पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (पीएमसीएच) के मल्टी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के भवन निर्माण में देरी पर सीके कंस्ट्रक्शन एजेंसी पर कार्रवाई हुई है। सीपीडब्ल्यूडी ने इस एजेंसी को ब्लैकलिस्ट कर दिया है। पीएमसीएच की प्रिंसिपल गीता सिन्हा ने बताया कि सीके कंस्ट्रक्शन और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) के बीच पिछले महीने बैठक हुई थी। अस्पताल में एचवीएसी सिस्टम और बिल्डिंग मैनेजमेंट सिस्टम (बीएमएस) का काम अभी अधूरा है। सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का भवन तय समय पर पूरा नहीं हो पाया। इसी वजह से सीपीडब्ल्यूडी ने सीके कंस्ट्रक्शन को हटाकर यह काम दूसरी एजेंसी को सौंप दिया है। पुरानी एजेंसी लगातार समय सीमा पार कर रही थी, जिससे प्रोजेक्ट का काम सालों से अटका हुआ था। अब नई एजेंसी को यह काम नवंबर तक पूरा करने का लक्ष्य मिला है। 200 करोड़ रुपये की लागत से 200 बेड का बनेगा अस्पताल प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत 200 करोड़ रुपये की लागत से 200 बेड का यह मल्टी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बन रहा है। 8 साल बाद भी यह अधूरा है। जी+7 सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का भवन बाहर से लगभग तैयार दिखता है, लेकिन अंदर की स्थिति अलग है। असल में, इंटरनल फिनिशिंग, एचवीएसी सिस्टम, बिल्डिंग मैनेजमेंट सिस्टम (बीएमएस), मेडिकल गैस पाइपलाइन, बिजली बैकअप और दूसरे तकनीकी काम अभी पूरे नहीं हुए हैं। हालांकि, दावा है कि बाकी फिनिशिंग का काम तेजी से पूरा किया जा रहा है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, लगभग 6 करोड़ 42 लाख 48 हजार रुपये की आधुनिक मशीनें खरीदी जा चुकी हैं। ये मशीनें गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होनी हैं, लेकिन अभी तक लगी नहीं हैं। ज्यादातर उपकरण पिछले डेढ़ साल से पैक होकर सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के बंद कमरों में रखे हैं। इन उपकरणों की सुरक्षा के लिए 24 घंटे गार्ड लगाए गए हैं। गीता सिन्हा (प्रिंसिपल) ने बताया की मेडिकल उपकरण समय से पहले अस्पताल पहुंच गए थे, लेकिन निर्माण कार्य लंबित रहने की वजह से उनका उपयोग नहीं हो पा रहा। किसी भी उपकरण की एक निश्चित उपयोग अवधि और तकनीकी वैधता होती है। यदि समय पर इंस्टॉलेशन और मेंटेनेंस नहीं हो, तो भारी नुकसान हो सकता है। 2019 में हुआ था शिलान्यास सुपर-स्पेशियलिटी भवन का शिलान्यास वर्ष 2019 में हुआ था। उस समय दावा किया गया था कि इसके शुरू होने से बिहार के मरीजों को विश्वस्तरीय इलाज के लिए राज्य से बाहर नहीं जाना पड़ेगा। हालांकि, 8 साल बीत जाने के बाद भी यह परियोजना पूरी तरह से शुरू नहीं हो पाई है। पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (पीएमसीएच) के मल्टी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के भवन निर्माण में देरी पर सीके कंस्ट्रक्शन एजेंसी पर कार्रवाई हुई है। सीपीडब्ल्यूडी ने इस एजेंसी को ब्लैकलिस्ट कर दिया है। पीएमसीएच की प्रिंसिपल गीता सिन्हा ने बताया कि सीके कंस्ट्रक्शन और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) के बीच पिछले महीने बैठक हुई थी। अस्पताल में एचवीएसी सिस्टम और बिल्डिंग मैनेजमेंट सिस्टम (बीएमएस) का काम अभी अधूरा है। सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का भवन तय समय पर पूरा नहीं हो पाया। इसी वजह से सीपीडब्ल्यूडी ने सीके कंस्ट्रक्शन को हटाकर यह काम दूसरी एजेंसी को सौंप दिया है। पुरानी एजेंसी लगातार समय सीमा पार कर रही थी, जिससे प्रोजेक्ट का काम सालों से अटका हुआ था। अब नई एजेंसी को यह काम नवंबर तक पूरा करने का लक्ष्य मिला है। 200 करोड़ रुपये की लागत से 200 बेड का बनेगा अस्पताल प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत 200 करोड़ रुपये की लागत से 200 बेड का यह मल्टी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बन रहा है। 8 साल बाद भी यह अधूरा है। जी+7 सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का भवन बाहर से लगभग तैयार दिखता है, लेकिन अंदर की स्थिति अलग है। असल में, इंटरनल फिनिशिंग, एचवीएसी सिस्टम, बिल्डिंग मैनेजमेंट सिस्टम (बीएमएस), मेडिकल गैस पाइपलाइन, बिजली बैकअप और दूसरे तकनीकी काम अभी पूरे नहीं हुए हैं। हालांकि, दावा है कि बाकी फिनिशिंग का काम तेजी से पूरा किया जा रहा है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, लगभग 6 करोड़ 42 लाख 48 हजार रुपये की आधुनिक मशीनें खरीदी जा चुकी हैं। ये मशीनें गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होनी हैं, लेकिन अभी तक लगी नहीं हैं। ज्यादातर उपकरण पिछले डेढ़ साल से पैक होकर सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के बंद कमरों में रखे हैं। इन उपकरणों की सुरक्षा के लिए 24 घंटे गार्ड लगाए गए हैं। गीता सिन्हा (प्रिंसिपल) ने बताया की मेडिकल उपकरण समय से पहले अस्पताल पहुंच गए थे, लेकिन निर्माण कार्य लंबित रहने की वजह से उनका उपयोग नहीं हो पा रहा। किसी भी उपकरण की एक निश्चित उपयोग अवधि और तकनीकी वैधता होती है। यदि समय पर इंस्टॉलेशन और मेंटेनेंस नहीं हो, तो भारी नुकसान हो सकता है। 2019 में हुआ था शिलान्यास सुपर-स्पेशियलिटी भवन का शिलान्यास वर्ष 2019 में हुआ था। उस समय दावा किया गया था कि इसके शुरू होने से बिहार के मरीजों को विश्वस्तरीय इलाज के लिए राज्य से बाहर नहीं जाना पड़ेगा। हालांकि, 8 साल बीत जाने के बाद भी यह परियोजना पूरी तरह से शुरू नहीं हो पाई है।

