भाकपा माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने आज पटना में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए बिहार में सामंती उत्पीड़न, केंद्र सरकार की नीतियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयानों को लेकर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि बिहार के दिनारा में चंदेश्वर चौधरी के साथ हुई घटना के बाद उनके परिजनों से अब तक सरकार का कोई प्रतिनिधि मिलने नहीं पहुंचा है। यह सरकार की संवेदनहीनता और गरीबों के प्रति उसके रवैये को दर्शाता है। चंदेश्वर चौधरी के परिजन से सरकार के प्रतिनिधि के नहीं मिलने पर सवाल दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि दिनारा में चंदेश्वर चौधरी के परिजनों से अब तक सरकार की ओर से किसी प्रतिनिधि का मिलना बेहद गंभीर विषय है। उन्होंने बिहार में हो रहे सामंती उत्पीड़न की निंदा करते हुए कहा कि गरीब और वंचित तबके के लोगों के साथ होने वाली घटनाओं को सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का रवैया पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदनशील नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी घटना के बाद पीड़ित परिवार से मिलकर उसकी समस्याएं सुनना और उसे न्याय का भरोसा देना सरकार की जिम्मेदारी है। ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर प्रधानमंत्री पर निशाना भाकपा माले महासचिव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयान पर भी कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इससे पहले राजनीतिक विरोधियों और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वालों के लिए ‘अर्बन नक्सल’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और ‘एंटी-नेशनल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। अब ‘दिमागी नक्सल’ जैसा नया शब्द सामने आया है। उन्होंने कहा कि इस तरह के शब्दों के जरिए उन लोगों को निशाना बनाया जा रहा है जो सरकार से सवाल करते हैं, अपने अधिकारों की मांग करते हैं और सरकारी नीतियों पर अपनी राय रखते हैं। मनरेगा जैसे कानूनों को लेकर उठाया सवाल दीपांकर भट्टाचार्य ने प्रधानमंत्री के उस बयान पर सवाल उठाया, जिसमें यूपीए सरकार के समय नीति-निर्माण में माओवादी सोच वाले लोगों के प्रभाव की बात कही गई थी। उन्होंने पूछा कि अगर उस दौर में बनाई गई नीतियों को माओवादी सोच से प्रभावित माना जाता है तो क्या मनरेगा जैसे कानून भी उसी सोच का परिणाम हैं? उन्होंने कहा कि मनरेगा ने ग्रामीण गरीबों और मजदूरों को रोजगार और अधिकार देने का काम किया है। जनता के अधिकारों और कल्याण के लिए बनाए गए कानूनों को ‘माओवादी सोच’ से जोड़ना सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों की अवधारणा पर सवाल खड़ा करता है। ‘क्या दिमाग-मुक्त भारत बनाना चाहते हैं?’ माले महासचिव ने प्रधानमंत्री की राजनीति पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि ऐसा संदेश दिया जा रहा है कि लोग अपने दिमाग से सवाल न करें, सरकार से सवाल न पूछें और केवल सरकार का समर्थन करते रहें। उन्होंने सवाल किया कि कांग्रेस-मुक्त भारत का नारा देने के बाद क्या प्रधानमंत्री अब ‘दिमाग-मुक्त भारत’ बनाना चाहते हैं? उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना नागरिकों का अधिकार है और इस अधिकार को किसी भी तरह से दबाया नहीं जाना चाहिए। Gen Z को बदनाम करने का लगाया आरोप दीपांकर भट्टाचार्य ने देश के युवाओं, खासकर Gen Z को लेकर दिए जा रहे बयानों पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि आज देश के युवा रोजगार, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था, लोकतंत्र और अपने भविष्य को लेकर सवाल पूछ रहे हैं। उन्होंने कहा कि युवाओं के सवालों का जवाब देने के बजाय उन्हें बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। यह सरकार की कमजोरी को दिखाता है। युवाओं को उनकी समस्याओं का समाधान चाहिए, न कि उन्हें किसी विशेष राजनीतिक या वैचारिक श्रेणी में डालकर बदनाम किया जाए। बेरोजगारी, शिक्षा और महंगाई पर सरकार को घेरा माले महासचिव ने कहा कि प्रधानमंत्री के भाषणों में देश की वास्तविक समस्याओं का ठोस समाधान दिखाई नहीं देता। उन्होंने बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली, महंगाई और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि देश की जनता को सरकार से भरोसा और समाधान की उम्मीद है। लेकिन यदि सवाल पूछने वालों को डराया या बदनाम किया जाएगा तो इससे लोकतंत्र मजबूत होने के बजाय कमजोर होगा। ‘सवाल पूछना अपराध नहीं’ दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है। असहमति को देशद्रोह, आंदोलन को नक्सलवाद और सवाल पूछने वाले युवाओं को ‘दिमागी नक्सल’ कहना लोकतांत्रिक परंपरा के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और उनसे जवाब मांगना नागरिकों का अधिकार है। उन्होंने कहा कि युवाओं को डराया नहीं जा सकता और वे अपने अधिकारों, रोजगार, शिक्षा और बेहतर भविष्य के लिए सवाल उठाते रहेंगे। भाकपा माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने आज पटना में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए बिहार में सामंती उत्पीड़न, केंद्र सरकार की नीतियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयानों को लेकर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि बिहार के दिनारा में चंदेश्वर चौधरी के साथ हुई घटना के बाद उनके परिजनों से अब तक सरकार का कोई प्रतिनिधि मिलने नहीं पहुंचा है। यह सरकार की संवेदनहीनता और गरीबों के प्रति उसके रवैये को दर्शाता है। चंदेश्वर चौधरी के परिजन से सरकार के प्रतिनिधि के नहीं मिलने पर सवाल दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि दिनारा में चंदेश्वर चौधरी के परिजनों से अब तक सरकार की ओर से किसी प्रतिनिधि का मिलना बेहद गंभीर विषय है। उन्होंने बिहार में हो रहे सामंती उत्पीड़न की निंदा करते हुए कहा कि गरीब और वंचित तबके के लोगों के साथ होने वाली घटनाओं को सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का रवैया पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदनशील नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी घटना के बाद पीड़ित परिवार से मिलकर उसकी समस्याएं सुनना और उसे न्याय का भरोसा देना सरकार की जिम्मेदारी है। ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर प्रधानमंत्री पर निशाना भाकपा माले महासचिव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयान पर भी कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इससे पहले राजनीतिक विरोधियों और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वालों के लिए ‘अर्बन नक्सल’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और ‘एंटी-नेशनल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। अब ‘दिमागी नक्सल’ जैसा नया शब्द सामने आया है। उन्होंने कहा कि इस तरह के शब्दों के जरिए उन लोगों को निशाना बनाया जा रहा है जो सरकार से सवाल करते हैं, अपने अधिकारों की मांग करते हैं और सरकारी नीतियों पर अपनी राय रखते हैं। मनरेगा जैसे कानूनों को लेकर उठाया सवाल दीपांकर भट्टाचार्य ने प्रधानमंत्री के उस बयान पर सवाल उठाया, जिसमें यूपीए सरकार के समय नीति-निर्माण में माओवादी सोच वाले लोगों के प्रभाव की बात कही गई थी। उन्होंने पूछा कि अगर उस दौर में बनाई गई नीतियों को माओवादी सोच से प्रभावित माना जाता है तो क्या मनरेगा जैसे कानून भी उसी सोच का परिणाम हैं? उन्होंने कहा कि मनरेगा ने ग्रामीण गरीबों और मजदूरों को रोजगार और अधिकार देने का काम किया है। जनता के अधिकारों और कल्याण के लिए बनाए गए कानूनों को ‘माओवादी सोच’ से जोड़ना सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों की अवधारणा पर सवाल खड़ा करता है। ‘क्या दिमाग-मुक्त भारत बनाना चाहते हैं?’ माले महासचिव ने प्रधानमंत्री की राजनीति पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि ऐसा संदेश दिया जा रहा है कि लोग अपने दिमाग से सवाल न करें, सरकार से सवाल न पूछें और केवल सरकार का समर्थन करते रहें। उन्होंने सवाल किया कि कांग्रेस-मुक्त भारत का नारा देने के बाद क्या प्रधानमंत्री अब ‘दिमाग-मुक्त भारत’ बनाना चाहते हैं? उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना नागरिकों का अधिकार है और इस अधिकार को किसी भी तरह से दबाया नहीं जाना चाहिए। Gen Z को बदनाम करने का लगाया आरोप दीपांकर भट्टाचार्य ने देश के युवाओं, खासकर Gen Z को लेकर दिए जा रहे बयानों पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि आज देश के युवा रोजगार, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था, लोकतंत्र और अपने भविष्य को लेकर सवाल पूछ रहे हैं। उन्होंने कहा कि युवाओं के सवालों का जवाब देने के बजाय उन्हें बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। यह सरकार की कमजोरी को दिखाता है। युवाओं को उनकी समस्याओं का समाधान चाहिए, न कि उन्हें किसी विशेष राजनीतिक या वैचारिक श्रेणी में डालकर बदनाम किया जाए। बेरोजगारी, शिक्षा और महंगाई पर सरकार को घेरा माले महासचिव ने कहा कि प्रधानमंत्री के भाषणों में देश की वास्तविक समस्याओं का ठोस समाधान दिखाई नहीं देता। उन्होंने बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली, महंगाई और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि देश की जनता को सरकार से भरोसा और समाधान की उम्मीद है। लेकिन यदि सवाल पूछने वालों को डराया या बदनाम किया जाएगा तो इससे लोकतंत्र मजबूत होने के बजाय कमजोर होगा। ‘सवाल पूछना अपराध नहीं’ दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है। असहमति को देशद्रोह, आंदोलन को नक्सलवाद और सवाल पूछने वाले युवाओं को ‘दिमागी नक्सल’ कहना लोकतांत्रिक परंपरा के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और उनसे जवाब मांगना नागरिकों का अधिकार है। उन्होंने कहा कि युवाओं को डराया नहीं जा सकता और वे अपने अधिकारों, रोजगार, शिक्षा और बेहतर भविष्य के लिए सवाल उठाते रहेंगे।

