काशी की देवदीपावली को एक छोटे आयोजन से वैश्विक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले वागीशदत्त मिश्र का रविवार रात निधन हो गया। करीब 57 वर्षीय वागीशदत्त पिछले कुछ दिनों से बीमार थे। रविवार शाम तबीयत बिगड़ने पर परिजन उन्हें कबीरचौरा अस्पताल ले गए, जहां उपचार के दौरान रात करीब नौ बजे उनकी हालत अचानक गंभीर हो गई। परिजनों के अनुसार, उन्हें दौरा पड़ा और कुछ झटके आने के बाद उनका शरीर शांत हो गया। वागीशदत्त के निधन की खबर से काशी के सामाजिक और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनके शुभचिंतकों को पहले तो इस खबर पर विश्वास ही नहीं हुआ। लोग एक-दूसरे से संपर्क कर सूचना की पुष्टि करते रहे। खास बात यह है कि अस्वस्थ होने के बावजूद वह आगामी देवदीपावली की तैयारियों में जुटे हुए थे। उन्होंने हाल ही में आयोजन की विभिन्न उप समितियों के पदाधिकारियों के साथ ऑनलाइन बैठक की थी। तबीयत खराब होने के कारण वह अधिक बोल नहीं पा रहे थे, लेकिन पूरी बैठक में जुड़े रहे। उन्होंने उप समितियों की समस्याओं की सूची तैयार कर जिला प्रशासन को जल्द उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया था। पांच घाटों से शुरू हुआ विस्तार का सफर काशी में अस्सी के दशक में पंचगंगा घाट पर देवदीपावली के आयोजन की शुरुआत के बाद वागीशदत्त मिश्र किशोरावस्था से ही इस उत्सव के विस्तार में जुट गए थे। अपने कुछ करीबी मित्रों के साथ उन्होंने पांच घाटों तक आयोजन का विस्तार कराया। इसके बाद उन्होंने पूरी प्रतिबद्धता के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ाया। उनके प्रयासों से वर्ष 2000 से काशी के कुंडों और तालाबों पर भी देवदीपावली का आयोजन शुरू हुआ। इससे यह उत्सव केवल गंगा के घाटों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान का व्यापक हिस्सा बनता गया। गंगोत्री से गंगा सागर तक पहुंचाया उत्सव देवदीपावली को व्यापक पहचान दिलाने के लिए वागीशदत्त मिश्र ने करीब एक दशक पहले गंगोत्री से गंगा सागर तक यात्रा की। इस दौरान गंगा किनारे बसे 52 शहरों में देवदीपावली के आयोजन की शुरुआत कराने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयासों ने काशी की इस परंपरा को देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने में मदद की। सरकारी फरमानों के खिलाफ भी रहे मुखर देवदीपावली के आयोजन को लेकर जब भी ऐसे सरकारी आदेश जारी हुए, जिन्हें वह उत्सव के हित में नहीं मानते थे, वागीशदत्त मजबूती से उनके विरोध में खड़े हुए। उन्होंने जनसहयोग के जरिए आयोजन की परंपरा और स्वरूप को बचाए रखने का प्रयास किया। घर-घर जाकर तेल, बाती और दीये जुटाने से लेकर आयोजन की व्यवस्थाओं तक, उनकी सक्रियता इस उत्सव की पहचान बन गई थी।

