नालंदा- एक कमरे में 1 से 5वीं के 80 बच्चे:न बाउंड्री, न रसोई; शेड के नीचे बनता है मिड डे मील; बच्चे बोले- बरसात में स्थिति बदतर

नालंदा- एक कमरे में 1 से 5वीं के 80 बच्चे:न बाउंड्री, न रसोई; शेड के नीचे बनता है मिड डे मील; बच्चे बोले- बरसात में स्थिति बदतर

सरकारी दावों में प्राथमिक शिक्षा की तस्वीर भले ही संवरती दिखती हो, लेकिन जमीनी हकीकत सरकारी दावों की पोल खोल रही है। नालन्दा के हरनौत प्रखण्ड के सोराडीह पंचायत स्थित जीवनपुर प्राथमिक विद्यालय में शिक्षा का अधिकार कानून महज कागजों तक सीमित रह गया है। पहली से लेकर पांचवीं कक्षा तक के 80 छात्र-छात्राएं एक ही कमरे में एक साथ बैठने को मजबूर हैं। स्कूल में न तो चहारदीवारी है और न ही पक्का रसोई घर। पूर्व में बहती नदी और दक्षिण में गुजरती व्यस्त सड़क के मुहाने पर स्थित यह विद्यालय बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से एक बड़े खतरे का केंद्र बन चुका है। एक छत के नीचे पांच कक्षाएं: न ध्यान लगता है, न पढ़ाई होती है विद्यालय के एकमात्र कमरे में प्रवेश करते ही अव्यवस्था साफ झलकती है। कक्षा 1 से लेकर 5 तक के सभी बच्चे एक साथ बेंचों पर ठूंसे हुए हैं। एक तरफ शिक्षक पहली कक्षा के बच्चों को ककहरा सिखाते हैं, तो उसी कमरे के दूसरे कोने में पांचवीं के बच्चे गणित के सवाल हल करने की जद्दोजहद करते हैं। कक्षा 5 की छात्रा रिया कुमार कहती हैं कि हम पांचवीं में पढ़ते हैं और हमारे साथ ही पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी के बच्चे भी बैठते हैं। बहुत शोर और दिक्कत होती है। सभी कक्षाओं के लिए अलग-अलग कमरे होने चाहिए ताकि हम ठीक से पढ़ सकें। कक्षा 4 की छात्रा सुनीता कुमारी भी इसी दर्द को बयां करते हुए कहती हैं कि एक ही कमरे में सभी क्लास चलने से पढ़ाई में भारी परेशानी होती है। घर जैसा माहौल या दूसरे स्कूलों जैसी सुविधाएं यहां नहीं हैं। सड़क और नदी के बीच जान जोखिम में, बाउंड्री वॉल नदारद विद्यालय परिसर की भौगोलिक स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। स्कूल के ठीक पूर्व दिशा में नदी बहती है और दक्षिण दिशा से मुख्य ग्रामीण सड़क गुजरती है। परिसर में बाउंड्री वॉल नहीं होने के कारण खेलते-कूदते बच्चों के सड़क पर चले जाने या नदी में फिसलकर गिरने का खतरा हर वक्त बना रहता है। रिया और सुनीता दोनों एक सुर में कहती हैं कि स्कूल आते-जाते और परिसर में रहते हुए उन्हें हमेशा अनहोनी का डर सताता रहता है। छात्राएं खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। यदि कोई अप्रिय घटना घटती है, तो इसका जवाबदेह कौन होगा, यह सवाल प्रशासनिक उदासीनता के कटघरे में खड़ा है। झोपड़ीनुमा शेड में बनता है मध्याह्न भोजन, बारिश में बरामदा ही सहारा विद्यालय में पक्के रसोई घर का अभाव है। दीवार के सहारे करकट और फूस का शेड डालकर चूल्हे पर 80 बच्चों का मध्याह्न भोजन पकाया जाता है। खुले में भोजन पकने से धुआं और गंदगी सीधे बच्चों तक पहुंचती है। बरसात के दिनों में स्थिति बदतर हो जाती है। छात्रा सुनीता बताती हैं कि बारिश के समय जमीन गीली हो जाने के कारण सभी बच्चों को संकरे बरामदे में बैठकर खाना पड़ता है। सहायक शिक्षिका संजोगा सिंह बताती है कि भोजन बनाने के साथ-साथ अनाज, किताबें और स्टेशनरी का सामान सुरक्षित रखने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ती है। पक्का कमरा न होने से जरूरी सामग्रियां उसी एक कमरे में रखनी पड़ती हैं जहां बच्चे बैठते हैं। प्रधानाध्यापक बोले: ‘शिक्षा कोष’ पर लगाई गुहार, पर कार्रवाई सिफर 21 जुलाई 2025 से विद्यालय में पदस्थापित प्रधान शिक्षिका प्रियंका कुमारी बताती हैं कि जब से वे आई हैं, स्कूल भवन के विस्तार को लेकर लगातार प्रयास कर रही हैं। प्रियंका कुमारी ने कहा कि शुरुआत में कम बच्चे थे तो एक कमरा पर्याप्त था, लेकिन अब संख्या 80 हो चुकी है। हमने नए कमरों के निर्माण के लिए शिक्षा कोष पोर्टल पर आवेदन डाला हुआ है। पूर्व प्रधानाध्यापक भी आवेदन देते-देते थक गए थे। खुले में भोजन पकाने के बावजूद गुणवत्ता का ध्यान रखने के लिए एक रसोइया और एक शिक्षिका की ड्यूटी लगाई गई है। बाउंड्री न होने और नदी के खतरे पर जब उनसे पूछा गया कि किसी दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी, तो उन्होंने कहा कि अगर कोई हादसा होता है, तो स्वाभाविक रूप से विद्यालय परिवार पर ही जिम्मेदारी आएगी, जबकि संसाधन उपलब्ध कराना शासन-प्रशासन का काम है। वहीं प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी नितेश कुमार रंजन ने कहा कि मामला संज्ञान में नहीं है। स्थल निरीक्षण किया जाएगा। वहां मौजूद जमीन एवं स्कूल के इंफ्रास्ट्रक्चर कि जानकारी ली जाएगी।इसके बाद इस समस्या का हल निकाला जाएगा ‌। सरकारी दावों में प्राथमिक शिक्षा की तस्वीर भले ही संवरती दिखती हो, लेकिन जमीनी हकीकत सरकारी दावों की पोल खोल रही है। नालन्दा के हरनौत प्रखण्ड के सोराडीह पंचायत स्थित जीवनपुर प्राथमिक विद्यालय में शिक्षा का अधिकार कानून महज कागजों तक सीमित रह गया है। पहली से लेकर पांचवीं कक्षा तक के 80 छात्र-छात्राएं एक ही कमरे में एक साथ बैठने को मजबूर हैं। स्कूल में न तो चहारदीवारी है और न ही पक्का रसोई घर। पूर्व में बहती नदी और दक्षिण में गुजरती व्यस्त सड़क के मुहाने पर स्थित यह विद्यालय बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से एक बड़े खतरे का केंद्र बन चुका है। एक छत के नीचे पांच कक्षाएं: न ध्यान लगता है, न पढ़ाई होती है विद्यालय के एकमात्र कमरे में प्रवेश करते ही अव्यवस्था साफ झलकती है। कक्षा 1 से लेकर 5 तक के सभी बच्चे एक साथ बेंचों पर ठूंसे हुए हैं। एक तरफ शिक्षक पहली कक्षा के बच्चों को ककहरा सिखाते हैं, तो उसी कमरे के दूसरे कोने में पांचवीं के बच्चे गणित के सवाल हल करने की जद्दोजहद करते हैं। कक्षा 5 की छात्रा रिया कुमार कहती हैं कि हम पांचवीं में पढ़ते हैं और हमारे साथ ही पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी के बच्चे भी बैठते हैं। बहुत शोर और दिक्कत होती है। सभी कक्षाओं के लिए अलग-अलग कमरे होने चाहिए ताकि हम ठीक से पढ़ सकें। कक्षा 4 की छात्रा सुनीता कुमारी भी इसी दर्द को बयां करते हुए कहती हैं कि एक ही कमरे में सभी क्लास चलने से पढ़ाई में भारी परेशानी होती है। घर जैसा माहौल या दूसरे स्कूलों जैसी सुविधाएं यहां नहीं हैं। सड़क और नदी के बीच जान जोखिम में, बाउंड्री वॉल नदारद विद्यालय परिसर की भौगोलिक स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। स्कूल के ठीक पूर्व दिशा में नदी बहती है और दक्षिण दिशा से मुख्य ग्रामीण सड़क गुजरती है। परिसर में बाउंड्री वॉल नहीं होने के कारण खेलते-कूदते बच्चों के सड़क पर चले जाने या नदी में फिसलकर गिरने का खतरा हर वक्त बना रहता है। रिया और सुनीता दोनों एक सुर में कहती हैं कि स्कूल आते-जाते और परिसर में रहते हुए उन्हें हमेशा अनहोनी का डर सताता रहता है। छात्राएं खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। यदि कोई अप्रिय घटना घटती है, तो इसका जवाबदेह कौन होगा, यह सवाल प्रशासनिक उदासीनता के कटघरे में खड़ा है। झोपड़ीनुमा शेड में बनता है मध्याह्न भोजन, बारिश में बरामदा ही सहारा विद्यालय में पक्के रसोई घर का अभाव है। दीवार के सहारे करकट और फूस का शेड डालकर चूल्हे पर 80 बच्चों का मध्याह्न भोजन पकाया जाता है। खुले में भोजन पकने से धुआं और गंदगी सीधे बच्चों तक पहुंचती है। बरसात के दिनों में स्थिति बदतर हो जाती है। छात्रा सुनीता बताती हैं कि बारिश के समय जमीन गीली हो जाने के कारण सभी बच्चों को संकरे बरामदे में बैठकर खाना पड़ता है। सहायक शिक्षिका संजोगा सिंह बताती है कि भोजन बनाने के साथ-साथ अनाज, किताबें और स्टेशनरी का सामान सुरक्षित रखने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ती है। पक्का कमरा न होने से जरूरी सामग्रियां उसी एक कमरे में रखनी पड़ती हैं जहां बच्चे बैठते हैं। प्रधानाध्यापक बोले: ‘शिक्षा कोष’ पर लगाई गुहार, पर कार्रवाई सिफर 21 जुलाई 2025 से विद्यालय में पदस्थापित प्रधान शिक्षिका प्रियंका कुमारी बताती हैं कि जब से वे आई हैं, स्कूल भवन के विस्तार को लेकर लगातार प्रयास कर रही हैं। प्रियंका कुमारी ने कहा कि शुरुआत में कम बच्चे थे तो एक कमरा पर्याप्त था, लेकिन अब संख्या 80 हो चुकी है। हमने नए कमरों के निर्माण के लिए शिक्षा कोष पोर्टल पर आवेदन डाला हुआ है। पूर्व प्रधानाध्यापक भी आवेदन देते-देते थक गए थे। खुले में भोजन पकाने के बावजूद गुणवत्ता का ध्यान रखने के लिए एक रसोइया और एक शिक्षिका की ड्यूटी लगाई गई है। बाउंड्री न होने और नदी के खतरे पर जब उनसे पूछा गया कि किसी दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी, तो उन्होंने कहा कि अगर कोई हादसा होता है, तो स्वाभाविक रूप से विद्यालय परिवार पर ही जिम्मेदारी आएगी, जबकि संसाधन उपलब्ध कराना शासन-प्रशासन का काम है। वहीं प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी नितेश कुमार रंजन ने कहा कि मामला संज्ञान में नहीं है। स्थल निरीक्षण किया जाएगा। वहां मौजूद जमीन एवं स्कूल के इंफ्रास्ट्रक्चर कि जानकारी ली जाएगी।इसके बाद इस समस्या का हल निकाला जाएगा ‌।  

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