शहबाजपुर में वार्षिक मजलिस-ए-अजा संपन्न:1984 की घटना की याद में गूंजा इमाम हुसैन का पैगाम; पटना, मोतिहारी समेत कई जिलों से पहुंचे लोग

शहबाजपुर में वार्षिक मजलिस-ए-अजा संपन्न:1984 की घटना की याद में गूंजा इमाम हुसैन का पैगाम; पटना, मोतिहारी समेत कई जिलों से पहुंचे लोग

मुजफ्फरपुर शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर कपरपुरा स्टेशन के पास शहबाजपुर में वार्षिक ‘मजलिस-ए-अजा’ का आयोजन किया गया। मोजिजा कमेटी, छपरा-सारण की ओर से आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम में बिहार के अलग-अलग जिलों के अलावा देश के कई राज्यों से भी बड़ी संख्या में अजादार पहुंचे। सभी ने इमाम हुसैन और शोहदा-ए-कर्बला को श्रद्धांजलि अर्पित की। मान्यताओं के अनुसार, वर्ष 1984 में दस मुहर्रम (आशूरा) के दिन शहबाजपुर में ताजिया रखने वाले स्थान की जमीन से अचानक खून निकलने लगा था। यह खून देखते ही देखते पास की नहर तक फैल गया। श्रद्धालुओं ने इसे इमाम हुसैन की शहादत से जुड़ा एक ‘चमत्कार’ माना। तब से हर साल इस स्थान पर विशाल मजलिस, नौहा और मातम का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दराज से लोग शामिल होते हैं। आपसी भाईचारे का दिया संदेश मुख्य मजलिस को संबोधित करते हुए जौनपुर के इमामे जुमा मौलाना अजमी अब्बास ने कुरान की आयत की तिलावत की। उन्होंने कहा, ‘अल्लाह की कुदरत से दुनिया का कोई भी मामला खाली नहीं है। इंसान को वास्तविक सुकून ईमान, इल्म और अहलेबैत से मजबूत रिश्ता कायम करने से ही मिलता है।’ पैगंबर पुर कोल्हुआ के मौलाना इकराम रिजवी ने आयोजन के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक वार्षिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि ईमान, अकीदत और अहलेबैत से मोहब्बत के संकल्प को दोहराने का पवित्र अवसर है। कई जिलों से पहुंचे लोग कार्यक्रम के दौरान मुजफ्फरपुर, पटना, चंदनपट्टी (दरभंगा), मोतिहारी, वैशाली, अररिया, किशनगंज, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) समेत कई प्रमुख क्षेत्रों की अंजुमनों ने भी मजलिस, नौहाख्वानी और सीनाजनी (मातम) कर श्रद्धा सुमन अर्पित किए। पूरे आयोजन के दौरान ‘या हुसैन’ की सदाओं से माहौल गमगीन और आध्यात्मिक बना रहा। मुजफ्फरपुर शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर कपरपुरा स्टेशन के पास शहबाजपुर में वार्षिक ‘मजलिस-ए-अजा’ का आयोजन किया गया। मोजिजा कमेटी, छपरा-सारण की ओर से आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम में बिहार के अलग-अलग जिलों के अलावा देश के कई राज्यों से भी बड़ी संख्या में अजादार पहुंचे। सभी ने इमाम हुसैन और शोहदा-ए-कर्बला को श्रद्धांजलि अर्पित की। मान्यताओं के अनुसार, वर्ष 1984 में दस मुहर्रम (आशूरा) के दिन शहबाजपुर में ताजिया रखने वाले स्थान की जमीन से अचानक खून निकलने लगा था। यह खून देखते ही देखते पास की नहर तक फैल गया। श्रद्धालुओं ने इसे इमाम हुसैन की शहादत से जुड़ा एक ‘चमत्कार’ माना। तब से हर साल इस स्थान पर विशाल मजलिस, नौहा और मातम का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दराज से लोग शामिल होते हैं। आपसी भाईचारे का दिया संदेश मुख्य मजलिस को संबोधित करते हुए जौनपुर के इमामे जुमा मौलाना अजमी अब्बास ने कुरान की आयत की तिलावत की। उन्होंने कहा, ‘अल्लाह की कुदरत से दुनिया का कोई भी मामला खाली नहीं है। इंसान को वास्तविक सुकून ईमान, इल्म और अहलेबैत से मजबूत रिश्ता कायम करने से ही मिलता है।’ पैगंबर पुर कोल्हुआ के मौलाना इकराम रिजवी ने आयोजन के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक वार्षिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि ईमान, अकीदत और अहलेबैत से मोहब्बत के संकल्प को दोहराने का पवित्र अवसर है। कई जिलों से पहुंचे लोग कार्यक्रम के दौरान मुजफ्फरपुर, पटना, चंदनपट्टी (दरभंगा), मोतिहारी, वैशाली, अररिया, किशनगंज, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) समेत कई प्रमुख क्षेत्रों की अंजुमनों ने भी मजलिस, नौहाख्वानी और सीनाजनी (मातम) कर श्रद्धा सुमन अर्पित किए। पूरे आयोजन के दौरान ‘या हुसैन’ की सदाओं से माहौल गमगीन और आध्यात्मिक बना रहा।  

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