नालंदा विश्वविद्यालय में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ पर राष्ट्रीय परिसंवाद कार्यक्रम:राज्यपाल ने किया उद्घाटन; 15 यूनिवर्सिटी के कुलपति शामिल, आधुनिक शिक्षा के समन्वय पर मंथन

नालंदा विश्वविद्यालय में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ पर राष्ट्रीय परिसंवाद कार्यक्रम:राज्यपाल ने किया उद्घाटन; 15 यूनिवर्सिटी के कुलपति शामिल, आधुनिक शिक्षा के समन्वय पर मंथन

नालंदा विश्वविद्यालय में सोमवार को ‘विकसित भारत के निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का विधिवत शुभारंभ हुआ। विश्वमित्रालय सभागृह में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने किया। यह राष्ट्रीय आयोजन विश्वविद्यालय और नई दिल्ली स्थित ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ के संयुक्त तत्वावधान में 21 और 22 सितंबर को आयोजित किया जा रहा है। प्राचीन ज्ञान ही देश की असली शक्ति: राज्यपाल समारोह को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी समृद्ध प्राचीन ज्ञान परंपरा में निहित है। आज यह मंथन करने का समय है कि उस ज्ञान संपदा का समुचित उपयोग ‘विकसित भारत-2047’ के राष्ट्रीय विजन को साकार करने में कैसे किया जाए। राज्यपाल ने देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्वानों की उपस्थिति की सराहना करते हुए इस दो दिवसीय परिसंवाद को बेहद सामयिक और दूरगामी परिणाम वाला बताया। नई शिक्षा नीति और स्थानीय स्तर पर तालमेल पर जोर कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने विषय प्रवर्तन करते हुए आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि इस सम्मेलन में देशभर के 15 से अधिक विश्वविद्यालयों के कुलपति, 12 से अधिक तकनीकी संस्थानों के निदेशक और कई वरिष्ठ शिक्षाविद हिस्सा ले रहे हैं। परिसंवाद का मुख्य उद्देश्य नई शिक्षा नीति के तहत तैयार हो रहे नए पाठ्यक्रम को धरातल पर उतारना, शिक्षकों के प्रभावी प्रशिक्षण की रूपरेखा बनाना और विद्यार्थियों को इस ज्ञान प्रणाली से जोड़ना है। उन्होंने रेखांकित किया कि आने वाले 50 वर्षों के लक्ष्यों को ध्यान में रखकर बिहार, झारखंड सहित पड़ोसी राज्यों के विश्वविद्यालयों को भी इस साझा मंच पर जोड़ा गया है। देश के शीर्ष शिक्षाविदों की भागीदारी कार्यक्रम के दौरान देश के जाने-माने शिक्षाविद प्रो. रमेश भारद्वाज ने परिसंवाद की विस्तृत प्रस्तावना पेश की। वहीं, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष प्रो. भूषण पटवर्धन ने बतौर विशिष्ट अतिथि शिरकत करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक परिप्रेक्ष्य और शोध के साथ समन्वित करने पर अपने विचार रखे। उद्घाटन सत्र के बाद विभिन्न तकनीकी सत्रों में शोध, शिक्षण और नीतिगत बदलावों पर विचार-विमर्श की शुरुआत हुई। नालंदा विश्वविद्यालय में सोमवार को ‘विकसित भारत के निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का विधिवत शुभारंभ हुआ। विश्वमित्रालय सभागृह में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने किया। यह राष्ट्रीय आयोजन विश्वविद्यालय और नई दिल्ली स्थित ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ के संयुक्त तत्वावधान में 21 और 22 सितंबर को आयोजित किया जा रहा है। प्राचीन ज्ञान ही देश की असली शक्ति: राज्यपाल समारोह को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी समृद्ध प्राचीन ज्ञान परंपरा में निहित है। आज यह मंथन करने का समय है कि उस ज्ञान संपदा का समुचित उपयोग ‘विकसित भारत-2047’ के राष्ट्रीय विजन को साकार करने में कैसे किया जाए। राज्यपाल ने देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्वानों की उपस्थिति की सराहना करते हुए इस दो दिवसीय परिसंवाद को बेहद सामयिक और दूरगामी परिणाम वाला बताया। नई शिक्षा नीति और स्थानीय स्तर पर तालमेल पर जोर कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने विषय प्रवर्तन करते हुए आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि इस सम्मेलन में देशभर के 15 से अधिक विश्वविद्यालयों के कुलपति, 12 से अधिक तकनीकी संस्थानों के निदेशक और कई वरिष्ठ शिक्षाविद हिस्सा ले रहे हैं। परिसंवाद का मुख्य उद्देश्य नई शिक्षा नीति के तहत तैयार हो रहे नए पाठ्यक्रम को धरातल पर उतारना, शिक्षकों के प्रभावी प्रशिक्षण की रूपरेखा बनाना और विद्यार्थियों को इस ज्ञान प्रणाली से जोड़ना है। उन्होंने रेखांकित किया कि आने वाले 50 वर्षों के लक्ष्यों को ध्यान में रखकर बिहार, झारखंड सहित पड़ोसी राज्यों के विश्वविद्यालयों को भी इस साझा मंच पर जोड़ा गया है। देश के शीर्ष शिक्षाविदों की भागीदारी कार्यक्रम के दौरान देश के जाने-माने शिक्षाविद प्रो. रमेश भारद्वाज ने परिसंवाद की विस्तृत प्रस्तावना पेश की। वहीं, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष प्रो. भूषण पटवर्धन ने बतौर विशिष्ट अतिथि शिरकत करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक परिप्रेक्ष्य और शोध के साथ समन्वित करने पर अपने विचार रखे। उद्घाटन सत्र के बाद विभिन्न तकनीकी सत्रों में शोध, शिक्षण और नीतिगत बदलावों पर विचार-विमर्श की शुरुआत हुई।  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *