समस्तीपुर- दुर्गाबाड़ी में बंगाली संस्कृति-परंपरा के अनुसार मां की अराधना:धुनुची नृत्य और ढाक वादन है खास पहचान; बच्चों के लिए प्रतियोगिता का भी आयोजन

समस्तीपुर- दुर्गाबाड़ी में बंगाली संस्कृति-परंपरा के अनुसार मां की अराधना:धुनुची नृत्य और ढाक वादन है खास पहचान; बच्चों के लिए प्रतियोगिता का भी आयोजन

समस्तीपुर शहर के बहादुरपुर स्थित दुर्गाबाड़ी में पिछले 93 साल से बंगाली संस्कृति और परंपरा के अनुसार मां दुर्गा की आराधना की जा रही है। यहां दुर्गापूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाली लोककला, नृत्य, संगीत और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का भी माध्यम है। पूजा के दौरान ढाक की गूंज, धुनुची नृत्य और पारंपरिक अनुष्ठान से बंगाल की दुर्गापूजा की झलक दिखती है। साथ ही बच्चों के लिए प्रतियोगिता आयोजित कर नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने की पहल की जाती है। बंगाली परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना दुर्गाबाड़ी बंगाली हिंदू थियेट्रिकल कल्चरल ट्रस्ट के सचिव अजित पॉल ने बताया कि यहां हर साल बंगाली परंपरा के अनुसार विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा होती है। परंपरा के मुताबिक, षष्ठी की रात से ही मां का पट श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिया जाता है। इसके बाद सप्तमी से पूजा-अर्चना के साथ भोग वितरण भी शुरू होता है। जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से बंगाली समाज के लोग यहां पहुंचकर मां दुर्गा की आराधना में शामिल होते हैं। सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्रों में काम करने वाले बंगाली समाज के लोग भी उत्साह के साथ आयोजन में भाग लेते हैं। ढाक की थाप और धुनुची नृत्य से जीवंत होती है बंगाल की परंपरा दुर्गाबाड़ी की दुर्गापूजा में ढाक वादन विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। समिति हर साल बंगाल से ढाक बजाने वाले कलाकारों को बुलाती है। इस बार भी दो ढाक वादकों को आमंत्रित किया जा रहा है। ढाक की पारंपरिक थाप के बीच पूजा-अर्चना का माहौल भक्तिमय हो उठता है। यहां धुनुची नृत्य भी बंगाली दुर्गापूजा की खास पहचान है। धुनुची में धूप और सुगंधित सामग्री जलाकर पारंपरिक लय पर नृत्य किया जाता है। पूजा के दौरान होने वाले इस नृत्य को देखने के लिए दूसरे समाज के लोग भी पहुंचते हैं। इसके अलावा डांडिया नृत्य और नाटक का मंचन भी आयोजन का हिस्सा रहता है। इन कार्यक्रमों के जरिए धार्मिक आस्था के साथ बंगाली समाज की सांस्कृतिक परंपराओं की झलक देखने को मिलती है। बच्चों के लिए तीन दिनों तक प्रतियोगिताएं पूजा के दौरान बच्चों की प्रतिभा निखारने और उन्हें संस्कृति से जोड़ने के लिए तीन दिनों तक विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। इसमें चित्रकला, शंख वादन, रंगोली, क्विज, नृत्य, फोक डांस, मेहंदी, अल्पना और जलेबी रेस शामिल है। अलग-अलग आयु वर्ग बनाए जाते हैं, ताकि हर उम्र के प्रतिभागियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल सके। 6-8 और 9-14 वर्ष के बच्चों के लिए पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन होगा। जबकि 15-20 वर्ष के बच्चों के लिए अल्पना , 6 से 15 वर्ष के लिए लेमन-स्पोन रेस , 25 वर्ष से ऊपर वालों के लिए शंख वादन, 25 वर्ष से उपर के लिए मेमोरी गेम, 25 वर्ष और उससे उपर के लिए क्यूज प्रतियोगित का आयोजन होगा। दशमी के दिन विसर्जन से पहले प्रतियोगिताओं में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले बच्चों को पुरस्कृत किया जाता है। इस तरह दुर्गाबाड़ी की पूजा धार्मिक आयोजन के साथ बच्चों के लिए सीखने, अपनी प्रतिभा दिखाने और सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का मंच भी बनती है। विसर्जन से पहले महिलाएं करती हैं सिंदूर खेला बंगाली दुर्गापूजा की प्रमुख परंपराओं में सिंदूर खेला का विशेष स्थान है। विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की विदाई से पहले विवाहित महिलाएं मां को सिंदूर अर्पित करती हैं। एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुहाग, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करती हैं। इसके बाद मां दुर्गा को विदाई दी जाती है। यह परंपरा बंगाली समाज में भावनात्मक और सांस्कृतिक महत्व रखती है। दुर्गाबाड़ी में भी बंगाली परंपराओं के अनुरूप पूजा और विसर्जन की तैयारियां की जाती हैं। मां की विदाई के दौरान श्रद्धालु भावुक हो उठते हैं। सिंदूर खेला, पारंपरिक पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस आयोजन को खास पहचान देते हैं। चार से पांच लाख रुपए में आयोजित होती है पूजा ट्रस्ट के सचिव अजित पॉल ने बताया कि दुर्गाबाड़ी में कम खर्च में परंपरागत तरीके से पूजा आयोजित करने की कोशिश की जाती है। इस साल पूजा पर करीब चार से पांच लाख रुपए खर्च होने का अनुमान है। पूजा कराने के लिए पश्चिम बंगाल के वर्द्धमान से पुरोहित प्रो. गुरुदास आते हैं, जो विधि-विधान से अनुष्ठान संपन्न कराते हैं। 93 साल की परंपरा, बंगाली रीति-रिवाज, ढाक वादन, धुनुची नृत्य और बच्चों की सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिए यहां दुर्गापूजा आस्था के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनी हुई है। समस्तीपुर शहर के बहादुरपुर स्थित दुर्गाबाड़ी में पिछले 93 साल से बंगाली संस्कृति और परंपरा के अनुसार मां दुर्गा की आराधना की जा रही है। यहां दुर्गापूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाली लोककला, नृत्य, संगीत और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का भी माध्यम है। पूजा के दौरान ढाक की गूंज, धुनुची नृत्य और पारंपरिक अनुष्ठान से बंगाल की दुर्गापूजा की झलक दिखती है। साथ ही बच्चों के लिए प्रतियोगिता आयोजित कर नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने की पहल की जाती है। बंगाली परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना दुर्गाबाड़ी बंगाली हिंदू थियेट्रिकल कल्चरल ट्रस्ट के सचिव अजित पॉल ने बताया कि यहां हर साल बंगाली परंपरा के अनुसार विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा होती है। परंपरा के मुताबिक, षष्ठी की रात से ही मां का पट श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिया जाता है। इसके बाद सप्तमी से पूजा-अर्चना के साथ भोग वितरण भी शुरू होता है। जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से बंगाली समाज के लोग यहां पहुंचकर मां दुर्गा की आराधना में शामिल होते हैं। सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्रों में काम करने वाले बंगाली समाज के लोग भी उत्साह के साथ आयोजन में भाग लेते हैं। ढाक की थाप और धुनुची नृत्य से जीवंत होती है बंगाल की परंपरा दुर्गाबाड़ी की दुर्गापूजा में ढाक वादन विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। समिति हर साल बंगाल से ढाक बजाने वाले कलाकारों को बुलाती है। इस बार भी दो ढाक वादकों को आमंत्रित किया जा रहा है। ढाक की पारंपरिक थाप के बीच पूजा-अर्चना का माहौल भक्तिमय हो उठता है। यहां धुनुची नृत्य भी बंगाली दुर्गापूजा की खास पहचान है। धुनुची में धूप और सुगंधित सामग्री जलाकर पारंपरिक लय पर नृत्य किया जाता है। पूजा के दौरान होने वाले इस नृत्य को देखने के लिए दूसरे समाज के लोग भी पहुंचते हैं। इसके अलावा डांडिया नृत्य और नाटक का मंचन भी आयोजन का हिस्सा रहता है। इन कार्यक्रमों के जरिए धार्मिक आस्था के साथ बंगाली समाज की सांस्कृतिक परंपराओं की झलक देखने को मिलती है। बच्चों के लिए तीन दिनों तक प्रतियोगिताएं पूजा के दौरान बच्चों की प्रतिभा निखारने और उन्हें संस्कृति से जोड़ने के लिए तीन दिनों तक विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। इसमें चित्रकला, शंख वादन, रंगोली, क्विज, नृत्य, फोक डांस, मेहंदी, अल्पना और जलेबी रेस शामिल है। अलग-अलग आयु वर्ग बनाए जाते हैं, ताकि हर उम्र के प्रतिभागियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल सके। 6-8 और 9-14 वर्ष के बच्चों के लिए पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन होगा। जबकि 15-20 वर्ष के बच्चों के लिए अल्पना , 6 से 15 वर्ष के लिए लेमन-स्पोन रेस , 25 वर्ष से ऊपर वालों के लिए शंख वादन, 25 वर्ष से उपर के लिए मेमोरी गेम, 25 वर्ष और उससे उपर के लिए क्यूज प्रतियोगित का आयोजन होगा। दशमी के दिन विसर्जन से पहले प्रतियोगिताओं में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले बच्चों को पुरस्कृत किया जाता है। इस तरह दुर्गाबाड़ी की पूजा धार्मिक आयोजन के साथ बच्चों के लिए सीखने, अपनी प्रतिभा दिखाने और सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का मंच भी बनती है। विसर्जन से पहले महिलाएं करती हैं सिंदूर खेला बंगाली दुर्गापूजा की प्रमुख परंपराओं में सिंदूर खेला का विशेष स्थान है। विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की विदाई से पहले विवाहित महिलाएं मां को सिंदूर अर्पित करती हैं। एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुहाग, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करती हैं। इसके बाद मां दुर्गा को विदाई दी जाती है। यह परंपरा बंगाली समाज में भावनात्मक और सांस्कृतिक महत्व रखती है। दुर्गाबाड़ी में भी बंगाली परंपराओं के अनुरूप पूजा और विसर्जन की तैयारियां की जाती हैं। मां की विदाई के दौरान श्रद्धालु भावुक हो उठते हैं। सिंदूर खेला, पारंपरिक पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस आयोजन को खास पहचान देते हैं। चार से पांच लाख रुपए में आयोजित होती है पूजा ट्रस्ट के सचिव अजित पॉल ने बताया कि दुर्गाबाड़ी में कम खर्च में परंपरागत तरीके से पूजा आयोजित करने की कोशिश की जाती है। इस साल पूजा पर करीब चार से पांच लाख रुपए खर्च होने का अनुमान है। पूजा कराने के लिए पश्चिम बंगाल के वर्द्धमान से पुरोहित प्रो. गुरुदास आते हैं, जो विधि-विधान से अनुष्ठान संपन्न कराते हैं। 93 साल की परंपरा, बंगाली रीति-रिवाज, ढाक वादन, धुनुची नृत्य और बच्चों की सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिए यहां दुर्गापूजा आस्था के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनी हुई है।  

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