श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह के ऊपर स्थित टूटे स्वर्ण मंडित शिखर को पुनर्स्थापित करने और प्राचीन पत्थरों के क्षरण की वजह जानने के लिए IIT मद्रास की टीम पांच नवंबर को वाराणसी आएगी। स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग विशेषज्ञों की यह टीम आधुनिक उपकरणों की मदद से मंदिर के पत्थरों का तकनीकी परीक्षण और विश्लेषण करेगी। जांच रिपोर्ट के आधार पर टूटे शिखर को दोबारा स्थापित करने और पत्थरों को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। अप्रैल में गिरा था शिखर अप्रैल 2026 में गर्भगृह के ऊपर वायव्य कोण में स्थापित स्वर्ण मंडित शिखर का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिर गया था। मंदिर प्रशासन ने टूटे हुए हिस्से को सुरक्षित रखने के लिए मंदिर के लॉकर में रखवा दिया। इसके बाद प्राचीन पत्थरों के क्षरण को रोकने और शिखर के संरक्षण के उपाय तलाशने के लिए विशेषज्ञ संस्थान से तकनीकी जांच कराने का निर्णय लिया गया। मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने बताया कि मंदिर के प्राचीन पत्थरों के स्ट्रक्चर पर सोने की परत चढ़ाई गई है। समय बीतने और बारिश जैसे प्राकृतिक कारणों से पत्थरों का क्षरण होने की आशंका है। इसकी तकनीकी जांच के लिए पहले IIT BHU से संपर्क किया गया था, लेकिन वहां से स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकलने पर IIT मद्रास के स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग विभाग को परीक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई। मई में टीम ने किया था परीक्षण मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने बताया 27 और 28 मई को IIT मद्रास की टीम ने मंदिर परिसर का दौरा कर प्रारंभिक परीक्षण किया था। उस दौरान विशेषज्ञों ने मंदिर के स्ट्रक्चर में इस्तेमाल किए गए पत्थरों का विस्तृत तकनीकी परीक्षण और विश्लेषण कराने का सुझाव दिया था। इस कार्य के लिए मंदिर प्रशासन की ओर से तीन सितंबर को IIT मद्रास को 18 लाख रुपये का भुगतान भी किया गया। अब पांच नवंबर को डॉ. अरुण मेनन के नेतृत्व में विशेषज्ञों की टीम मंदिर पहुंचेगी। टीम पत्थरों की मौजूदा स्थिति, उनके क्षरण के संभावित कारणों और संरचना की मजबूती का परीक्षण करेगी। इसके बाद मिलने वाली रिपोर्ट के आधार पर टूटे शिखर को पुनर्स्थापित करने और प्राचीन पत्थरों को भविष्य में क्षरण से बचाने के उपाय तय किए जाएंगे।

