे जलाकर जश्न मनाया। वुचिच की हार के बाद जश्न की 5 तस्वीरें रिकॉर्ड मतदान, लेकिन सरकार बनाना बड़ी चुनौती चुनाव में करीब 70% लोगों ने वोट डाले। हालाकि चुनाव जीतने के बाद भी स्टूडेंट लिस्ट के सामने कई चुनौतियां हैं। अभी यह साफ नहीं है कि नई सरकार का नेतृत्व कौन करेगा और छात्र आंदोलन अपने वादों को कैसे पूरा करेगा। स्टूडेंट लिस्ट में 250 उम्मीदवार हैं। इनमें विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, अभिनेता और किसान शामिल हैं। इसके कई उम्मीदवार राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा चर्चित नहीं हैं। सूची का नेतृत्व हृदय रोग विशेषज्ञ इलिया सर्दानोविच कर रहे हैं। आंदोलन ने भ्रष्टाचार पर रोक लगाने, कानून का पालन सुनिश्चित करने और शिक्षा व्यवस्था सुधारने का वादा किया है। लेकिन नई कैबिनेट में कौन-कौन होगा और सरकार कैसे चलेगी, यह अभी तय नहीं है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, नई सरकार पर सरकारी संस्थाओं में सुधार का दबाव रहेगा। इसमें पुलिस, सुरक्षा एजेंसियों और मंत्रालयों में बदलाव शामिल हो सकते हैं। विदेश नीति में बड़े बदलाव नहीं होंगे चुनाव में वुचिच की हार के बावजूद रूस से रिश्तों, यूरोपीय संघ में शामिल होने और कोसोवो के भविष्य जैसे मुद्दों पर बड़े बदलाव की संभावना साफ नहीं है। इन मुद्दों पर वुचिच की पार्टी और चुनाव जीतने वाले छात्र समर्थित गठबंधन के बीच ज्यादा अंतर नहीं बताया गया है। कोसोवो ने 2008 में सर्बिया से स्वतंत्रता की घोषणा की थी, लेकिन सर्बिया उसे स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं देता। यह दोनों देशों के रिश्तों का बड़ा विवाद है। यूरोपीय संघ में शामिल होने की प्रक्रिया तेज करने की मांग करने वाली ‘यूरोपियन सर्बिया’ पार्टी संसद में प्रवेश के लिए जरूरी 3% वोट भी हासिल नहीं कर सकी। इससे पता चलता है कि वुचिच की हार के बावजूद यूरोपीय संघ में जल्द शामिल होने का मुद्दा चुनाव में सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल नहीं बन पाया। वुचिच पर पूर्व तानाशाह मिलोशेविच की राह पर चलने का आरोप वुचिच ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राष्ट्रवादी नेता स्लोबोदान मिलोशेविच के सूचना मंत्री के रूप में की थी। शुरुआती दौर में वे कट्टर राष्ट्रवादी थे और ‘ग्रेटर सर्बिया’ के विचार का समर्थन करते थे। इसका मतलब है ऐसा बड़ा सर्बियाई देश बनाना, जिसमें आज के सर्बिया के अलावा दूसरे पड़ोसी देशों के वे इलाके भी शामिल हों, जहां सर्ब समुदाय के लोग रहते हैं। बाद में उनके विचारों में कुछ बदलाव आया, लेकिन विरोधियों का आरोप है कि उन्होंने मिलोशेविच की तरह सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाए रखने के तरीके अपनाए। मिलोशेविच 1990 के दशक के बाल्कन युद्धों के दौरान सर्बिया के राष्ट्रवादी नेता थे। उनके शासन में पड़ोसी देशों को दुश्मन के रूप में पेश किया जाता था और सत्ता की आलोचना को देशद्रोह जैसा बताया जाता था। नवंबर 2024 में हुए हादसे के बाद छात्र आंदोलन शुरू हुआ था नवंबर 2024 में नोवी साद शहर के एक रेलवे स्टेशन की छतरी गिर गई थी। इस हादसे में 16 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद लोगों का गुस्सा बढ़ गया। सवाल उठने लगे कि सुरक्षा के इंतजामों में लापरवाही क्यों हुई और इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई। लोगों ने सरकार पर भ्रष्टाचार और जवाबदेही से बचने के आरोप लगाए। धीरे-धीरे छात्र आंदोलन बड़ा होता गया। प्रदर्शनकारी सरकार में बदलाव की मांग करने लगे। उन्होंने वुचिच से पद छोड़ने की भी मांग की। छात्रों के लगातार प्रदर्शनों के दबाव में वुचिच ने सितंबर में तय समय से पहले चुनाव कराया था। —————————– ये खबर भी पढ़ें… ब्राजील में लूला चौथी बार राष्ट्रपति बने: बोल्सोनारो से पहले राउंड में पिछड़ने के बाद जीते; 2022 में इनके पिता को हराया था ब्राजील में 80 साल के लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने चौथी बार राष्ट्रपति चुनाव जीत लिया है। वे पहले दौर की वोटिंग में फ्लावियो बोल्सोनारो से पिछड़ गए थे, लेकिन दूसरे दौर में बाजी पलट दी। पूरी खबर यहां पढ़ें…
सर्बिया में पुतिन समर्थक राष्ट्रपति वुचिच की हार:छात्र गठबंधन ने चुनाव जीता; तानाशाही रवैये के खिलाफ दो साल से प्रदर्शन चल रहे थे

