Google AI Data Center: आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में गूगल के 15 अरब डॉलर के विशाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डेटा सेंटर प्रोजेक्ट को लेकर विवाद बढ़ रहा है। स्थानीय लोग और पर्यावरण कार्यकर्ता इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। ‘लोग डेटा नहीं पी सकते’ जैसे नारों के जरिए जल संकट, बिजली ग्रिड पर बढ़ते दबाव, जमीन अधिग्रहण और पर्यावरण को होने वाले संभावित नुकसान पर चिंता जताई जा रही है। विरोध के बीच गूगल ने पानी और बिजली से जुड़ी चिंताओं पर अपना पक्ष रखा है। कंपनी का कहना है कि स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए डेटा सेंटर में पानी की खपत कम करने वाली तकनीक अपनाने की योजना बनाई गई है।
पानी की खपत पर गूगल ने क्या कहा?
गूगल के एशिया-प्रशांत क्षेत्र के इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रमुख अलेक्जेंडर स्मिथ ने बताया कि स्थानीय जल संकट को देखते हुए शुरुआत से ही वाटर कूलिंग के बजाय एडवांस एयर कूलिंग तकनीक का विकल्प चुना गया है। कंपनी का लक्ष्य 2030 तक जितने ताजे पानी का इस्तेमाल करेगी, उसका 120 प्रतिशत वापस भरने का है। बिजली की भारी जरूरत को लेकर भी कंपनी ने अपना पक्ष रखा है। गूगल के अनुसार, वह बिजली ग्रिड को मजबूत करने के लिए जरूरी अपग्रेडेशन का खर्च खुद उठाएगी। साथ ही, कंपनी स्वच्छ ऊर्जा में निवेश करने की योजना पर काम करेगी।
विशाखापत्तनम में ही क्यों बन रहा AI हब?
विशाखापत्तनम की समुद्र के नीचे बिछी सब-सी केबल्स के जरिए सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया से सीधी कनेक्टिविटी है। इसके अलावा, तकनीकी प्रतिभा और स्वच्छ ऊर्जा की संभावनाएं भी इस स्थान को परियोजना के लिए उपयोगी बनाती हैं। गूगल करीब 600 एकड़ में अमेरिका के बाहर अपना सबसे बड़ा AI हब बना रहा है। इसके 2028 तक चालू होने की संभावना है।
रोजगार और विस्थापन को लेकर चिंता
परियोजना के लिए जंगलों और आम-काजू के बगीचों को हटाए जाने को लेकर किसान और कार्यकर्ता नाराज हैं। उनका कहना है कि डेटा सेंटरों से स्थानीय लोगों को सीमित रोजगार मिलता है। वहीं, गूगल का अनुमान है कि परियोजना से सालाना 68.8 करोड़ डॉलर की आर्थिक गतिविधि पैदा होगी और हर नौकरी के साथ आसपास नौ नए अवसर बन सकते हैं। कंपनी ने विस्थापित लोगों को मुआवजा और आवास देने की बात भी कही है।

