Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि संतान न होने को लेकर पति-पत्नी के बीच झगड़े में पत्नी को ‘बांझ’ कहना अपने आप में भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत क्रूरता का अपराध नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की पीठ ने हिरेंद्र कुशवाहा की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
मामला क्या था?
जोड़े की शादी दिसंबर 2015 में हुई थी। उनके कोई संतान नहीं हुई। पत्नी ने आरोप लगाया था कि उसे संतान पैदा न कर पाने के लिए ताने दिए जाते थे। 23 नवंबर, 2020 को विवाद के दौरान मारपीट कर कमरे में बंद करने का भी आरोप लगाया गया। साथ ही ससुर और देवर पर दुष्कर्म के आरोप भी थे। मजिस्ट्रेट ने धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत केवल पति को आरोपी बनाते हुए समन जारी किया था। पति ने इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी। मामला लखनऊ के गाजीपुर थाने से संबंधित था।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
पीठ ने कहा कि आरोपों को प्रथम दृष्टया सही मानने पर भी यह मामला मुख्य रूप से संतान न होने से उत्पन्न वैवाहिक विवाद और पति-पत्नी के बीच आपत्तिजनक टिप्पणियों का प्रतीत होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संतान न होने को लेकर महज ताने, चिकित्सकीय जांच कराने से इनकार या घरेलू विवाद के दौरान हुई कहासुनी धारा 498-ए के तहत तब तक अपराध नहीं है, जब तक क्रूरता के आवश्यक तत्व पूरे न हों।
‘बांझ’ कहने के आरोप पर अदालत ने कहा कि टिप्पणी निश्चित रूप से असंवेदनशील और निंदनीय है, लेकिन इस मामले की परिस्थितियों में यह धारा 504 के तहत अपराध के लिए पर्याप्त नहीं है। केवल अपशब्द या अपमानजनक शब्दों का आदान-प्रदान तब तक धारा 504 का अपराध नहीं बनता, जब तक यह साबित न हो कि अपमान जानबूझकर शांति भंग करने के उद्देश्य से किया गया था।
दहेज आरोप पर भी सवाल
अदालत ने पाया कि मूल शिकायत में दहेज की मांग का कोई आरोप नहीं था। बाद के बयान में ऐसा आरोप जोड़ा गया। पीठ ने कहा कि बाद के बयान से मूल शिकायत की कमियों को पूरा नहीं किया जा सकता। आरोपों को मुख्यतः सामान्य और पर्याप्त आधार से रहित मानते हुए न्यायालय ने कहा कि मुकदमा जारी रखना आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
क्या रद्द हुआ?
पति के खिलाफ आईपीसी की धारा 498-ए (क्रूरता), 323 (चोट पहुंचाना), 504 (अपमान), 506 (धमकी) तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई। यह फैसला वैवाहिक विवादों में आपराधिक कानून के दुरुपयोग को लेकर महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। अदालत ने दोहराया कि हर वैवाहिक असहमति या अपमानजनक शब्द को आपराधिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।


