बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) ने संजय प्रभात नाम के छात्र को फिजिक्स विषय में अंक घटाकर फेल घोषित कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए बोर्ड की कार्रवाई को मनमाना और गैर-कानूनी कहा है। संजय प्रभात बेगूसराय के साहेबपुर कमाल के रहने वाले हैं। बिहार बोर्ड ने उनका नाम बदलकर संजय पर्वत कर दिया था। MBBS पास किया, बोर्ड ने मैट्रिक में बताया फेल संजय ने 2013 में BSEB से मैट्रिक परीक्षा फर्स्ट डिवीजन से पास किया था। प्रोविजनल प्रमाणपत्र के आधार पर उन्होंने 2015 में इंटरमीडिएट पास किया। NEET क्वालिफाई किया और नालंदा मेडिकल कॉलेज पटना से 2023 में MBBS की डिग्री हासिल की। 2024 में उन्होंने नाम सुधार व फाइनल रिजल्ट के लिए बोर्ड से संपर्क किया तो पता चला कि फिजिक्स में उनके अंक 59 से घटाकर 41 कर दिए गए हैं। उन्हें फेल घोषित कर दिया गया है। यह देखकर संजय चौक गए। बोर्ड में कोई सुनवाई नहीं हुई तो संजय ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। स्क्रूटनी के लिए आवेदन नहीं दिया, बोर्ड ने खुद से बदल दिया अंक याचिकाकर्ता संजय की ओर से वकील मधु प्रसून, रेणु कुमारी, पुलकित रंजन व शैलेश कुमार ने पैरवी करते हुए दलील दी कि संजय ने कभी स्क्रूटनी के लिए आवेदन ही नहीं किया था। बोर्ड ने बिना किसी वैध आधार के खुद से अंक बदल दिया। वहीं, बोर्ड की ओर से वकील ने दावा किया कि स्क्रूटनी याचिकाकर्ता के अनुरोध पर ही हुई थी। बोर्ड की ओर से पक्ष अधिवक्ता ज्ञानशंकर रख रहे थे। दिलचस्प यह कि न्यायमूर्ति हरीश कुमार ने पाया कि बोर्ड यह साबित करने में असमर्थ रहा कि याचिकाकर्ता ने स्क्रूटनी के लिए आवेदन किया था या संशोधित परिणाम के बारे में कभी उन्हें सूचित किया गया था। बोर्ड विनियम, 1964 के नियम 20(c) के अनुसार स्क्रूटनी परिणाम छात्र व संस्था दोनों को सूचित करना अनिवार्य है, जिसका पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि इस चूक ने याचिकाकर्ता के भविष्य व करियर को गंभीर रूप से प्रभावित किया। कोर्ट ने दिया आदेश, एक सप्ताह में नाम सुधार करते दें प्रमाणपत्र कोर्ट ने अनुच्छेद 226 के तहत पूर्ण न्याय के सिद्धांत और सुप्रीम कोर्ट के गुजरात स्टील ट्यूब्स मामले का हवाला देते हुए निर्णय दिया कि याचिकाकर्ता का मूल परिणाम (1st डिवीजन) ही मान्य रहेगा, न कि बोर्ड द्वारा एकतरफा संशोधित परिणाम। कोर्ट ने बोर्ड को चार सप्ताह के भीतर नाम सुधार करते हुए मूल अंकपत्र के आधार पर प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने भविष्य के लिए भी निर्देश दिया कि ‘किसी भी स्क्रूटनी या सुधार आवेदन पर बोर्ड निर्धारित समय-सीमा के भीतर ऑनलाइन या पंजीकृत डाक के माध्यम से निर्णय की सूचना अनिवार्य रूप से दे।’ कोर्ट में यह मामला 2024 से 2026 तक चला और इसमें 10 सुनवाई हुई। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) ने संजय प्रभात नाम के छात्र को फिजिक्स विषय में अंक घटाकर फेल घोषित कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए बोर्ड की कार्रवाई को मनमाना और गैर-कानूनी कहा है। संजय प्रभात बेगूसराय के साहेबपुर कमाल के रहने वाले हैं। बिहार बोर्ड ने उनका नाम बदलकर संजय पर्वत कर दिया था। MBBS पास किया, बोर्ड ने मैट्रिक में बताया फेल संजय ने 2013 में BSEB से मैट्रिक परीक्षा फर्स्ट डिवीजन से पास किया था। प्रोविजनल प्रमाणपत्र के आधार पर उन्होंने 2015 में इंटरमीडिएट पास किया। NEET क्वालिफाई किया और नालंदा मेडिकल कॉलेज पटना से 2023 में MBBS की डिग्री हासिल की। 2024 में उन्होंने नाम सुधार व फाइनल रिजल्ट के लिए बोर्ड से संपर्क किया तो पता चला कि फिजिक्स में उनके अंक 59 से घटाकर 41 कर दिए गए हैं। उन्हें फेल घोषित कर दिया गया है। यह देखकर संजय चौक गए। बोर्ड में कोई सुनवाई नहीं हुई तो संजय ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। स्क्रूटनी के लिए आवेदन नहीं दिया, बोर्ड ने खुद से बदल दिया अंक याचिकाकर्ता संजय की ओर से वकील मधु प्रसून, रेणु कुमारी, पुलकित रंजन व शैलेश कुमार ने पैरवी करते हुए दलील दी कि संजय ने कभी स्क्रूटनी के लिए आवेदन ही नहीं किया था। बोर्ड ने बिना किसी वैध आधार के खुद से अंक बदल दिया। वहीं, बोर्ड की ओर से वकील ने दावा किया कि स्क्रूटनी याचिकाकर्ता के अनुरोध पर ही हुई थी। बोर्ड की ओर से पक्ष अधिवक्ता ज्ञानशंकर रख रहे थे। दिलचस्प यह कि न्यायमूर्ति हरीश कुमार ने पाया कि बोर्ड यह साबित करने में असमर्थ रहा कि याचिकाकर्ता ने स्क्रूटनी के लिए आवेदन किया था या संशोधित परिणाम के बारे में कभी उन्हें सूचित किया गया था। बोर्ड विनियम, 1964 के नियम 20(c) के अनुसार स्क्रूटनी परिणाम छात्र व संस्था दोनों को सूचित करना अनिवार्य है, जिसका पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि इस चूक ने याचिकाकर्ता के भविष्य व करियर को गंभीर रूप से प्रभावित किया। कोर्ट ने दिया आदेश, एक सप्ताह में नाम सुधार करते दें प्रमाणपत्र कोर्ट ने अनुच्छेद 226 के तहत पूर्ण न्याय के सिद्धांत और सुप्रीम कोर्ट के गुजरात स्टील ट्यूब्स मामले का हवाला देते हुए निर्णय दिया कि याचिकाकर्ता का मूल परिणाम (1st डिवीजन) ही मान्य रहेगा, न कि बोर्ड द्वारा एकतरफा संशोधित परिणाम। कोर्ट ने बोर्ड को चार सप्ताह के भीतर नाम सुधार करते हुए मूल अंकपत्र के आधार पर प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने भविष्य के लिए भी निर्देश दिया कि ‘किसी भी स्क्रूटनी या सुधार आवेदन पर बोर्ड निर्धारित समय-सीमा के भीतर ऑनलाइन या पंजीकृत डाक के माध्यम से निर्णय की सूचना अनिवार्य रूप से दे।’ कोर्ट में यह मामला 2024 से 2026 तक चला और इसमें 10 सुनवाई हुई।

