Mythology Movies Trend: भारतीय सिनेमा में पौराणिक कहानियों का रिश्ता बिलकुल भी नया नहीं है। देश की पहली फीचर फिल्म मानी जाने वाली दादासाहेब फाल्के की ‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913) भी पौराणिक कथा से जुड़ी थी। इसके बाद ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘कृष्ण’, ‘शिव’ और दूसरे देवी-देवताओं से जुड़ी कहानियों पर लंबे समय से फिल्में बनती रहीं हैं और आगे भी बनती रहेंगी।
लेकिन आज जिस चीज को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह पौराणिक कहानियों पर आधारित फिल्मों की नहीं, बल्कि उनको दर्शकों के सामने पेश करने के तरीकों में आए बदलावों की भी है। अब कहानी सिर्फ किसी देवी-देवता या धार्मिक पात्र की जिंदगी दिखाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसमें फैंटेसी, सुपरहीरो, साइंस फिक्शन, एक्शन, थ्रिलर और सिनेमैटिक यूनिवर्स जैसे आधुनिक फॉर्मेट भी जुड़ चुके हैं।
यही वजह है कि ‘हनुमान अंश’, ‘हुनमान’, ‘कांतारा’, ‘कल्कि 2898 एडी’, ‘महावतार नरसिम्हा’, ‘मिराई’ जैसी फिल्मों ने अलग-अलग तरीके से दर्शकों का ध्यान खींचा और अब पर्दे पर भगवान राम, परशुराम, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और दूसरे लेकिन कम दिखाए गए पौराणिक किरदारों को केंद्र में रखकर बड़े प्रोजेक्ट बनाए जा रहे हैं।
पहले की पौराणिक फिल्मों और आज की फिल्मों में क्या अंतर है?
पुराने दौर की माइथोलॉजिकल फिल्मों का आधार धार्मिक कथा और भक्ति हुआ करता था। कहानी अक्सर दर्शकों को पहले से पता होती थी और फिल्म का आकर्षण उस कथा को पर्दे पर देखने में था। उस समय का सिनेमा तकनीकी रूप से समृद्ध भी नहीं था, इसलिए कहानी, संवाद, संगीत और कलाकारों की कला ही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत होती थी। वहीं, आज का दर्शक इन धार्मिक कहानियों से पूरी तरह परिचित होने के बावजूद देखना चाहता है कि फिल्ममेकर उस कहानी को नए विजुअल और नए नैरेटिव के साथ कैसे पेश करता है।
इसका बड़ा उदाहरण ‘कल्कि 2898 एडी’ है। फिल्म ने महाभारत के किरदारों और घटनाओं को भविष्य की साइंस-फिक्शन दुनिया से जोड़ा। Ormax Media के मुताबिक, 2024 के पहले छह महीनों में यह भारत की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म रही और उस दौरान इंडियन बॉक्स ऑफिस में इसका कुल योगदान 15 प्रतिशत से ज्यादा था।
सिर्फ राम-कृष्ण नहीं, अनसुने किरदारों पर भी फोकस
आज मेकर्स लोकप्रिय देवी-देवताओं के अलावा उन किरदारों की कहानियां भी तलाश रहे हैं, जिन्हें पर्दे पर कम जगह मिली है। परशुराम, अश्वत्थामा और द्रोणाचार्य जैसे किरदारों पर नए प्रोजेक्ट सामने आ रहे हैं। बता दें कि आगामी फिल्म ‘महावतार’ में परशुराम की कहानी दिखाई जाएगी, जबकि ‘महावतार नरसिम्हा’ ने भगवान नरसिंह की कथा को एनीमेशन के जरिए बड़े पर्दे पर पेश किया। इससे मेकर्स को दर्शकों के लिए जानी-पहचानी दुनिया के अंदर नई कहानी तलाशने का मौका मिल रहा है।
टेक्नोलॉजी से मिला माइथोलॉजी किरदारों और कहानी को नया रूप
माइथोलॉजी के नए दौर में VFX और एनीमेशन की भूमिका भी बेहद अहम है। पहले किसी विशाल युद्ध, दिव्य अस्त्र या भगवान के विराट रूप को पर्दे पर दिखाना तकनीकी रूप से मुश्किल था। आज CGI, VFX और एनीमेशन ने फिल्ममेकर्स को ऐसी दुनिया बनाने की आजादी दी है, जिसकी पहले सिर्फ कल्पना की जा सकती थी।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘महावतार नरसिम्हा’। जानकारी के लिए बता दें कि इस फिल्म को बनाने में साढ़े चार साल लगे और इसे विष्णु पुराण, नरसिंह पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण जैसे स्रोतों से जोड़ा गया। इसके निर्देशक अश्विन कुमार ने इसे सिर्फ एनीमेशन फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी कहानी के रूप में दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने की बात कही थी। इसका सीधा सा मतलब है कि तकनीक यहां सिर्फ कहानी को खूबसूरत बनाने का माध्यम नहीं है। यह उन पौराणिक दृश्यों को विश्वसनीय बनाने की कोशिश है, जिन्हें पुराने दौर में सीमित साधनों के कारण उसी स्तर पर दिखाना संभव नहीं था।
क्या है माइथोलॉजिकल फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत?
दर्शक इन कहानियों से पूरी तरह अनजान नहीं है। रामायण, महाभारत, पुराण और लोककथाओं के पात्र बचपन से किताबों, टीवी सीरियल, परिवार और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं के जरिए लोगों तक पहुंचते रहे हैं। इसलिए जब वही पात्र बड़े पर्दे पर नए अंदाज में दिखाई देता है तो दर्शक के मन में पहले से एक कनेक्शन मौजूद होता है।
2024 में प्रकाशित हुई एक स्टडी में 15 से 45 वर्ष के 50 लोगों पर किए गए सर्वे में Contemporary Mythological Hindi Films के प्रति युवाओं में रुचि और एंगेजमेंट देखने की बात सामने आई। सर्वे ने यह भी पाया कि ऐसी फिल्में दर्शकों में भारतीय सांस्कृतिक विरासत को और जानने की जिज्ञासा पैदा कर सकती हैं और सोशल मीडिया इस रुचि को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है।
फिल्ममेकर्स के लिए भी क्यों आकर्षक है माइथोलॉजी?
फिल्ममेकर्स के नजरिए से देखें तो माइथोलॉजी में तीन बड़ी चीजें एक साथ मिलती हैं, जानी-मानी कहानी, बड़ा विजुअल स्केल और भावनात्मक जुड़ाव। कहानी के कई पात्र और घटनाएं दर्शकों के लिए पहले से परिचित होते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि फिल्म अपने आप सफल हो जाएगी, लेकिन मेकर्स को एक ऐसा कल्चरल रिफ्रेंस पॉइंट जरूर मिलता है जिसके साथ दर्शक पहले से जुड़ा हुआ महसूस करता है। दूसरी तरफ ऐसी कहानियां बड़े कैनवास पर बनाई जा सकती हैं। युद्ध, महल, जंगल, दिव्य अस्त्र, अलग-अलग लोक और बड़े किरदार VFX और एनीमेशन के माध्यम से रोमांच पैदा कर सकते हैं।
तीसरी चीज है फैमिली ऑडियंस। माइथोलॉजी और लोककथाओं से जुड़ी कहानियां अलग-अलग उम्र के दर्शकों को जोड़ने की क्षमता रखती हैं। Ormax Media के ऑडियंस रिसर्च में 2023 में नियमित रूप से हिंदी फिल्में देखने वाले दर्शकों के बीच माइथोलॉजी को पसंदीदा फिल्मों की पांचवीं सबसे लोकप्रिय जॉनर के तौर पर जगह मिली थी।
बन रहे हैं माइथोलॉजी सिनेमेटिक यूनिवर्स
पहले एक फिल्म में कहानी पूरी हो जाती थी, लेकिन अब मेकर्स इन किरदारों की पूरी दुनिया बनाने पर जोर दे रहे हैं। ‘Hanu-Man’ और ‘कांतारा’ जैसी फिल्मों के बाद पौराणिक और लोककथाओं पर आधारित सिनेमेटिक यूनिवर्स की चर्चा तेज हुई है। यानी अब फिल्ममेकर्स का फोकस सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि कई कहानियों वाली पूरी दुनिया बनाने पर है।
‘रामायण’ से लेकर ‘महावतार’ तक बड़ा हो रहा है दायरा
इस ट्रेंड की सबसे बड़ी झलक आने वाले बड़े प्रोजेक्ट्स में दिखाई देती है। रणबीर कपूर और यश स्टारर ‘रामायण’ को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने की योजना के साथ बड़े लेवल पर बनाया जा रहा है। ये फिल्म दो पार्ट्स में रिलीज होगी।
वहीं, विक्की कौशल की ‘महावतार’ के अलावा आने वाले समय में कई माइथोलॉजिकल फिल्में आने वालीं हैं, जिनमें द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा जैसे किरदारों पर भी प्रोजेक्ट सामने आ रहे हैं। यानी आज की फिल्मों में नया सिर्फ VFX नहीं, बल्कि कहानियां दिखाने का तरीका है। पहले फिल्में सीधे पौराणिक कथाओं को पर्दे पर उतारती थीं, अब उनमें फैंटेसी, सुपरहीरो, साइंस फिक्शन और लोककथाओं का मेल हो रहा है।

