बिहार विधान परिषद चुनाव में पटना की दोनों सीटें सबसे ज्यादा चर्चा में रहीं। स्नातक सीट पर जदयू के नीरज कुमार ने अनंत सिंह के विरोध और जनसुराज के उम्मीदवार की चुनौती के बावजूद जीत दर्ज की। शिक्षक सीट पर राजद के डॉ. संजीव कुमार सिंह ने भाजपा के पांच बार के विजेता नवल किशोर यादव को हरा दिया। इसके साथ ही नवल किशोर का करीब तीन दशक पुराना दबदबा खत्म हो गया। विधानसभा में हार के बाद भी संजीव मैदान में डटे रहे। पटना शिक्षक सीट पर नई हिस्ट्री लिखी। नीतीश कुमार ने नीरज की राह कैसे आसान की? निशांत के क्या प्रयास रहे और अनंत सिंह ने क्यों नहीं अपना कैंडिडेट जिता पाए? संजीव कुमार की क्या रही स्ट्रेटजी? पढ़िए रिपोर्ट…। पटना स्नातक सीट: नीरज कुमार कैसे मजबूत हुए, 5 पॉइंट में समझें 1. नीतीश कुमार ने घर जाकर दिया सबसे बड़ा मैसेज नीरज कुमार की जीत सिर्फ एक सीट बचाने की कहानी नहीं है। चुनाव के दौरान जदयू के भीतर ही सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी। मोकामा के विधायक अनंत सिंह ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज के बजाय जनसुराज के डॉ. अनुज सिंह का समर्थन किया। इससे मुकाबला विपक्षी उम्मीदवारों की बजाए जदयू के नेतृत्व और संगठन के भीतर ही हो गया। नीरज के अस्पताल से निकलने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनसे मिलने उनके घर गए। इस मुलाकात को पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के समर्थन के संदेश के रूप में देखा गया। नीतीश कुमार ने एमएलसी कैंडिडेट के रूप में नीरज को प्राथमिकता दी साथ ही यह भी स्पष्ट मैसेज दिया कि पार्टी किसके साथ खड़ी है। नीतीश के समर्थन ने नीरज को राजनीतिक भरोसा दिलाया। इससे यह संदेश भी गया कि अनंत सिंह का प्रभाव पार्टी के आधिकारिक फैसले से बड़ा नहीं है। 2. निशांत कुमार ने पांच जगह प्रचार कर संभाला मोर्चा नीरज के अभियान में निशांत कुमार की सक्रियता ने भी राजनीतिक संदेश दिया। उन्होंने पांच जगहों पर प्रचार कर नीरज के पक्ष में वोट मांगे। अनंत सिंह पर सीधा हमला करने के बजाय आधिकारिक उम्मीदवार का समर्थन किया। इससे पार्टी के भीतर विवाद को और बढ़ाए बिना नीरज के पक्ष में स्पष्ट रुख सामने आया। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता संख्या विधानसभा क्षेत्र की तुलना में सीमित होती है, लेकिन चुनाव का दायरा बड़ा होता है। यहां केवल बड़ी सभाएं करना पर्याप्त नहीं है। पंजीकृत मतदाताओं तक पहुंचना, उनसे संपर्क रखना और मतदान के लिए प्रेरित करना जरूरी होता है। निशांत के प्रचार ने नीरज के अभियान को मजबूत पहचान दी। जदयू के कार्यकर्ताओं को भी यह संदेश मिला कि पार्टी का नेतृत्व उम्मीदवार के साथ है। इससे नीरज का चुनाव केवल व्यक्तिगत संपर्क पर निर्भर नहीं रहा, बल्कि उसे संगठन और वरिष्ठ नेतृत्व का समर्थन मिला। 3. अनंत सिंह का प्रभाव नीरज को हराने के लिए काफी नहीं रहा इस चुनाव का सबसे चर्चित पहलू अनंत सिंह का नीरज के खिलाफ उतरना था। उन्होंने जनसुराज के अनुज सिंह के लिए प्रचार किया। चुनाव के दौरान मोकामा में नीरज और अनंत समर्थक गुटों के बीच विवाद और पुलिस कार्रवाई की खबरें भी सामने आईं। इससे मुकाबला और चर्चित हो गया। अनंत सिंह ने अनुज सिंह की जीत और बाकी सभी की जमानत जब्त कराने का दावा किया, लेकिन रिजल्ट में नीरज सबसे आगे रहे। उन्हें 19,930 वोट मिले। राजद के दिलीप कुमार को 15,275 और जनसुराज के अनुज सिंह को 11,278 वोट मिले। नीरज ने दिलीप को 4,655 और अनुज को 8,652 वोट से पीछे छोड़ा। अनंत सिंह के समर्थन के बावजूद अनुज सिंह दूसरे स्थान पर नहीं पहुंच सके। इससे साफ हो गया कि उनका स्थानीय प्रभाव पूरे स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में निर्णायक समर्थन में नहीं बदल पाया। हालांकि, केवल नतीजे के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि अनंत सिंह का राजनीतिक प्रभाव खत्म हो गया। चुनाव का दायरा बड़ा था और मतदाताओं के अपने राजनीतिक विकल्प थे। इस चुनाव ने एक अहम अंतर सामने रखा कि किसी नेता की सभा में भीड़ जुटना और अलग-अलग क्षेत्रों के मतदाताओं से वोट हासिल करना दो अलग बातें हैं। नीरज ने व्यापक मतदाता समूह में बढ़त बनाकर जीत हासिल की। 4. नीरज ने खड़ा किया अपना वोट बैंक नीरज कुमार की जीत को केवल नीतीश और निशांत के समर्थन से नहीं समझा जा सकता। वह लंबे समय से पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की राजनीति में सक्रिय हैं। लगातार चौथी बार जीतकर विधान परिषद पहुंचे हैं। वर्षों तक एक ही निर्वाचन क्षेत्र में काम करने से मतदाताओं के बीच संपर्क और पहचान बनाई है। स्नातक सीट पर उम्मीदवार को मतदाताओं तक लगातार पहुंचना पड़ता है। नीरज की राजनीतिक पहचान, जदयू में उनकी भूमिका और लंबे समय का संपर्क उनकी ताकत रहे। चुनाव में अनंत सिंह के विरोध ने उनके पुराने समीकरणों को चुनौती दी, लेकिन वे अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलने में सफल रहे। आंकड़े भी उनकी बढ़त दिखाते हैं। नीरज को 19,930 वोट मिले, जबकि दूसरे स्थान पर रहे राजद के दिलीप कुमार को 15,275 वोट मिले। जनसुराज के अनुज सिंह 11,278 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे। यानी नीरज की जीत केवल जनसुराज के उम्मीदवार से मुकाबले का नतीजा नहीं थी। उन्होंने राजद के उम्मीदवार पर भी स्पष्ट बढ़त बनाई। पटना शिक्षक सीट: नवल किशोर यादव क्यों हारे? 1. पांच जीत के बाद भी पुराना प्रभाव कायम नहीं रहा भाजपा के नवल किशोर यादव लगातार पांच बार पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जीत चुके थे। इस बार राजद के डॉ. संजीव कुमार सिंह ने उन्हें 1,057 वोट से हरा दिया। संजीव को 4,487 वोट मिले, जबकि नवल को 3,430 वोट मिले। यह परिणाम भाजपा के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि नवल की पहचान लंबे समय से इस सीट के मजबूत उम्मीदवार के रूप में रही थी। 2. विवादित बयान से नाराजगी की चर्चा चुनाव प्रचार के दौरान नवल के एक बयान को लेकर विवाद हुआ। मीडिया रिपोर्टों में इस टिप्पणी को सवर्ण समाज के कुछ वर्गों की नाराजगी से जोड़ा गया। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में अलग-अलग सामाजिक समूहों के मतदाता हैं। इसलिए ऐसे बयान का असर पड़ा। 3. संजीव कुमार ने सामाजिक समीकरण बनाने में सफलता पाई राजद के संजीव कुमार के सामने नवल के लंबे राजनीतिक प्रभाव को चुनौती देने का अवसर था। उन्होंने 4,487 वोट हासिल किए और भाजपा उम्मीदवार को पीछे छोड़ दिया। उनके पक्ष में सामाजिक समीकरण, व्यक्तिगत संपर्क और शिक्षक मतदाताओं की प्राथमिकताओं ने अहम भूमिका निभाई। राजद के कारण कुछ यादव वोट बैंक तो उनके साथ था ही, भूमिहार वोट भी हासिल किए। 4. दिव्या ज्योति के वोट ने मुकाबले को त्रिकोणीय बनाया जनसुराज की दिव्या ज्योति को 1,571 वोट मिले। वह तीसरे स्थान पर रहीं। शिक्षक सीट पर भाजपा, राजद और जनसुराज के बीच मुकाबले ने चुनाव को त्रिकोणीय बनाया। माना जा रहा है कि जनसुराज ने शिक्षक सीट पर भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगा दी, इससे नवल किशोर कमजोर हुए। अब जेडीयू से राजद तक संजीव के सफर को जानिए डॉ. संजीव कुमार सिंह का राजनीतिक सफर जदयू से शुरू हुआ। वे परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे और करीब 21 साल तक जदयू से जुड़े रहे। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने पार्टी छोड़कर राजद का दामन थाम लिया। उस समय उन्होंने जदयू में घुटन महसूस होने की बात कही थी। उनका राजद में आना केवल एक नेता का पार्टी बदलना नहीं था। भूमिहार समुदाय से आने वाले संजीव कुमार के जरिए तेजस्वी यादव की पार्टी सवर्ण समाज के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने का संदेश देना चाहती थी। इसे तेजस्वी की ‘ए टू जेड’ समीकरण से जोड़कर देखा गया था। 2. विधानसभा चुनाव में हार, फिर विधान परिषद का टिकट 2025 में राजद ने संजीव को परबत्ता से उम्मीदवार बनाया, लेकिन वे लोजपा (रामविलास) के बाबूलाल शौर्य से चुनाव हार गए। इसके बाद राजद ने 2026 के पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के विधान परिषद चुनाव में उतारा। बड़ा सवाल यही था कि विधानसभा की हार के बाद पार्टी ने उन्हें दूसरा अवसर क्यों दिया? इसका सबसे बड़ा कारण उनकी क्षेत्रीय पहचान, भूमिहार समाज में पकड़ और राजद के सामाजिक आधार को विस्तार देने की कोशिश हो सकता है। 3. भूमिहारों की रैली: राजद के सामाजिक विस्तार की कोशिश की राजद में शामिल होने से पहले और बाद के राजनीतिक घटनाक्रम में भूमिहार समाज के साथ संजीव कुमार की सक्रियता अहम रही। पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में ब्रह्मर्षि समाज की बैठक बुलाने की खबर सामने आई थी। इसे भूमिहार मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा गया। संजीव कुमार ने अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को बनाए रखते हुए नई पार्टी में राजनीतिक पहचान मजबूत की। बिहार विधान परिषद चुनाव में पटना की दोनों सीटें सबसे ज्यादा चर्चा में रहीं। स्नातक सीट पर जदयू के नीरज कुमार ने अनंत सिंह के विरोध और जनसुराज के उम्मीदवार की चुनौती के बावजूद जीत दर्ज की। शिक्षक सीट पर राजद के डॉ. संजीव कुमार सिंह ने भाजपा के पांच बार के विजेता नवल किशोर यादव को हरा दिया। इसके साथ ही नवल किशोर का करीब तीन दशक पुराना दबदबा खत्म हो गया। विधानसभा में हार के बाद भी संजीव मैदान में डटे रहे। पटना शिक्षक सीट पर नई हिस्ट्री लिखी। नीतीश कुमार ने नीरज की राह कैसे आसान की? निशांत के क्या प्रयास रहे और अनंत सिंह ने क्यों नहीं अपना कैंडिडेट जिता पाए? संजीव कुमार की क्या रही स्ट्रेटजी? पढ़िए रिपोर्ट…। पटना स्नातक सीट: नीरज कुमार कैसे मजबूत हुए, 5 पॉइंट में समझें 1. नीतीश कुमार ने घर जाकर दिया सबसे बड़ा मैसेज नीरज कुमार की जीत सिर्फ एक सीट बचाने की कहानी नहीं है। चुनाव के दौरान जदयू के भीतर ही सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी। मोकामा के विधायक अनंत सिंह ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज के बजाय जनसुराज के डॉ. अनुज सिंह का समर्थन किया। इससे मुकाबला विपक्षी उम्मीदवारों की बजाए जदयू के नेतृत्व और संगठन के भीतर ही हो गया। नीरज के अस्पताल से निकलने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनसे मिलने उनके घर गए। इस मुलाकात को पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के समर्थन के संदेश के रूप में देखा गया। नीतीश कुमार ने एमएलसी कैंडिडेट के रूप में नीरज को प्राथमिकता दी साथ ही यह भी स्पष्ट मैसेज दिया कि पार्टी किसके साथ खड़ी है। नीतीश के समर्थन ने नीरज को राजनीतिक भरोसा दिलाया। इससे यह संदेश भी गया कि अनंत सिंह का प्रभाव पार्टी के आधिकारिक फैसले से बड़ा नहीं है। 2. निशांत कुमार ने पांच जगह प्रचार कर संभाला मोर्चा नीरज के अभियान में निशांत कुमार की सक्रियता ने भी राजनीतिक संदेश दिया। उन्होंने पांच जगहों पर प्रचार कर नीरज के पक्ष में वोट मांगे। अनंत सिंह पर सीधा हमला करने के बजाय आधिकारिक उम्मीदवार का समर्थन किया। इससे पार्टी के भीतर विवाद को और बढ़ाए बिना नीरज के पक्ष में स्पष्ट रुख सामने आया। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता संख्या विधानसभा क्षेत्र की तुलना में सीमित होती है, लेकिन चुनाव का दायरा बड़ा होता है। यहां केवल बड़ी सभाएं करना पर्याप्त नहीं है। पंजीकृत मतदाताओं तक पहुंचना, उनसे संपर्क रखना और मतदान के लिए प्रेरित करना जरूरी होता है। निशांत के प्रचार ने नीरज के अभियान को मजबूत पहचान दी। जदयू के कार्यकर्ताओं को भी यह संदेश मिला कि पार्टी का नेतृत्व उम्मीदवार के साथ है। इससे नीरज का चुनाव केवल व्यक्तिगत संपर्क पर निर्भर नहीं रहा, बल्कि उसे संगठन और वरिष्ठ नेतृत्व का समर्थन मिला। 3. अनंत सिंह का प्रभाव नीरज को हराने के लिए काफी नहीं रहा इस चुनाव का सबसे चर्चित पहलू अनंत सिंह का नीरज के खिलाफ उतरना था। उन्होंने जनसुराज के अनुज सिंह के लिए प्रचार किया। चुनाव के दौरान मोकामा में नीरज और अनंत समर्थक गुटों के बीच विवाद और पुलिस कार्रवाई की खबरें भी सामने आईं। इससे मुकाबला और चर्चित हो गया। अनंत सिंह ने अनुज सिंह की जीत और बाकी सभी की जमानत जब्त कराने का दावा किया, लेकिन रिजल्ट में नीरज सबसे आगे रहे। उन्हें 19,930 वोट मिले। राजद के दिलीप कुमार को 15,275 और जनसुराज के अनुज सिंह को 11,278 वोट मिले। नीरज ने दिलीप को 4,655 और अनुज को 8,652 वोट से पीछे छोड़ा। अनंत सिंह के समर्थन के बावजूद अनुज सिंह दूसरे स्थान पर नहीं पहुंच सके। इससे साफ हो गया कि उनका स्थानीय प्रभाव पूरे स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में निर्णायक समर्थन में नहीं बदल पाया। हालांकि, केवल नतीजे के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि अनंत सिंह का राजनीतिक प्रभाव खत्म हो गया। चुनाव का दायरा बड़ा था और मतदाताओं के अपने राजनीतिक विकल्प थे। इस चुनाव ने एक अहम अंतर सामने रखा कि किसी नेता की सभा में भीड़ जुटना और अलग-अलग क्षेत्रों के मतदाताओं से वोट हासिल करना दो अलग बातें हैं। नीरज ने व्यापक मतदाता समूह में बढ़त बनाकर जीत हासिल की। 4. नीरज ने खड़ा किया अपना वोट बैंक नीरज कुमार की जीत को केवल नीतीश और निशांत के समर्थन से नहीं समझा जा सकता। वह लंबे समय से पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की राजनीति में सक्रिय हैं। लगातार चौथी बार जीतकर विधान परिषद पहुंचे हैं। वर्षों तक एक ही निर्वाचन क्षेत्र में काम करने से मतदाताओं के बीच संपर्क और पहचान बनाई है। स्नातक सीट पर उम्मीदवार को मतदाताओं तक लगातार पहुंचना पड़ता है। नीरज की राजनीतिक पहचान, जदयू में उनकी भूमिका और लंबे समय का संपर्क उनकी ताकत रहे। चुनाव में अनंत सिंह के विरोध ने उनके पुराने समीकरणों को चुनौती दी, लेकिन वे अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलने में सफल रहे। आंकड़े भी उनकी बढ़त दिखाते हैं। नीरज को 19,930 वोट मिले, जबकि दूसरे स्थान पर रहे राजद के दिलीप कुमार को 15,275 वोट मिले। जनसुराज के अनुज सिंह 11,278 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे। यानी नीरज की जीत केवल जनसुराज के उम्मीदवार से मुकाबले का नतीजा नहीं थी। उन्होंने राजद के उम्मीदवार पर भी स्पष्ट बढ़त बनाई। पटना शिक्षक सीट: नवल किशोर यादव क्यों हारे? 1. पांच जीत के बाद भी पुराना प्रभाव कायम नहीं रहा भाजपा के नवल किशोर यादव लगातार पांच बार पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जीत चुके थे। इस बार राजद के डॉ. संजीव कुमार सिंह ने उन्हें 1,057 वोट से हरा दिया। संजीव को 4,487 वोट मिले, जबकि नवल को 3,430 वोट मिले। यह परिणाम भाजपा के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि नवल की पहचान लंबे समय से इस सीट के मजबूत उम्मीदवार के रूप में रही थी। 2. विवादित बयान से नाराजगी की चर्चा चुनाव प्रचार के दौरान नवल के एक बयान को लेकर विवाद हुआ। मीडिया रिपोर्टों में इस टिप्पणी को सवर्ण समाज के कुछ वर्गों की नाराजगी से जोड़ा गया। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में अलग-अलग सामाजिक समूहों के मतदाता हैं। इसलिए ऐसे बयान का असर पड़ा। 3. संजीव कुमार ने सामाजिक समीकरण बनाने में सफलता पाई राजद के संजीव कुमार के सामने नवल के लंबे राजनीतिक प्रभाव को चुनौती देने का अवसर था। उन्होंने 4,487 वोट हासिल किए और भाजपा उम्मीदवार को पीछे छोड़ दिया। उनके पक्ष में सामाजिक समीकरण, व्यक्तिगत संपर्क और शिक्षक मतदाताओं की प्राथमिकताओं ने अहम भूमिका निभाई। राजद के कारण कुछ यादव वोट बैंक तो उनके साथ था ही, भूमिहार वोट भी हासिल किए। 4. दिव्या ज्योति के वोट ने मुकाबले को त्रिकोणीय बनाया जनसुराज की दिव्या ज्योति को 1,571 वोट मिले। वह तीसरे स्थान पर रहीं। शिक्षक सीट पर भाजपा, राजद और जनसुराज के बीच मुकाबले ने चुनाव को त्रिकोणीय बनाया। माना जा रहा है कि जनसुराज ने शिक्षक सीट पर भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगा दी, इससे नवल किशोर कमजोर हुए। अब जेडीयू से राजद तक संजीव के सफर को जानिए डॉ. संजीव कुमार सिंह का राजनीतिक सफर जदयू से शुरू हुआ। वे परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे और करीब 21 साल तक जदयू से जुड़े रहे। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने पार्टी छोड़कर राजद का दामन थाम लिया। उस समय उन्होंने जदयू में घुटन महसूस होने की बात कही थी। उनका राजद में आना केवल एक नेता का पार्टी बदलना नहीं था। भूमिहार समुदाय से आने वाले संजीव कुमार के जरिए तेजस्वी यादव की पार्टी सवर्ण समाज के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने का संदेश देना चाहती थी। इसे तेजस्वी की ‘ए टू जेड’ समीकरण से जोड़कर देखा गया था। 2. विधानसभा चुनाव में हार, फिर विधान परिषद का टिकट 2025 में राजद ने संजीव को परबत्ता से उम्मीदवार बनाया, लेकिन वे लोजपा (रामविलास) के बाबूलाल शौर्य से चुनाव हार गए। इसके बाद राजद ने 2026 के पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के विधान परिषद चुनाव में उतारा। बड़ा सवाल यही था कि विधानसभा की हार के बाद पार्टी ने उन्हें दूसरा अवसर क्यों दिया? इसका सबसे बड़ा कारण उनकी क्षेत्रीय पहचान, भूमिहार समाज में पकड़ और राजद के सामाजिक आधार को विस्तार देने की कोशिश हो सकता है। 3. भूमिहारों की रैली: राजद के सामाजिक विस्तार की कोशिश की राजद में शामिल होने से पहले और बाद के राजनीतिक घटनाक्रम में भूमिहार समाज के साथ संजीव कुमार की सक्रियता अहम रही। पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में ब्रह्मर्षि समाज की बैठक बुलाने की खबर सामने आई थी। इसे भूमिहार मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा गया। संजीव कुमार ने अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को बनाए रखते हुए नई पार्टी में राजनीतिक पहचान मजबूत की।

