पंचकूला की चंडी मंदिर स्थित सशस्त्र सेना ट्रिब्यूनल (AFT) की रीजनल बेंच ने 62 साल पुराने पेंशन विवाद में मृत सैनिक की विधवा के पक्ष में फैसला सुनाया है। दादरी के फोगाट गांव निवासी 85 वर्षीय ब्रह्मा देवी ने पति चांदराम के निधन के बाद पेंशन के लिए सेना के अधिकारियों को लेटर लिखा था। दावा खारिज होने पर उन्होंने 2021 में AFT में याचिका दायर की। दरअसल, सेना ने चांदराम की सेवा अवधि 15 साल से कम मानी थी, इसलिए परिवार को पेंशन नहीं मिली। ब्रह्मा देवी का दावा था कि चांदराम ने सेकेंड वर्ल्ड वॉर के दौरान 4 साल 2 महीने 17 दिन सेवा की थी। अन्य सेवाओं को मिलाकर उनकी कुल सेवा 16 साल थी। पांच साल की कानूनी लड़ाई के बाद AFT ने संबंधित अधिकारियों को ब्रह्मा देवी की पेंशन तय करने के निर्देश दिए हैं। परिवार के मुताबिक, चांदराम को सेकेंड वर्ल्ड वॉर के दौरान मेडल मिला था और तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने सांवड़ गांव में परिवार को साढ़े 12 एकड़ जमीन अलॉट की थी। 1954 में चांदराम सेवामुक्त हुए थे। इसके बाद परिवार कई बार पेंशन के लिए अधिकारियों से मिला, लेकिन शॉर्ट सर्विस बताकर मांग खारिज होती रही। ब्रह्मा देवी के सात बेटे और दो बेटियां हैं। तीन बेटे सेना में रहे, जबकि चार खेती करते हैं। बेटे सतप्रकाश का कहना है कि अब 62 साल बाद परिवार को पेंशन को लेकर राहत मिली है। चार पॉइंट में समझिए सैनिक चांदराम की कहानी… अब जानिए वो वजह, जिससे चांदराम की पुरानी लड़ाई जीत गई… 1941 में सेना में भर्ती हुए थे चांदराम: चांदराम 16 जून 1941 को सेना में भर्ती हुए थे। 5 मई 1947 को उन्हें पहली बार सेवा से मुक्त किया गया। इसके बाद 21 दिसंबर 1948 को वे आर्मी ऑर्डनेंस कोर में फिर भर्ती हुए और दिसंबर 1954 में सेवा से मुक्त हुए। दोनों सेवाओं को मिलाकर उनकी सामान्य सैन्य सेवा 11 साल से ज्यादा थी। वर्ल्ड वॉर की सेवा दोगुनी जोड़ी गई: चांदराम ने 16 जून 1941 से 2 सितंबर 1945 तक द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेवा की। यह अवधि 4 साल 2 महीने 17 दिन थी। 30 अप्रैल 1951 के भारत सरकार के नियम के अनुसार युद्ध के दौरान की इस सेवा को पेंशन के लिए दोगुना गिना गया। इस तरह वर्ल्ड वॉर की सेवा 8 साल 5 महीने 4 दिन मानी गई। बाकी सेवाएं जोड़ने पर उनकी कुल सेवा 16 साल 18 दिन हो गई, जबकि पेंशन के लिए 15 साल की सेवा जरूरी थी। सेना ने सिर्फ 5 साल 327 दिन की सेवा मानी: सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, चांदराम ने 21 दिसंबर 1948 से दिसंबर 1954 तक ही सेवा की थी। इस हिसाब से उनकी सेवा 5 साल 327 दिन थी, जो पेंशन के लिए जरूरी 15 साल से कम थी। पहली सेवा का रिकॉर्ड भी सही माना: AFT ने आदेश में कहा कि सेना ने चांदराम की पहली सेवा पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। उनकी पत्नी ब्रह्मा ने जाट रेजिमेंट का 14 अप्रैल 2026 का रिकॉर्ड भी पेश किया। इसमें 16 जून 1941 से 5 मई 1947 तक चांदराम की सेवा दर्ज थी। ट्रिब्यूनल ने इस रिकॉर्ड को सेना का आधिकारिक रिकॉर्ड माना और पहली सेवा को भी मान्य कर दिया। जिसके बाद पेंशन का रास्ता साफ हुआ। 3 साल का एरियर और आजीवन पेंशन ब्रह्मा ने आवेदन में 6 दिसंबर 1954 से 2 दिसंबर 1992 तक पति की सेवा पेंशन का पूरा बकाया और इसके बाद फैमिली पेंशन मांगी थी। साथ ही 18% सालाना ब्याज की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने इतने पुराने दावे के कारण पूरा एरियर देने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के Union of India Others Vs. Tarsem Singh मामले में 13 अगस्त 2008 के फैसले के आधार पर एरियर को 3 साल तक सीमित रखा।

