लखनऊ के चर्चित मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में उम्रकैद की सजा पा चुके पूर्व मंत्री अमर मणि त्रिपाठी ने चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। उन्होंने महाराजगंज की फेरेंदा सीट से 2027 में ताल ठोंकने की बात कही है। हालांकि, कानूनन वह अगस्त 2029 से पहले चुनाव नहीं लड़ सकते हैं, फिर भी उन्होंने ऐसी घोषणा कर दी है। वैसे अगर उनकी राह में कानूनी रोड़ा नहीं होता, तो भी फेरेंदा में उनके लिए जीत की राह आसान नहीं होती। वहां के चुनावी समीकरण और आंकड़े ऐसा ही बयान कर रहे हैं।
फेरेंदा विधान सभा चुनाव परिणाम 2022 : 1246 मतों के अंतर से हुआ जीत-हार का फैसला
| दल | उम्मीदवार | वोट | % | ±% |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | वीरेंद्र चौधरी | 85,181 | 40.28 | +3.1 |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | बजरंग बहादुर सिंह | 83,935 | 39.69 | +1.33 |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | इशू चौरसिया | 21,665 | 10.24 | -7.74 |
| समाजवादी पार्टी (SP) | शंख लाल मांझी | 16,457 | 7.78 | — |
| इनमें से कोई नहीं (NOTA) | इनमें से कोई नहीं | 1,484 | 0.7 | -0.31 |
| जीत का अंतर (Majority) | — | 1,246 | 0.59 | -0.59 |
| कुल मतदान (Turnout) | — | 211,490 | 60.19 | +0.55 |
| परिणाम: | कांग्रेस (INC) ने भाजपा (BJP) से यह सीट जीती |
फेरेंदा विधान सभा चुनाव परिणाम 2017: 2500 से भी कम रहा जीत-हार का अंतर
| दल | उम्मीदवार | वोट | % |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | बजरंग बहादुर सिंह | 76,312 | 38.36 |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | वीरेंद्र चौधरी | 73,958 | 37.18 |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | बेचन | 35,765 | 17.98 |
| राष्ट्रीय लोक दल (RLD) | विजय सिंह | 2,742 | 1.38 |
| निषाद पार्टी (NISHAD) | राज कुमार निषाद | 1,930 | 0.97 |
| एआईएमआईएम (AIMIM) | रीना | 1,878 | 0.94 |
| इनमें से कोई नहीं (NOTA) | इनमें से कोई नहीं | 1,992 | 1.01 |
| जीत का अंतर (Majority) | — | 2,354 | 1.18 |
| कुल मतदान (Turnout) | — | 198,945 | 59.64 |
| परिणाम: | भाजपा (BJP) ने सपा (SP) से यह सीट जीती | स्विंग: |
फेरेंदा में 2017 और 2022 के विधान सभा चुनाव नतीजों का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि कांग्रेस और बीजेपी में कांटे की टक्कर रही है। जीत-हार का अंतर 2500 से भी कम रहा है। 2017 में बीजेपी 2354 मतों से जीती तो 2022 में वह कांग्रेस से महज 1246 मतों से हार गई। दोनों पार्टियों ने दोनों चुनावों में एक ही उम्मीदवार पर भरोसा किया।
2017 और 2022 के फेरेंदा विधान सभा चुनाव नतीजों के आंकड़े साफ बताते हैं कि यहां से भाजपा या कांग्रेस से इतर, किसी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतना आसान नहीं है। इस बात की कोई संभावना नहीं है कि कांग्रेस या भाजपा में से कोई भी अमर मणि पर दांव लगाएगा। उनका अतीत ऐसा हो चुका है कि कोई भी पार्टी उन्हें अपने से दूर ही रखना चाहेगी।
पार्टी का साथ न मिले तो फेरेंदा से निर्दलीय चुनाव जीतना और भी मुश्किल होगा। खास कर वैसे नेता के लिए जो कत्ल के जुर्म में उम्रकैद पा चुका हो और करीब दो दशकों से सार्वजनिक जीवन से दूर हो। 1985 के बाद यहां से कोई निर्दलीय चुनाव नहीं जीता है।
| फेरेंदा विधान सभा चुनाव वर्ष | विधायक का नाम | राजनीतिक दल |
| 1951 | गौरी राम | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 1967 | गौरी राम | निर्दलीय |
| 1969 | प्यारी | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 1974 | लक्ष्मी नारायण | कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (CPI) |
| 1977 | श्याम नारायण तिवारी | कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (CPI) |
| 1980 | श्याम नारायण तिवारी | निर्दलीय |
| 1985 | हर्षवर्धन सिंह | जनता पार्टी |
| 1989 | श्याम नारायण तिवारी | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 1991 | श्याम नारायण तिवारी | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 1993 | चौधरी शिवेंद्र सिंह | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
| 1996 | विनोद मणि | कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) (CPI-M) |
| 2002 | श्याम नारायण तिवारी | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 2007 | बजरंग बहादुर सिंह | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
| 2012 | बजरंग बहादुर सिंह | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
| 2015^ (उपचुनाव) | विनोद मणि | समाजवादी पार्टी (SP) |
| 2017 | बजरंग बहादुर सिंह | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
| 2022 | वीरेंद्र चौधरी | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
जातिगत राजनीति की बात करें तो अब ब्राह्मण नेताओं में भी अमर मणि की पहले वाली हैसियत नहीं बची है। न ही ब्राह्मणों की राजनीति में वह अब फिट बैठते हैं। एक समय था जब अमर मणि ने वीरेंद्र प्रताप साही से टक्कर लेकर पूर्वाञ्चल के कद्दावर ब्राह्मण नेता की हैसियत बना ली थी। वह चार बार विधायक रहे और इतने ही मुख्यमंत्रियों की सरकारों में मंत्री भी रहे। लेकिन, उन्हें सत्ता से बाहर हुए दो दशक से ज्यादा हो गए हैं। इस बीच ज़्यादातर समय वह जेल में ही रहे। 2023 में उनकी रिहाई हुई है। एक बार वह जेल से भी चुनाव जीत चुके हैं। पर इस बात को भी सालों बीत गए। अब न वह दौर रहा और न उनका दबदबा रहा।

