जांच की दरकार… सांसद नि​िध से िमली एंबुलेंस का नौ साल बाद भी निबंधन नहीं

जांच की दरकार… सांसद नि​िध से िमली एंबुलेंस का नौ साल बाद भी निबंधन नहीं

भास्कर न्यूज|गुमला गुमला सदर अस्पताल में मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था है। अस्पताल परिसर में संचालित कुछ एंबुलेंस की वैधता और रजिस्ट्रेशन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। पड़ताल में सामने आया है कि कुछ वाहनों पर प्राइवेट नंबर लगा है। इनका इस्तेमाल एंबुलेंस के रूप में किया जा रहा है। कुछ वाहन बिना स्थायी रजिस्ट्रेशन के टेम्परेरी नंबर के आधार पर संचालित हो रहे हैं। अस्पताल परिसर में ऐसे वाहन नजर आते हैं, जिन पर प्राइवेट सीरीज का नंबर दर्ज है। इन वाहनों से मरीजों को लाने-ले जाने का काम किया जा रहा है। सवाल यह है कि निजी नंबर वाले वाहन का व्यावसायिक इस्तेमाल किस अनुमति के आधार पर हो रहा है। सांसद नि​िध से अखिल भारतीय क्षत्रिय महासंघ को 29 जनवरी 2018 को एंबुलेंस उपलब्ध कराई गई थी। इसके बावजूद 9 वर्ष बीतने के बाद भी उसका रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ। एंबुलेंस भी जांच के घेरे में है। जानकारी के अनुसार रजिस्ट्रेशन नहीं होने के कारण इसे रद्द किया गया था। इसके बावजूद संचालन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यदि वाहन का वैध रजिस्ट्रेशन नहीं है तो मरीजों के परिवहन में इसका इस्तेमाल कैसे हो रहा है। यह जांच का विषय है। जिले में वैध कॉमर्शियल रजिस्ट्रेशन वाली एंबुलेंस की संख्या सीमित है। इसके बावजूद कई वाहन एंबुलेंस के रूप में चलते दिखाई देते हैं। कुछ वाहनों के संचालन में टेम्परेरी नंबर के इस्तेमाल की बात सामने आई है। ऐसे वाहनों के परमिट, फिटनेस और बीमा की जांच जरूरी है। पड़ताल में यह भी सामने आया है कि पुराने वाहन, जिनकी करीब 15 वर्ष की निर्धारित पंजीयन अवधि पूरी हो चुकी है, मामूली मरम्मत के बाद एंबुलेंस के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इन वाहनों पर ‘एंबुलेंस’ लिखकर इन्हें मरीजों के परिवहन में लगाए जाने की शिकायत है। ऐसे वाहनों की फिटनेस और सड़क पर चलने की वैधता की जांच जरूरी है। एंबुलेंस मरीजों की जिंदगी से जुड़ी सेवा है। बिना वैध रजिस्ट्रेशन, फिटनेस या आवश्यक व्यावसायिक अनुमति के वाहन मरीजों को ढो रहे हैं। दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी तय करना मुश्किल होगा। ऐसे में परिवहन विभाग और स्वास्थ्य विभाग को अस्पताल परिसर में संचालित सभी एंबुलेंस की जांच करनी चाहिए। ये भी जांच के घेरे में हैं। अस्पताल परिसर में कुल 16 निजी एंबुलेंस संचालित हो रही हैं। इनमें से सिर्फ 9 एंबुलेंस के कागजात अस्पताल प्रबंधन के पास जमा हैं। इसके बावजूद जमा कागजात की नियमित जांच नहीं होती। एंबुलेंस के प्रमाणपत्र, फिटनेस, मेंटेनेंस और प्रदूषण प्रमाणपत्र समेत जरूरी दस्तावेजों की जांच की व्यवस्था प्रभावी नहीं है। अस्पताल परिसर में निजी एंबुलेंस के संचालन के लिए अधिकृत रूप से कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। इसके बावजूद वाहनों का संचालन जारी है। मामले में अस्पताल प्रबंधन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। अस्पताल प्रबंधन की ओर से निजी एंबुलेंसों के दस्तावेज, फिटनेस और प्रदूषण प्रमाणपत्र की जांच के लिए जिला परिवहन पदाधिकारी से पत्राचार कर कार्रवाई मांगने की जानकारी नहीं है। ऐसे में एंबुलेंसों की स्थिति की स्वतंत्र जांच नहीं हो पा रही है। निजी एंबुलेंस मरीजों को अस्पताल से दूसरे अस्पताल या घर तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनके कागजात, फिटनेस और प्रदूषण प्रमाणपत्र की नियमित जांच जरूरी है। इससे मरीजों को असुरक्षित, या नियमों के विपरीत संचालित वाहनों से परेशानी नहीं होगी। भास्कर न्यूज|गुमला गुमला सदर अस्पताल में मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था है। अस्पताल परिसर में संचालित कुछ एंबुलेंस की वैधता और रजिस्ट्रेशन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। पड़ताल में सामने आया है कि कुछ वाहनों पर प्राइवेट नंबर लगा है। इनका इस्तेमाल एंबुलेंस के रूप में किया जा रहा है। कुछ वाहन बिना स्थायी रजिस्ट्रेशन के टेम्परेरी नंबर के आधार पर संचालित हो रहे हैं। अस्पताल परिसर में ऐसे वाहन नजर आते हैं, जिन पर प्राइवेट सीरीज का नंबर दर्ज है। इन वाहनों से मरीजों को लाने-ले जाने का काम किया जा रहा है। सवाल यह है कि निजी नंबर वाले वाहन का व्यावसायिक इस्तेमाल किस अनुमति के आधार पर हो रहा है। सांसद नि​िध से अखिल भारतीय क्षत्रिय महासंघ को 29 जनवरी 2018 को एंबुलेंस उपलब्ध कराई गई थी। इसके बावजूद 9 वर्ष बीतने के बाद भी उसका रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ। एंबुलेंस भी जांच के घेरे में है। जानकारी के अनुसार रजिस्ट्रेशन नहीं होने के कारण इसे रद्द किया गया था। इसके बावजूद संचालन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यदि वाहन का वैध रजिस्ट्रेशन नहीं है तो मरीजों के परिवहन में इसका इस्तेमाल कैसे हो रहा है। यह जांच का विषय है। जिले में वैध कॉमर्शियल रजिस्ट्रेशन वाली एंबुलेंस की संख्या सीमित है। इसके बावजूद कई वाहन एंबुलेंस के रूप में चलते दिखाई देते हैं। कुछ वाहनों के संचालन में टेम्परेरी नंबर के इस्तेमाल की बात सामने आई है। ऐसे वाहनों के परमिट, फिटनेस और बीमा की जांच जरूरी है। पड़ताल में यह भी सामने आया है कि पुराने वाहन, जिनकी करीब 15 वर्ष की निर्धारित पंजीयन अवधि पूरी हो चुकी है, मामूली मरम्मत के बाद एंबुलेंस के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इन वाहनों पर ‘एंबुलेंस’ लिखकर इन्हें मरीजों के परिवहन में लगाए जाने की शिकायत है। ऐसे वाहनों की फिटनेस और सड़क पर चलने की वैधता की जांच जरूरी है। एंबुलेंस मरीजों की जिंदगी से जुड़ी सेवा है। बिना वैध रजिस्ट्रेशन, फिटनेस या आवश्यक व्यावसायिक अनुमति के वाहन मरीजों को ढो रहे हैं। दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी तय करना मुश्किल होगा। ऐसे में परिवहन विभाग और स्वास्थ्य विभाग को अस्पताल परिसर में संचालित सभी एंबुलेंस की जांच करनी चाहिए। ये भी जांच के घेरे में हैं। अस्पताल परिसर में कुल 16 निजी एंबुलेंस संचालित हो रही हैं। इनमें से सिर्फ 9 एंबुलेंस के कागजात अस्पताल प्रबंधन के पास जमा हैं। इसके बावजूद जमा कागजात की नियमित जांच नहीं होती। एंबुलेंस के प्रमाणपत्र, फिटनेस, मेंटेनेंस और प्रदूषण प्रमाणपत्र समेत जरूरी दस्तावेजों की जांच की व्यवस्था प्रभावी नहीं है। अस्पताल परिसर में निजी एंबुलेंस के संचालन के लिए अधिकृत रूप से कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। इसके बावजूद वाहनों का संचालन जारी है। मामले में अस्पताल प्रबंधन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। अस्पताल प्रबंधन की ओर से निजी एंबुलेंसों के दस्तावेज, फिटनेस और प्रदूषण प्रमाणपत्र की जांच के लिए जिला परिवहन पदाधिकारी से पत्राचार कर कार्रवाई मांगने की जानकारी नहीं है। ऐसे में एंबुलेंसों की स्थिति की स्वतंत्र जांच नहीं हो पा रही है। निजी एंबुलेंस मरीजों को अस्पताल से दूसरे अस्पताल या घर तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनके कागजात, फिटनेस और प्रदूषण प्रमाणपत्र की नियमित जांच जरूरी है। इससे मरीजों को असुरक्षित, या नियमों के विपरीत संचालित वाहनों से परेशानी नहीं होगी।  

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