गुजरात के अंबाजी मंदिर में क्यों नहीं होती देवी की मूर्ति की पूजा? जानें शक्तिपीठ का धार्मिक महत्व

गुजरात के अंबाजी मंदिर में क्यों नहीं होती देवी की मूर्ति की पूजा? जानें शक्तिपीठ का धार्मिक महत्व

Ambaji Temple: गुजरात के बनासकांठा जिले में अंबाजी देश के प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल है। गुजरात-राजस्थान सीमा के निकट आरासुरी पर्वत और अंबिका वन क्षेत्र में बने मंदिर की अनूठी विशेषता यह है कि यहां देवी की प्रतिमा के बजाय पवित्र वीसा यंत्र की पूजा की जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार बीसा यंत्र की फोटोग्राफी भी प्रतिबंधित है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार पिता दक्ष के यज्ञ में पति भगवान शिव का अपमान होने से व्यथित माता सती ने यज्ञकुंड में प्राण त्याग दिए। क्रोधित भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर विचरण करने लगे। सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित किया। मान्यता है कि जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ बने। अंबाजी में माता सती का हृदय गिरने की मान्यता है, इसलिए इस स्थल का विशेष धार्मिक महत्व है।

देवताओं ने आद्यशक्ति की आराधना की

मान्यता है कि महिषासुर के अत्याचारों से परेशान देवताओं ने आद्यशक्ति की आराधना की। देवी ने युद्ध में महिषासुर का वध किया और महिषासुर मर्दिनी कहलाईं। मां अंबा के इसी शक्तिशाली स्वरूप की यहां श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह पर्वत भगवान श्रीकृष्ण के चूड़ाकर्म संस्कार (मुंडन) का स्थल भी रहा है। इसे महिषासुर मर्दिनी देवी का निवास स्थान भी माना जाता है।

गब्बर पर्वत पर अखंड ज्योत

अंबाजी गांव से करीब चार किलोमीटर दूर गब्बर पर्वत को मां अंबा की मूल प्राकट्य स्थली माना जाता है। पर्वत के शिखर पर एक गुफानुमा स्थान में अखंड ज्योत प्रज्वलित रहती है, जिसके दर्शन रात में मुख्य मंदिर से भी किए जा सकते हैं। यहां पीपल के पेड़ के नीचे देवी के चरणचिह्न होने की मान्यता है। इस तरह अंबाजी मंदिर और गब्बर पर्वत श्रद्धालुओं के लिए आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। मां अंबा के इस धाम में मोहनथाल का विशेष महत्व है।

भगवान श्रीराम और महाराणा प्रताप से जुड़ी कथाएं

एक धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता सीता की खोज के दौरान भगवान श्रीराम को गब्बर पर्वत पर मां अंबा की आराधना करने की सलाह दी गई थी। पूजा से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें अजय बाण प्रदान किया, जिससे उन्होंने रावण पर विजय प्राप्त की। वहीं, लोकमान्यता है कि महाराणा प्रताप भी मां अंबा के अनन्य भक्त थे। देवी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उन्होंने अपनी प्रसिद्ध तलवार उनके चरणों में अर्पित की थी।

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