नवादा-517 एकड़ के डैम का क्यों हो रहा विरोध?:गंगाजल से रोज 4 लाख लोगों को मिलेगा पानी, लोग बोले-6 लाख की जमीन के 2 लाख मिले

नवादा-517 एकड़ के डैम का क्यों हो रहा विरोध?:गंगाजल से रोज 4 लाख लोगों को मिलेगा पानी, लोग बोले-6 लाख की जमीन के 2 लाख मिले

“हमलोगों को बेवकूफ बनाया गया। पहले कहा गया कि आप सरकार को जितना देंगे, उससे कहीं ज्यादा सरकार आपको देगी। जमीन ले ली गई, लेकिन अब झुनझुना पकड़ा दिया गया। हम इस डैम का विरोध कर रहे हैं। उचित मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी मिले, तभी सरकार डैम बनाए।” नवादा के नारदीगंज प्रखंड के मधुबन गांव के रहने वाले धर्मेंद्र ने दैनिक भास्कर से बातचीत में ये बातें कहीं। मधुबन और मोतनाजे गांव में बन रहे जलाशय के लिए जमीन अधिग्रहण के बाद अब ग्रामीण मुआवजे को लेकर सवाल उठा रहे हैं। पिछले दिनों प्रशासन ने अधिग्रहित जमीन पर बुलडोजर चलाकर निर्माण का रास्ता साफ किया। इसके बाद सैकड़ों ग्रामीण मौके पर पहुंचकर विरोध करने लगे। आखिर यह जलाशय क्यों बनाया जा रहा है? इससे नवादा और आसपास के लोगों को क्या फायदा होगा? जिन किसानों की जमीन ली जा रही है, वे विरोध क्यों कर रहे हैं? उन्हें कितना मुआवजा मिला और वे कितना मांग रहे हैं? प्रशासन का क्या कहना है? जलाशय में पानी कहां से आएगा और इसका डायमेंशन कितना होगा? पढ़िए मधुबन जलाशय की पूरी ग्राउंड रिपोर्ट… नारदीगंज के मधुबन और मोतनाजे गांव में खेतों के बीच मिट्टी का एक लंबा बांध खड़ा किया जा रहा है। करीब 2.94 किलोमीटर लंबे इस बांध के पीछे 517 एकड़ में पानी जमा होगा। इसका नाम मधुबन जलाशय है। गंगाजल आपूर्ति योजना के फेज-दो, पार्ट-एक के तहत बन रहे इस जलाशय में 27 मिलियन क्यूबिक मीटर यानी 27 एमसीएम पानी जमा करने की क्षमता होगी। सरकार की योजना इस पानी को स्टोर कर नवादा और आसपास के शहरी व अर्ध-शहरी इलाकों तक पहुंचाने की है। परियोजना की अनुमानित लागत करीब 980.05 करोड़ रुपये है। जलाशय का मुख्य मकसद पेयजल उपलब्ध कराना है। सिंचाई के लिए सीधे पानी देने की योजना नहीं है, हालांकि जलाशय बनने से आसपास भूजल स्तर बढ़ने की उम्मीद है। यानी एक तरफ इलाके में आने वाले समय में पेयजल संकट दूर होने की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ इसी जलाशय के लिए जमीन देने वाले किसान मुआवजे और पुनर्वास को लेकर सवाल उठा रहे हैं। खेतों के बीच बन रहा 2.94 किमी का मिट्टी का बांध मधुबन जलाशय कोई पहाड़ी इलाके में बना ऊंचा बांध नहीं है। यह मैदानी इलाके में बनाया जा रहा ऑफ-स्ट्रीम स्टोरेज रिजर्वायर है। यानी गंगा के अतिरिक्त पानी को यहां लाकर जमा किया जाएगा। जलाशय को चारों तरफ से करीब 2.94 किलोमीटर लंबे मिट्टी के बांध से घेरा जा रहा है। बांध की ऊपरी चौड़ाई करीब 5 से 6 मीटर रखी जा रही है, ताकि निरीक्षण और दूसरे जरूरी काम के लिए वाहन चल सकें। जलाशय में एक बार में करीब 27 एमसीएम पानी जमा होगा। इस पानी को वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में शुद्ध करने के बाद पाइपलाइन के जरिए लोगों तक पहुंचाया जाना है। 3 से 4 लाख लोगों को पानी देने की योजना परियोजना के मुताबिक जलाशय की क्षमता नवादा शहर और आसपास के शहरी व अर्ध-शहरी इलाकों की करीब 3 से 4 लाख आबादी की जरूरत को ध्यान में रखकर तय की गई है। योजना के अनुसार गैर-मानसून महीनों में भी इस पानी का इस्तेमाल कर पेयजल की आपूर्ति जारी रखी जा सकेगी। परियोजना में 135 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के मानक के हिसाब से लंबे समय तक पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। यानी गंगा में बाढ़ का पानी कम होने के बाद भी लोगों के लिए पानी का इंतजाम बना रहे, इसी सोच के साथ यह जलाशय बनाया जा रहा है। 151 एकड़ जमीन पर शुरू हुआ काम, 435 एकड़ में असर का आकलन डैम के मुख्य हिस्से और मिट्टी के बांध के लिए 151 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया है। इसी जमीन पर अब निर्माण का काम चल रहा है। इसके अलावा सामाजिक प्रभाव के आकलन में करीब 435 एकड़ जमीन को परियोजना से प्रभावित होने वाले इलाके के तौर पर देखा गया है। इसमें आगे चलकर डैम के आसपास का हिस्सा, वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, पानी पहुंचाने के लिए पंपिंग व्यवस्था, आने-जाने का रास्ता और पुनर्वास के लिए जरूरी जमीन जैसी चीजें शामिल हैं। मधुबन और मोतनाजे गांव के लोग इस परियोजना से सीधे प्रभावित हो रहे हैं। यहां की जमीन डैम के डूब क्षेत्र और निर्माण के लिए ली जा रही है। 3 हजार परिवार प्रभावित होने का दावा ग्रामीण इलाकों में इस परियोजना को लेकर सबसे बड़ी चिंता विस्थापन की है। स्थानीय किसान महापंचायतों और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन के प्रारूप में करीब 3 हजार परिवारों के प्रभावित होने का दावा किया गया है। इस आंकड़े में केवल वे परिवार शामिल नहीं हैं जिनकी जमीन सीधे जा रही है, बल्कि ऐसे परिवार भी शामिल बताए गए हैं जिनकी खेती की जमीन चली गई या जिनकी आजीविका इन जमीनों पर निर्भर थी। हालांकि, 3 हजार परिवारों के पूर्ण रूप से विस्थापित होने की बात नहीं है। मधुबन और मोतनाजे के मुख्य रिहायशी हिस्सों में अभी भी ज्यादातर परिवार रह रहे हैं। पूर्ण विस्थापन और पुनर्वास की प्रक्रिया अभी चरणबद्ध तरीके से चल रही है। किसानों को कितना मुआवजा मिल रहा है? यही वह सवाल है जिस पर गांव में सबसे ज्यादा नाराजगी है। ग्रामीण प्रेम मांझी ने कहा कि “हमने सरकार का समर्थन इस उम्मीद में किया था कि हमारे घर बेहतर होंगे और जीवन सुधरेगा। आज हालात ऐसे हैं कि हमारे घर और जमीन दोनों पर संकट खड़ा हो गया है। जमीन चली गई तो हम जाएंगे कहां और परिवार चलाएंगे कैसे? हमारी मांग सिर्फ इतनी है कि हमें जमीन का उचित मुआवजा मिले और घर-जमीन से बेदखली की कार्रवाई पर सरकार दोबारा विचार करे।” भूमि अधिग्रहण के लिए RFCTLARR Act, 2013 के तहत मुआवजा तय किया गया है। ग्रामीण क्षेत्र में संबंधित मौजा के सरकारी सर्किल रेट के आधार पर वैधानिक गुणांक और सॉलेशियम को जोड़कर मुआवजा तय किया गया है। प्रशासन के अनुसार संबंधित जमीन के लिए यह गणना सरकारी दर के चार गुना के आधार पर की गई है। जमीन के प्रकार और प्लॉट के हिसाब से दर अलग है। उपलब्ध प्रशासनिक गणना के अनुसार औसतन करीब 1.5 लाख से 2.5 लाख रुपये प्रति कट्ठा तक मुआवजा बैठ रहा है। कई रैयतों के खातों में आरटीजीएस के जरिए राशि भेजी जा चुकी है। वहीं कुछ किसान कम दर का हवाला देकर भुगतान लेने से इनकार कर रहे हैं। किसान कह रहे- बाजार में जमीन इससे कई गुना महंगी किसानों की आपत्ति सरकारी गणना से है। मधुबन के ग्रामीण धीरेंद्र ने कहा- “हमारे विरोध के बावजूद प्रशासन ने खेत में लगी फसल बर्बाद कर दी। यह सिर्फ खेत की फसल नहीं थी, इसी से हमारे परिवार का खाना और बच्चों का भविष्य जुड़ा था। फसल तैयार होने से पहले उसे बर्बाद कर दिया गया। हमारा सवाल है कि जमीन लेनी ही थी तो खड़ी फसल का मुआवजा और हमारे नुकसान की भरपाई कौन करेगा?” उनका कहना है कि जिस जमीन का बाजार मूल्य करीब 4 से 6 लाख रुपये प्रति कट्ठा है, उसका मुआवजा इससे काफी कम बन रहा है। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी किसान की 10 कट्ठा जमीन का सरकारी अवार्ड 2 लाख रुपये प्रति कट्ठा तय होता है तो उसे कुल 20 लाख रुपये मिलेंगे। किसान इसी 10 कट्ठा जमीन के लिए 4 से 6 लाख रुपये प्रति कट्ठा के हिसाब से 40 से 60 लाख रुपये की मांग कर रहे हैं। किसानों की एक और बड़ी मांग है कि जमीन जाने के बाद परिवार के कम से कम एक सदस्य को रोजगार दिया जाए। कुछ ग्रामीण परिवार के एक सदस्य को नौकरी या 5 लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता की मांग कर रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि वह मनमाने तरीके से बाजार भाव तय कर मुआवजा नहीं दे सकता। मुआवजा कानून और निर्धारित सरकारी दर के अनुसार ही दिया जा सकता है। सिर्फ जमीन नहीं, मकान और पेड़ का भी अलग मूल्यांकन कराया अधिग्रहित जमीन पर मौजूद दूसरी संपत्तियों का भी मूल्यांकन किया गया है। मकान और बोरिंग जैसी संरचनाओं का मूल्यांकन संबंधित तकनीकी विभागों से, पेड़ों का वन विभाग से और खड़ी फसल का मूल्यांकन संबंधित विभाग से कराया गया है। लेकिन सितंबर में विवाद तब और बढ़ गया जब अधिग्रहित जमीन पर लगी धान की खड़ी फसल हटाने के लिए प्रशासन ने जेसीबी चलवाई। प्रशासन का कहना है कि मुआवजा प्रक्रिया पूरी होने के बाद किसानों को अधिग्रहित जमीन पर खेती नहीं करने की चेतावनी दी गई थी। दूसरी ओर किसानों का आरोप है कि खड़ी फसल का उचित हर्जाना दिए बिना उसे नष्ट किया गया। यही मुद्दा अब गांव में मुआवजे के विवाद का एक और हिस्सा बन गया है। 65% से ज्यादा रैयतों को भुगतान, बाकी में विवाद भू-अर्जन कार्यालय के अनुसार 65 प्रतिशत से ज्यादा नामांकित रैयतों को अवार्ड राशि का भुगतान किया जा चुका है या राशि जिला कोषागार में जमा है। बाकी मामलों में स्वामित्व विवाद, परिवार के बीच जमीन का बंटवारा और मुआवजे की दर को लेकर आपत्तियां हैं। करीब 30 से 35 प्रतिशत रैयतों/परिवारों की आपत्तियां लंबित बताई जा रही हैं। इनमें कई मामले अतिरिक्त मुआवजे और जमीन के अधिग्रहण से जुड़ी आपत्तियों के हैं। स्थानीय रैयतों की ओर से पटना हाईकोर्ट के अलावा डीसीएलआर और जिलाधिकारी की अदालत में भी कई मामले दायर किए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ऐसे व्यक्तिगत और सामूहिक मामलों की संख्या 40 से अधिक है। घर खाली कराने का नोटिस कब मिला? प्रशासन की ओर से प्रारंभिक अधिसूचना के साथ वर्ष 2024-25 में 60 दिनों की मोहलत का नोटिस जारी किया गया था। बाद में जमीन पर कब्जा लेने के लिए हाल के महीनों में 15 से 30 दिनों का अंतिम दखल-दहानी नोटिस भी दिया गया। इसके बाद सितंबर 2026 में प्रशासनिक बल के साथ निर्माण कार्य आगे बढ़ाया गया। जलाशय के 151 एकड़ वाले कोर एरिया को खाली कराने के दौरान जेसीबी और बुलडोजर से खेतों में लगी फसल हटाई गई। कुछ कच्चे-पक्के आशियाने और फार्म स्ट्रक्चर भी हटाए गए हैं। गांव अभी पूरी तरह खाली नहीं अभी मधुबन और मोतनाजे की पूरी आबादी को हटाया नहीं गया है। अधिग्रहित 151 एकड़ के कोर क्षेत्र से किसानों को बेदखल किया जा चुका है, लेकिन दोनों गांवों के मुख्य रिहायशी हिस्सों में अधिकांश परिवार अभी रह रहे हैं। इसका कारण यह है कि पुनर्वास और पूर्ण विस्थापन की प्रक्रिया अभी चरणबद्ध तरीके से चल रही है। नदी के दूसरी तरफ बनेगा मॉडल विलेज प्रशासन ने प्रभावित परिवारों के लिए मॉडल पुनर्वास गांव बनाने की योजना तैयार की है। इसके लिए नारदीगंज प्रखंड में जलाशय के पास सुरक्षित सरकारी/अधिग्रहित जमीन चिन्हित की गई है। प्रस्तावित मॉडल विलेज में सड़क, बिजली, पानी और सामुदायिक भवन जैसी सुविधाएं देने की योजना है। इसे तैयार होने में करीब एक से डेढ़ साल लगने का अनुमान है। पुनर्वास नीति और RFCTLARR Act के प्रावधानों के तहत विस्थापित परिवारों को आवास सहायता, पुनर्वास भत्ता, पशुशाला या दुकान के नुकसान का मुआवजा और परिवहन भत्ता जैसी सहायता देने का प्रावधान है। नौकरी देना मौजूदा व्यवस्था के तहत संभव नहीं ग्रामीणों की मांग है कि जमीन जाने के बाद परिवार के कम से कम एक सदस्य को नौकरी मिले। प्रशासन का कहना है कि आरएंडआर नीति के तहत मिलने वाले लाभ और कौशल विकास जैसी सुविधाएं दी जा सकती हैं, लेकिन सीधे नियमित सरकारी नौकरी देना मौजूदा व्यवस्था के तहत संभव नहीं है। यानी जमीन के बदले मुआवजे के साथ रोजगार की मांग अभी भी ग्रामीणों और प्रशासन के बीच एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है। काम 40 फीसदी से ज्यादा पूरा होने का दावा भूमि का भौतिक कब्जा मिलने के बाद जलाशय के निर्माण में मिट्टी की कटाई, बांध निर्माण और बेस लेयरिंग का काम तेजी से चल रहा है। उपलब्ध परियोजना विवरण के अनुसार करीब 40 प्रतिशत से ज्यादा काम पूरा हो चुका है। जल संसाधन विभाग जल्द से जल्द निर्माण पूरा कर जल भंडारण शुरू करना चाहता है। प्रशासन का लक्ष्य भूमि से जुड़े विवादों को सुलझाते हुए परियोजना को अगले दो से तीन वर्षों में पूरा करना है। “हमलोगों को बेवकूफ बनाया गया। पहले कहा गया कि आप सरकार को जितना देंगे, उससे कहीं ज्यादा सरकार आपको देगी। जमीन ले ली गई, लेकिन अब झुनझुना पकड़ा दिया गया। हम इस डैम का विरोध कर रहे हैं। उचित मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी मिले, तभी सरकार डैम बनाए।” नवादा के नारदीगंज प्रखंड के मधुबन गांव के रहने वाले धर्मेंद्र ने दैनिक भास्कर से बातचीत में ये बातें कहीं। मधुबन और मोतनाजे गांव में बन रहे जलाशय के लिए जमीन अधिग्रहण के बाद अब ग्रामीण मुआवजे को लेकर सवाल उठा रहे हैं। पिछले दिनों प्रशासन ने अधिग्रहित जमीन पर बुलडोजर चलाकर निर्माण का रास्ता साफ किया। इसके बाद सैकड़ों ग्रामीण मौके पर पहुंचकर विरोध करने लगे। आखिर यह जलाशय क्यों बनाया जा रहा है? इससे नवादा और आसपास के लोगों को क्या फायदा होगा? जिन किसानों की जमीन ली जा रही है, वे विरोध क्यों कर रहे हैं? उन्हें कितना मुआवजा मिला और वे कितना मांग रहे हैं? प्रशासन का क्या कहना है? जलाशय में पानी कहां से आएगा और इसका डायमेंशन कितना होगा? पढ़िए मधुबन जलाशय की पूरी ग्राउंड रिपोर्ट… नारदीगंज के मधुबन और मोतनाजे गांव में खेतों के बीच मिट्टी का एक लंबा बांध खड़ा किया जा रहा है। करीब 2.94 किलोमीटर लंबे इस बांध के पीछे 517 एकड़ में पानी जमा होगा। इसका नाम मधुबन जलाशय है। गंगाजल आपूर्ति योजना के फेज-दो, पार्ट-एक के तहत बन रहे इस जलाशय में 27 मिलियन क्यूबिक मीटर यानी 27 एमसीएम पानी जमा करने की क्षमता होगी। सरकार की योजना इस पानी को स्टोर कर नवादा और आसपास के शहरी व अर्ध-शहरी इलाकों तक पहुंचाने की है। परियोजना की अनुमानित लागत करीब 980.05 करोड़ रुपये है। जलाशय का मुख्य मकसद पेयजल उपलब्ध कराना है। सिंचाई के लिए सीधे पानी देने की योजना नहीं है, हालांकि जलाशय बनने से आसपास भूजल स्तर बढ़ने की उम्मीद है। यानी एक तरफ इलाके में आने वाले समय में पेयजल संकट दूर होने की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ इसी जलाशय के लिए जमीन देने वाले किसान मुआवजे और पुनर्वास को लेकर सवाल उठा रहे हैं। खेतों के बीच बन रहा 2.94 किमी का मिट्टी का बांध मधुबन जलाशय कोई पहाड़ी इलाके में बना ऊंचा बांध नहीं है। यह मैदानी इलाके में बनाया जा रहा ऑफ-स्ट्रीम स्टोरेज रिजर्वायर है। यानी गंगा के अतिरिक्त पानी को यहां लाकर जमा किया जाएगा। जलाशय को चारों तरफ से करीब 2.94 किलोमीटर लंबे मिट्टी के बांध से घेरा जा रहा है। बांध की ऊपरी चौड़ाई करीब 5 से 6 मीटर रखी जा रही है, ताकि निरीक्षण और दूसरे जरूरी काम के लिए वाहन चल सकें। जलाशय में एक बार में करीब 27 एमसीएम पानी जमा होगा। इस पानी को वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में शुद्ध करने के बाद पाइपलाइन के जरिए लोगों तक पहुंचाया जाना है। 3 से 4 लाख लोगों को पानी देने की योजना परियोजना के मुताबिक जलाशय की क्षमता नवादा शहर और आसपास के शहरी व अर्ध-शहरी इलाकों की करीब 3 से 4 लाख आबादी की जरूरत को ध्यान में रखकर तय की गई है। योजना के अनुसार गैर-मानसून महीनों में भी इस पानी का इस्तेमाल कर पेयजल की आपूर्ति जारी रखी जा सकेगी। परियोजना में 135 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के मानक के हिसाब से लंबे समय तक पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। यानी गंगा में बाढ़ का पानी कम होने के बाद भी लोगों के लिए पानी का इंतजाम बना रहे, इसी सोच के साथ यह जलाशय बनाया जा रहा है। 151 एकड़ जमीन पर शुरू हुआ काम, 435 एकड़ में असर का आकलन डैम के मुख्य हिस्से और मिट्टी के बांध के लिए 151 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया है। इसी जमीन पर अब निर्माण का काम चल रहा है। इसके अलावा सामाजिक प्रभाव के आकलन में करीब 435 एकड़ जमीन को परियोजना से प्रभावित होने वाले इलाके के तौर पर देखा गया है। इसमें आगे चलकर डैम के आसपास का हिस्सा, वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, पानी पहुंचाने के लिए पंपिंग व्यवस्था, आने-जाने का रास्ता और पुनर्वास के लिए जरूरी जमीन जैसी चीजें शामिल हैं। मधुबन और मोतनाजे गांव के लोग इस परियोजना से सीधे प्रभावित हो रहे हैं। यहां की जमीन डैम के डूब क्षेत्र और निर्माण के लिए ली जा रही है। 3 हजार परिवार प्रभावित होने का दावा ग्रामीण इलाकों में इस परियोजना को लेकर सबसे बड़ी चिंता विस्थापन की है। स्थानीय किसान महापंचायतों और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन के प्रारूप में करीब 3 हजार परिवारों के प्रभावित होने का दावा किया गया है। इस आंकड़े में केवल वे परिवार शामिल नहीं हैं जिनकी जमीन सीधे जा रही है, बल्कि ऐसे परिवार भी शामिल बताए गए हैं जिनकी खेती की जमीन चली गई या जिनकी आजीविका इन जमीनों पर निर्भर थी। हालांकि, 3 हजार परिवारों के पूर्ण रूप से विस्थापित होने की बात नहीं है। मधुबन और मोतनाजे के मुख्य रिहायशी हिस्सों में अभी भी ज्यादातर परिवार रह रहे हैं। पूर्ण विस्थापन और पुनर्वास की प्रक्रिया अभी चरणबद्ध तरीके से चल रही है। किसानों को कितना मुआवजा मिल रहा है? यही वह सवाल है जिस पर गांव में सबसे ज्यादा नाराजगी है। ग्रामीण प्रेम मांझी ने कहा कि “हमने सरकार का समर्थन इस उम्मीद में किया था कि हमारे घर बेहतर होंगे और जीवन सुधरेगा। आज हालात ऐसे हैं कि हमारे घर और जमीन दोनों पर संकट खड़ा हो गया है। जमीन चली गई तो हम जाएंगे कहां और परिवार चलाएंगे कैसे? हमारी मांग सिर्फ इतनी है कि हमें जमीन का उचित मुआवजा मिले और घर-जमीन से बेदखली की कार्रवाई पर सरकार दोबारा विचार करे।” भूमि अधिग्रहण के लिए RFCTLARR Act, 2013 के तहत मुआवजा तय किया गया है। ग्रामीण क्षेत्र में संबंधित मौजा के सरकारी सर्किल रेट के आधार पर वैधानिक गुणांक और सॉलेशियम को जोड़कर मुआवजा तय किया गया है। प्रशासन के अनुसार संबंधित जमीन के लिए यह गणना सरकारी दर के चार गुना के आधार पर की गई है। जमीन के प्रकार और प्लॉट के हिसाब से दर अलग है। उपलब्ध प्रशासनिक गणना के अनुसार औसतन करीब 1.5 लाख से 2.5 लाख रुपये प्रति कट्ठा तक मुआवजा बैठ रहा है। कई रैयतों के खातों में आरटीजीएस के जरिए राशि भेजी जा चुकी है। वहीं कुछ किसान कम दर का हवाला देकर भुगतान लेने से इनकार कर रहे हैं। किसान कह रहे- बाजार में जमीन इससे कई गुना महंगी किसानों की आपत्ति सरकारी गणना से है। मधुबन के ग्रामीण धीरेंद्र ने कहा- “हमारे विरोध के बावजूद प्रशासन ने खेत में लगी फसल बर्बाद कर दी। यह सिर्फ खेत की फसल नहीं थी, इसी से हमारे परिवार का खाना और बच्चों का भविष्य जुड़ा था। फसल तैयार होने से पहले उसे बर्बाद कर दिया गया। हमारा सवाल है कि जमीन लेनी ही थी तो खड़ी फसल का मुआवजा और हमारे नुकसान की भरपाई कौन करेगा?” उनका कहना है कि जिस जमीन का बाजार मूल्य करीब 4 से 6 लाख रुपये प्रति कट्ठा है, उसका मुआवजा इससे काफी कम बन रहा है। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी किसान की 10 कट्ठा जमीन का सरकारी अवार्ड 2 लाख रुपये प्रति कट्ठा तय होता है तो उसे कुल 20 लाख रुपये मिलेंगे। किसान इसी 10 कट्ठा जमीन के लिए 4 से 6 लाख रुपये प्रति कट्ठा के हिसाब से 40 से 60 लाख रुपये की मांग कर रहे हैं। किसानों की एक और बड़ी मांग है कि जमीन जाने के बाद परिवार के कम से कम एक सदस्य को रोजगार दिया जाए। कुछ ग्रामीण परिवार के एक सदस्य को नौकरी या 5 लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता की मांग कर रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि वह मनमाने तरीके से बाजार भाव तय कर मुआवजा नहीं दे सकता। मुआवजा कानून और निर्धारित सरकारी दर के अनुसार ही दिया जा सकता है। सिर्फ जमीन नहीं, मकान और पेड़ का भी अलग मूल्यांकन कराया अधिग्रहित जमीन पर मौजूद दूसरी संपत्तियों का भी मूल्यांकन किया गया है। मकान और बोरिंग जैसी संरचनाओं का मूल्यांकन संबंधित तकनीकी विभागों से, पेड़ों का वन विभाग से और खड़ी फसल का मूल्यांकन संबंधित विभाग से कराया गया है। लेकिन सितंबर में विवाद तब और बढ़ गया जब अधिग्रहित जमीन पर लगी धान की खड़ी फसल हटाने के लिए प्रशासन ने जेसीबी चलवाई। प्रशासन का कहना है कि मुआवजा प्रक्रिया पूरी होने के बाद किसानों को अधिग्रहित जमीन पर खेती नहीं करने की चेतावनी दी गई थी। दूसरी ओर किसानों का आरोप है कि खड़ी फसल का उचित हर्जाना दिए बिना उसे नष्ट किया गया। यही मुद्दा अब गांव में मुआवजे के विवाद का एक और हिस्सा बन गया है। 65% से ज्यादा रैयतों को भुगतान, बाकी में विवाद भू-अर्जन कार्यालय के अनुसार 65 प्रतिशत से ज्यादा नामांकित रैयतों को अवार्ड राशि का भुगतान किया जा चुका है या राशि जिला कोषागार में जमा है। बाकी मामलों में स्वामित्व विवाद, परिवार के बीच जमीन का बंटवारा और मुआवजे की दर को लेकर आपत्तियां हैं। करीब 30 से 35 प्रतिशत रैयतों/परिवारों की आपत्तियां लंबित बताई जा रही हैं। इनमें कई मामले अतिरिक्त मुआवजे और जमीन के अधिग्रहण से जुड़ी आपत्तियों के हैं। स्थानीय रैयतों की ओर से पटना हाईकोर्ट के अलावा डीसीएलआर और जिलाधिकारी की अदालत में भी कई मामले दायर किए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ऐसे व्यक्तिगत और सामूहिक मामलों की संख्या 40 से अधिक है। घर खाली कराने का नोटिस कब मिला? प्रशासन की ओर से प्रारंभिक अधिसूचना के साथ वर्ष 2024-25 में 60 दिनों की मोहलत का नोटिस जारी किया गया था। बाद में जमीन पर कब्जा लेने के लिए हाल के महीनों में 15 से 30 दिनों का अंतिम दखल-दहानी नोटिस भी दिया गया। इसके बाद सितंबर 2026 में प्रशासनिक बल के साथ निर्माण कार्य आगे बढ़ाया गया। जलाशय के 151 एकड़ वाले कोर एरिया को खाली कराने के दौरान जेसीबी और बुलडोजर से खेतों में लगी फसल हटाई गई। कुछ कच्चे-पक्के आशियाने और फार्म स्ट्रक्चर भी हटाए गए हैं। गांव अभी पूरी तरह खाली नहीं अभी मधुबन और मोतनाजे की पूरी आबादी को हटाया नहीं गया है। अधिग्रहित 151 एकड़ के कोर क्षेत्र से किसानों को बेदखल किया जा चुका है, लेकिन दोनों गांवों के मुख्य रिहायशी हिस्सों में अधिकांश परिवार अभी रह रहे हैं। इसका कारण यह है कि पुनर्वास और पूर्ण विस्थापन की प्रक्रिया अभी चरणबद्ध तरीके से चल रही है। नदी के दूसरी तरफ बनेगा मॉडल विलेज प्रशासन ने प्रभावित परिवारों के लिए मॉडल पुनर्वास गांव बनाने की योजना तैयार की है। इसके लिए नारदीगंज प्रखंड में जलाशय के पास सुरक्षित सरकारी/अधिग्रहित जमीन चिन्हित की गई है। प्रस्तावित मॉडल विलेज में सड़क, बिजली, पानी और सामुदायिक भवन जैसी सुविधाएं देने की योजना है। इसे तैयार होने में करीब एक से डेढ़ साल लगने का अनुमान है। पुनर्वास नीति और RFCTLARR Act के प्रावधानों के तहत विस्थापित परिवारों को आवास सहायता, पुनर्वास भत्ता, पशुशाला या दुकान के नुकसान का मुआवजा और परिवहन भत्ता जैसी सहायता देने का प्रावधान है। नौकरी देना मौजूदा व्यवस्था के तहत संभव नहीं ग्रामीणों की मांग है कि जमीन जाने के बाद परिवार के कम से कम एक सदस्य को नौकरी मिले। प्रशासन का कहना है कि आरएंडआर नीति के तहत मिलने वाले लाभ और कौशल विकास जैसी सुविधाएं दी जा सकती हैं, लेकिन सीधे नियमित सरकारी नौकरी देना मौजूदा व्यवस्था के तहत संभव नहीं है। यानी जमीन के बदले मुआवजे के साथ रोजगार की मांग अभी भी ग्रामीणों और प्रशासन के बीच एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है। काम 40 फीसदी से ज्यादा पूरा होने का दावा भूमि का भौतिक कब्जा मिलने के बाद जलाशय के निर्माण में मिट्टी की कटाई, बांध निर्माण और बेस लेयरिंग का काम तेजी से चल रहा है। उपलब्ध परियोजना विवरण के अनुसार करीब 40 प्रतिशत से ज्यादा काम पूरा हो चुका है। जल संसाधन विभाग जल्द से जल्द निर्माण पूरा कर जल भंडारण शुरू करना चाहता है। प्रशासन का लक्ष्य भूमि से जुड़े विवादों को सुलझाते हुए परियोजना को अगले दो से तीन वर्षों में पूरा करना है।  

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