मंदसौर में दशहरे पर मंगलवार को रावण दहन से पहले उससे माफी मांगने की परंपरा निभाई गई। खानपुरा में रावण की 41 फीट ऊंची प्रतिमा पर सुबह से शाम तक पूजा-अर्चना हुई। बड़ी संख्या में लोग दर्शन करने पहुंचे। उन्होंने शहर की खुशहाली, बीमारियों से मुक्ति और प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा की कामना की। देशभर में दशहरे पर रावण दहन किया जाता है, लेकिन मंदसौर में नामदेव समाज रावण को अपना दामाद मानता है। समाज की मान्यता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी उनकी बेटी हैं। इसी वजह से मंदसौर को रावण का ससुराल माना जाता है। समाज के लोग रावण का दामाद की तरह सम्मान करते हैं और उसके वध से पहले उससे माफी मांगते हैं। वध से पहले कहते हैं- नाराज मत होना दशहरे की शाम भगवान राम की सेना ढोल-धमाकों के साथ रावण की प्रतिमा के सामने पहुंची। वध से पहले समाज के लोगों ने रावण से कहा कि वे भगवान राम की सेना के साथ उसका वध करने आए हैं। इसलिए वह नाराज न हो और अपना आशीर्वाद बनाए रखे। यह परंपरा दामाद के प्रति सम्मान और आस्था से जुड़ी है। समाज की महिलाएं भी प्रतिमा के सामने से गुजरते समय घूंघट निकालती हैं। दाहिने पैर में धागा बांधने की मान्यता स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण की प्रतिमा के दाहिने पैर में धागा बांधने से बीमारियां और दूसरी बाधाएं दूर होती हैं। खासकर बुखार आने पर धागा बांधने की परंपरा प्रचलित है। लोग अपनी मन्नतें लेकर प्रतिमा के दर्शन करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। सैकड़ों साल पुरानी बताई जाती है प्रतिमा नामदेव समाज के अध्यक्ष अशोक बघेरवाल के अनुसार, खानपुरा में स्थापित रावण की प्रतिमा सैकड़ों साल पुरानी है। उनके मुताबिक, यह प्रतिमा समाज की धार्मिक आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का प्रतीक है। यही वजह है कि दशहरे पर यहां रावण की पूजा की जाती है और वध से पहले उससे माफी मांगकर आशीर्वाद लेने की परंपरा निभाई जाती है।

