बेगूसराय के बिहट मिडिल स्कूल के क्लास 6 से 8 के स्टूडेंट्स के लिए साइबर सुरक्षा एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर विशेष जागरूकता कार्यशाला आयोजित की गई। वर्कशॉप का उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित, सजग और जिम्मेदार डिजिटल नागरिक बनाना था। साइबरवाणी के तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला में करीब 350 विद्यार्थियों ने लगातार तीन सत्रों में उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यशाला की खासियत रही कि बच्चों को केवल साइबर सुरक्षा के नियम बताने के बजाय वास्तविक घटनाओं, तात्कालिक उदाहरणों, संवाद और व्यावहारिक गतिविधियों के माध्यम से डिजिटल अपराधों की पहचान तथा उनसे बचाव के तरीके समझाए गए। शशांक शेखर तथा उनकी टीम ने विद्यार्थियों से किया सीधा संवाद आईआईटी दिल्ली से साइबर सिक्योरिटी एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की पढ़ाई पूरी कर लौटे साइबरवाणी के संस्थापक शशांक शेखर तथा उनकी टीम ने विद्यार्थियों से सीधे संवाद करते हुए बताया कि साइबर अपराधी फर्जी लिंक, संदिग्ध संदेश, एपीके फाइल, ओटीपी सत्यापन, केवाईसी अपडेट, सोशल मीडिया संपर्क और यूपीआई भुगतान जैसे माध्यमों का इस्तेमाल कर बच्चों एवं उनके परिवारों को ठगी का शिकार बनाने का प्रयास करते हैं। विद्यार्थियों को समझाया गया कि डिजिटल दुनिया में छोटी-सी लापरवाही भी बड़े नुकसान का कारण बन सकती है। कार्यशाला में सोशल मीडिया के सुरक्षित एवं जिम्मेदार उपयोग, निजी जानकारी की सुरक्षा, संदिग्ध लिंक एवं संदेशों की पहचान, डिजिटल गोपनीयता, सुरक्षित ऑनलाइन व्यवहार तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सकारात्मक एवं जिम्मेदार उपयोग से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को सरल एवं रोचक तरीके से समझाया गया। बच्चों को यह भी बताया गया कि एआई ज्ञान और रचनात्मकता का शक्तिशाली माध्यम है। लेकिन उसके दुरुपयोग और उससे जुड़े जोखिमों को पहचानना भी जरूरी है। साइबर सुपरहीरो की शपथ बना विशेष आकर्षण कार्यशाला का विशेष आकर्षण रहा साइबर सुपरहीरो की शपथ, जिसमें विद्यार्थियों ने सुरक्षित डिजिटल व्यवहार अपनाने, संदिग्ध गतिविधियों में सावधानी बरतने तथा अपने परिवार और आसपास के लोगों को साइबर अपराधों से बचाने के लिए जागरूक करने का संकल्प लिया। बच्चों को प्रेरित किया गया कि वे अपने माता-पिता, भाई-बहन, पड़ोसियों और परिचितों को साइबर ठगी से बचाव के उपाय बताकर अपने घर और समाज के साइबर चैंपियन बनें। इस दौरान यह संदेश भी दिया गया कि जिस घर तक इंटरनेट पहुंच चुका है, उस घर तक साइबर सुरक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सही एवं जिम्मेदार उपयोग की जानकारी भी पहुंचना जरूरी है। विद्यालय का प्रयास है कि कार्यशाला से मिली जानकारी विद्यार्थियों के माध्यम से परिवारों तक और परिवारों से पूरे बीहट तक पहुंचें। हेल्पलाइन 1930 की जानकारी बनी व्यावहारिक सुरक्षा का सूत्र सत्र के दौरान विद्यार्थियों को राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 की उपयोगी जानकारी दी गई। उन्हें बताया गया कि ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी की स्थिति में घबराने या चुप बैठने के बजाय तत्काल 1930 पर संपर्क कर शिकायत दर्ज कराना महत्वपूर्ण है। समय पर सही कदम उठाना साइबर ठगी से होने वाले नुकसान को सीमित करने में अहम भूमिका निभा सकता है। साइबर सुरक्षा भविष्य का आवश्यक जीवन-कौशल इस अवसर पर विद्यालय के प्रधानाध्यापक रंजन कुमार ने कहा कि साइबर सुरक्षा को लेकर सतर्कता और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बेहतर समझ आने वाले समय के आवश्यक जीवन-कौशल का हिस्सा होगी। आज के बच्चे कल के डिजिटल पहचान वाले नागरिक भी हैं। इसलिए साइबर सुरक्षा केवल किसी एक जागरूकता कार्यक्रम का विषय नहीं, बल्कि भविष्य की एक आवश्यक जीवन-कौशल है। हमारा प्रयास है कि बच्चे स्वयं सुरक्षित डिजिटल व्यवहार सीखें और अपने परिवार तथा समाज में भी साइबर जागरूकता के वाहक बनें। उन्होंने कहा कि साइबर सुरक्षा की जानकारी अब केवल शहरों या तकनीकी रूप से जागरूक लोगों तक सीमित नहीं रह सकती। विद्यालयों में तैयार हो रहे साइबर सुपरहीरो और साइबर चैंपियन इस जागरूकता को अपने परिवार से लेकर आसपास के समाज और पूरे बीहट तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। विद्यालयों को डिजिटल रूप से सजग एवं जिम्मेदार समुदाय तैयार करने का केंद्र बनना होगा। विद्यालय की पाठ्यसहगामी गतिविधियों की समन्वयक एवं वरिष्ठ स्नातक शिक्षिका अनुपमा सिंह ने कहा कि बच्चों की सक्रिय सहभागिता और जिज्ञासा ने कार्यशाला को बेहद प्रभावी बनाया। जब साइबर सुरक्षा को वास्तविक परिस्थितियों और गतिविधियों से जोड़कर समझाया जाता है, तो बच्चे केवल जानकारी ग्रहण नहीं करते, बल्कि उसे अपने व्यवहार में उतारने और दूसरों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करते हैं। बच्चों के सवालों ने विशेषज्ञों को किया प्रभावित कार्यशाला के दौरान विद्यार्थियों ने साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े अनेक व्यावहारिक एवं जिज्ञासापूर्ण प्रश्न पूछे। अंशुमन, कर्ण, शबनम, स्वीकृति, माही, अदिति, दिव्या सहित दर्जनों विद्यार्थियों के सवालों ने कार्यशाला के अतिथियों को प्रभावित किया। बच्चों ने विशेष रूप से संदिग्ध लिंक की पहचान, फर्जी संदेशों से बचाव, सोशल मीडिया पर निजी जानकारी साझा करने में सावधानी और साइबर ठगी की स्थिति में तत्काल उठाए जाने वाले कदमों को लेकर सवाल किए। बेगूसराय के बिहट मिडिल स्कूल के क्लास 6 से 8 के स्टूडेंट्स के लिए साइबर सुरक्षा एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर विशेष जागरूकता कार्यशाला आयोजित की गई। वर्कशॉप का उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित, सजग और जिम्मेदार डिजिटल नागरिक बनाना था। साइबरवाणी के तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला में करीब 350 विद्यार्थियों ने लगातार तीन सत्रों में उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यशाला की खासियत रही कि बच्चों को केवल साइबर सुरक्षा के नियम बताने के बजाय वास्तविक घटनाओं, तात्कालिक उदाहरणों, संवाद और व्यावहारिक गतिविधियों के माध्यम से डिजिटल अपराधों की पहचान तथा उनसे बचाव के तरीके समझाए गए। शशांक शेखर तथा उनकी टीम ने विद्यार्थियों से किया सीधा संवाद आईआईटी दिल्ली से साइबर सिक्योरिटी एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की पढ़ाई पूरी कर लौटे साइबरवाणी के संस्थापक शशांक शेखर तथा उनकी टीम ने विद्यार्थियों से सीधे संवाद करते हुए बताया कि साइबर अपराधी फर्जी लिंक, संदिग्ध संदेश, एपीके फाइल, ओटीपी सत्यापन, केवाईसी अपडेट, सोशल मीडिया संपर्क और यूपीआई भुगतान जैसे माध्यमों का इस्तेमाल कर बच्चों एवं उनके परिवारों को ठगी का शिकार बनाने का प्रयास करते हैं। विद्यार्थियों को समझाया गया कि डिजिटल दुनिया में छोटी-सी लापरवाही भी बड़े नुकसान का कारण बन सकती है। कार्यशाला में सोशल मीडिया के सुरक्षित एवं जिम्मेदार उपयोग, निजी जानकारी की सुरक्षा, संदिग्ध लिंक एवं संदेशों की पहचान, डिजिटल गोपनीयता, सुरक्षित ऑनलाइन व्यवहार तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सकारात्मक एवं जिम्मेदार उपयोग से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को सरल एवं रोचक तरीके से समझाया गया। बच्चों को यह भी बताया गया कि एआई ज्ञान और रचनात्मकता का शक्तिशाली माध्यम है। लेकिन उसके दुरुपयोग और उससे जुड़े जोखिमों को पहचानना भी जरूरी है। साइबर सुपरहीरो की शपथ बना विशेष आकर्षण कार्यशाला का विशेष आकर्षण रहा साइबर सुपरहीरो की शपथ, जिसमें विद्यार्थियों ने सुरक्षित डिजिटल व्यवहार अपनाने, संदिग्ध गतिविधियों में सावधानी बरतने तथा अपने परिवार और आसपास के लोगों को साइबर अपराधों से बचाने के लिए जागरूक करने का संकल्प लिया। बच्चों को प्रेरित किया गया कि वे अपने माता-पिता, भाई-बहन, पड़ोसियों और परिचितों को साइबर ठगी से बचाव के उपाय बताकर अपने घर और समाज के साइबर चैंपियन बनें। इस दौरान यह संदेश भी दिया गया कि जिस घर तक इंटरनेट पहुंच चुका है, उस घर तक साइबर सुरक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सही एवं जिम्मेदार उपयोग की जानकारी भी पहुंचना जरूरी है। विद्यालय का प्रयास है कि कार्यशाला से मिली जानकारी विद्यार्थियों के माध्यम से परिवारों तक और परिवारों से पूरे बीहट तक पहुंचें। हेल्पलाइन 1930 की जानकारी बनी व्यावहारिक सुरक्षा का सूत्र सत्र के दौरान विद्यार्थियों को राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 की उपयोगी जानकारी दी गई। उन्हें बताया गया कि ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी की स्थिति में घबराने या चुप बैठने के बजाय तत्काल 1930 पर संपर्क कर शिकायत दर्ज कराना महत्वपूर्ण है। समय पर सही कदम उठाना साइबर ठगी से होने वाले नुकसान को सीमित करने में अहम भूमिका निभा सकता है। साइबर सुरक्षा भविष्य का आवश्यक जीवन-कौशल इस अवसर पर विद्यालय के प्रधानाध्यापक रंजन कुमार ने कहा कि साइबर सुरक्षा को लेकर सतर्कता और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बेहतर समझ आने वाले समय के आवश्यक जीवन-कौशल का हिस्सा होगी। आज के बच्चे कल के डिजिटल पहचान वाले नागरिक भी हैं। इसलिए साइबर सुरक्षा केवल किसी एक जागरूकता कार्यक्रम का विषय नहीं, बल्कि भविष्य की एक आवश्यक जीवन-कौशल है। हमारा प्रयास है कि बच्चे स्वयं सुरक्षित डिजिटल व्यवहार सीखें और अपने परिवार तथा समाज में भी साइबर जागरूकता के वाहक बनें। उन्होंने कहा कि साइबर सुरक्षा की जानकारी अब केवल शहरों या तकनीकी रूप से जागरूक लोगों तक सीमित नहीं रह सकती। विद्यालयों में तैयार हो रहे साइबर सुपरहीरो और साइबर चैंपियन इस जागरूकता को अपने परिवार से लेकर आसपास के समाज और पूरे बीहट तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। विद्यालयों को डिजिटल रूप से सजग एवं जिम्मेदार समुदाय तैयार करने का केंद्र बनना होगा। विद्यालय की पाठ्यसहगामी गतिविधियों की समन्वयक एवं वरिष्ठ स्नातक शिक्षिका अनुपमा सिंह ने कहा कि बच्चों की सक्रिय सहभागिता और जिज्ञासा ने कार्यशाला को बेहद प्रभावी बनाया। जब साइबर सुरक्षा को वास्तविक परिस्थितियों और गतिविधियों से जोड़कर समझाया जाता है, तो बच्चे केवल जानकारी ग्रहण नहीं करते, बल्कि उसे अपने व्यवहार में उतारने और दूसरों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करते हैं। बच्चों के सवालों ने विशेषज्ञों को किया प्रभावित कार्यशाला के दौरान विद्यार्थियों ने साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े अनेक व्यावहारिक एवं जिज्ञासापूर्ण प्रश्न पूछे। अंशुमन, कर्ण, शबनम, स्वीकृति, माही, अदिति, दिव्या सहित दर्जनों विद्यार्थियों के सवालों ने कार्यशाला के अतिथियों को प्रभावित किया। बच्चों ने विशेष रूप से संदिग्ध लिंक की पहचान, फर्जी संदेशों से बचाव, सोशल मीडिया पर निजी जानकारी साझा करने में सावधानी और साइबर ठगी की स्थिति में तत्काल उठाए जाने वाले कदमों को लेकर सवाल किए।

