अम्बेडकरनगर की सड़कों पर लक्जरी बसों का ऐसा नेटवर्क दौड़ रहा है, जिस पर न परिवहन विभाग की सख्ती दिख रही है और न पुलिस की निगरानी का असर। दिल्ली, बिहार और दूसरे राज्यों को जोड़ने वाली 50 से ज्यादा निजी लग्जरी व स्लीपर बसें जिले की सीमा से रोज गुजरती हैं। जिला मुख्यालय के गोहन्ना-न्योतरिया बाईपास से लेकर बसखारी रोड और ग्रामीण इलाकों के रास्तों तक इन बसों की आवाजाही बनी रहती है। यात्रियों को समय पर गंतव्य तक पहुंचाने की होड़ में कई बसें तेज रफ्तार से दौड़ती हैं। क्षमता से अधिक सवारियां बैठाने और बसों में किए गए बदलावों की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। दो अक्टूबर को गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे पर दिल्ली से दरभंगा जा रही एसी बस की ट्रेलर से भिड़ंत ने इस पूरे नेटवर्क की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। हादसे में चार यात्रियों की मौत हुई। बस में बड़ी संख्या में यात्री सवार थे। जिले से गुजरते समय जांच हादसे की भयावहता ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि लंबी दूरी की इन बसों की सड़क पर उतरने से पहले और जिले से गुजरते समय जांच आखिर कितनी होती है। रिकॉर्ड भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। मार्च 2024 में आजमगढ़ से दिल्ली जा रही डबल डेकर एसी स्लीपर बस अकबरपुर क्षेत्र में अनियंत्रित होकर सड़क से नीचे पलट गई थी। हादसे में एक यात्री की मौत और 26 लोग घायल हुए थे। सितंबर 2026 में भी आजमगढ़ से दिल्ली जा रही स्लीपर बस न्योतरिया बाईपास के पास अनियंत्रित होकर खाईं में उतर गई थी। सवाल यह नहीं कि हादसे के बाद बस चालक पर कार्रवाई हुई या नहीं। क्षमता और संचालन की जांच सवाल यह है कि हादसा होने से पहले इन बसों की रफ्तार, फिटनेस, परमिट, क्षमता और संचालन की जांच कौन कर रहा है। कई बसों में बड़ी संख्या में यात्री होते हैं और चालक लगातार कई घंटे सफर करते हैं। ऐसे में थकान, तेज रफ्तार और ओवरलोडिंग का संयोजन सड़क पर चलती बस को खतरे में बदल सकता है। सड़क पर बस की रफ्तार सिर्फ चालक की जिम्मेदारी नहीं है। जिस व्यवस्था के सामने नियमों के साथ बस सड़क पर उतरती है, जवाबदेही उसकी भी तय होनी चाहिए। इस सबंध में एआरटीओ सतेंद्र यादव ने बताया कि बसों के खिलाफ अभियान चलाकर कार्रवाई की जाती है।

