चाइनीज दीयों और इलेक्ट्रिक लाइटों ने छीनी कुम्हारों की रोजी-रोटी, लागत निकालना भी मुश्किल 2. 60-65 रुपए सैकड़ा बिक रहे कुल्हड़, पुश्तैनी कारोबार छोड़ने को मजबूर कुम्हार 3. दीपावली में चाइनीज लाइटों की चमक के बीच फीकी पड़ी कुम्हारों की कमाई 4. न ऑर्डर मिल रहा, न लागत निकल रही; पुश्तैनी कारोबार छोड़ने की नौबत 5. बिहार में 65 रुपए सैकड़ा कुल्हड़ बेच रहे कुम्हार, बंगाल में मिल रहे 100 रुपए 6. कुम्हारों की मांग- सरकार सस्ती मिट्टी दे, तभी बचेगा पुश्तैनी कारोबार
दीपावली में बाजार रंग-बिरंगी इलेक्ट्रिक लाइटों और चाइनीज दीयों से सज चुका है। इन लाइट्स की वजह से कुम्हारों को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कुम्हारों का कहना है कि ये हमारी पुश्तैनी कारोबार है, पर जितनी लागत है, वो भी नहीं पाती है। बंगाल में बंगाल में कुल्हड़ की कीमत करीब 100 रुपए प्रति सैकड़ा तक मिल जाती है, जबकि बिहार के कुम्हारों को कई बार 60 से 65 रुपए प्रति सैकड़ा की दर पर ही कुल्हड़ बेचने पड़ते हैं। स्थिति ऐसी हो गई है कि हमें पुश्तैनी काम छोड़ना पड़ रहा है, क्या करें ऑर्डर ही नहीं मिल रहा है। सरकार हमें सस्ती दर पर मिट्टी उपलब्ध करा दें तो बड़ी सहायता होगी। कुम्हार परिवारों का हाल जानने के लिए भास्कर रिपोर्टर जिला मुख्यालय से करीब 8 किलोमीटर दूर उजियारपुर प्रखंड के मालती बेदौलिया गांव पहुंचे। परिवार ने क्या कहा, पढ़िए रिपोर्ट… पहले कुछ तस्वीरें… मिट्टी के कारोबार से परिवार चलाना मुश्किल मालती गांव में कई परिवार मिट्टी के दीये, कुल्हड़ और मिट्टी के बर्तन बनाकर अपनी आजीविका चलाने की कोशिश कर रहे हैं। ग्रामीण अमरजीत पंडित ने कहा कि पहले दीपावली के मौके पर मिट्टी के दीयों और बर्तनों की इतनी मांग रहती थी कि पूरे परिवार को काम मिल जाता था। समय के साथ बाजार में इलेक्ट्रिक लाइट, चाइनीज दीए और दूसरे आधुनिक सजावटी सामान आ गए। इससे मिट्टी के दीयों की मांग लगातार कम होती गई। परेशानी सिर्फ मांग कम होने की नहीं है, बल्कि उत्पादन लागत भी लगातार बढ़ रही है। सुबह मिट्टी के दीये बनाते हैं और दोपहर में राजमिस्त्री का काम करते हैं। केवल मिट्टी के कारोबार से परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। इसी वजह से गांव के कई लोग दूसरे काम की तलाश में बाहर जा रहे हैं।
लॉकडाउन के बाद शुरू किया पुश्तैनी कारोबार गांव के विनोद पंडित बताते हैं कि उनके पिता भी मिट्टी के बर्तन बनाते थे। मुनाफा कम होने के कारण उन्हें प्रदेश जाना पड़ा। लॉकडाउन के दौरान वापस लौटे, फिर से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम शुरू किया। अब पूरा परिवार इस काम में लगा है, लेकिन बढ़ती लागत के कारण बचत नहीं हो पाती। अगर सरकार कुम्हारों को कम कीमत पर मिट्टी उपलब्ध कराने की व्यवस्था कर दे तो उनकी परेशानी कुछ कम हो सकती है।
BA पास राधा चला रही कारोबार गांव की महिला शिल्पकार राधा कुमारी भी मिट्टी के कारोबार से जुड़ी हैं। वह बताती हैं कि उनके पति पहले प्रदेश में रहते थे। लॉकडाउन के दौरान घर लौटे तो परिवार ने मिलकर दीये, कुल्हड़ और दूसरे सामान बनाने का काम शुरू किया। मैंने बीए तक पढ़ाई की है, लेकिन रोजगार के लिए पुश्तैनी कारोबार से जुड़ी हुई हूं। राधा के अनुसार गांव की 50 से अधिक महिलाएं अपने पति और परिवार के साथ मिट्टी के कारोबार में लगी हैं। पहले दीपावली और दूसरे पर्व-त्योहारों के मौसम में एक परिवार 50 हजार से एक लाख रुपए तक कमा लेता था। अब पूरे सीजन की कमाई घटकर करीब 15 से 20 हजार रुपए तक रह गई है। पहले परिवार के लोग दीपावली के दौरान एक लाख तक दीये बनाते थे। बिक्री भी हो जाती थी। अब 50 हजार दीये भी बिकना मुश्किल है।
सरकार से मोटर चालित चाक और सस्ती मिट्टी की मांग राधा बताती हैं कि सरकार की ओर से कुम्हारों को मोटर चालित चाक उपलब्ध कराने की बात कही गई थी, लेकिन उन्हें अब तक इसका लाभ नहीं मिला। कई कुम्हारों ने अपने पैसे से चाक खरीदा है। सरकार से मदद मिलने पर फिर से अपने पुश्तैनी काम को बेहतर तरीके से चला सकते हैं।
माटी कला बोर्ड नहीं बनने से भी परेशानी कुम्हार प्रजापति समन्वय समिति के जिला अध्यक्ष प्रमोद पंडित बताते हैं कि बिहार में लंबे समय से माटी कला बोर्ड के गठन की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक इसका गठन नहीं हुआ है। पड़ोसी राज्यों में माटी कला से जुड़े लोगों के लिए संस्थागत स्तर पर सुविधाएं उपलब्ध हैं, जबकि बिहार के कुम्हार अब भी अपने स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं।
प्रमोद पंडित के अनुसार यदि बिहार में माटी कला बोर्ड का गठन होता है तो कुम्हारों को कम कीमत पर मिट्टी, उपकरणों पर अनुदान और सस्ती दर पर ऋण जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं। इससे वे अपने कारोबार को आधुनिक तरीके से विकसित कर सकेंगे और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर भी बेहतर खर्च कर पाएंगे।
बंगाल में बाजार, यहां लागत ज्यादा कुम्हार समाज के लोगों का कहना है कि बंगाल में माटी कला से जुड़े लोगों को अपेक्षाकृत बेहतर बाजार और सुविधाएं मिलती हैं। वहां कई जगहों पर आज भी कुल्हड़ में चाय पीने का चलन है। इससे मिट्टी के बर्तनों की नियमित मांग बनी रहती है। बंगाल में कुल्हड़ की कीमत करीब 100 रुपए प्रति सैकड़ा तक मिल जाती है, जबकि बिहार के कुम्हारों को कई बार 60 से 65 रुपए प्रति सैकड़ा की दर पर ही कुल्हड़ बेचने पड़ते हैं। उत्पादन लागत बढ़ने और बिक्री मूल्य कम रहने से यहां मुनाफा बेहद कम बचता है। इसी वजह से गांव के कई कुम्हार काम की तलाश में बंगाल समेत दूसरे राज्यों की ओर चले गए हैं।
परंपरा बचाने के लिए बाजार और सरकारी मदद जरूरी मालती बेदौलिया के कुम्हारों की कहानी सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है। मिट्टी के दीये और बर्तन बनाने वाला यह पुश्तैनी हुनर आधुनिक बाजार, बढ़ती लागत और कम होती मांग के बीच संघर्ष कर रहा है। कुम्हारों का कहना है कि वे अपनी परंपरा छोड़ना नहीं चाहते, लेकिन केवल भावनाओं के सहारे परिवार नहीं चल सकता। उनकी मांग है कि सरकार मिट्टी की उपलब्धता आसान करे, आधुनिक उपकरण और प्रशिक्षण दे, सस्ता ऋण उपलब्ध कराए और बिहार में माटी कला बोर्ड का गठन करे। ताकि दीपावली पर दूसरों के घर रोशन करने वाले कुम्हारों के घरों में भी स्थायी रोशनी बनी रहे। चाइनीज दीयों और इलेक्ट्रिक लाइटों ने छीनी कुम्हारों की रोजी-रोटी, लागत निकालना भी मुश्किल 2. 60-65 रुपए सैकड़ा बिक रहे कुल्हड़, पुश्तैनी कारोबार छोड़ने को मजबूर कुम्हार 3. दीपावली में चाइनीज लाइटों की चमक के बीच फीकी पड़ी कुम्हारों की कमाई 4. न ऑर्डर मिल रहा, न लागत निकल रही; पुश्तैनी कारोबार छोड़ने की नौबत 5. बिहार में 65 रुपए सैकड़ा कुल्हड़ बेच रहे कुम्हार, बंगाल में मिल रहे 100 रुपए 6. कुम्हारों की मांग- सरकार सस्ती मिट्टी दे, तभी बचेगा पुश्तैनी कारोबार
दीपावली में बाजार रंग-बिरंगी इलेक्ट्रिक लाइटों और चाइनीज दीयों से सज चुका है। इन लाइट्स की वजह से कुम्हारों को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कुम्हारों का कहना है कि ये हमारी पुश्तैनी कारोबार है, पर जितनी लागत है, वो भी नहीं पाती है। बंगाल में बंगाल में कुल्हड़ की कीमत करीब 100 रुपए प्रति सैकड़ा तक मिल जाती है, जबकि बिहार के कुम्हारों को कई बार 60 से 65 रुपए प्रति सैकड़ा की दर पर ही कुल्हड़ बेचने पड़ते हैं। स्थिति ऐसी हो गई है कि हमें पुश्तैनी काम छोड़ना पड़ रहा है, क्या करें ऑर्डर ही नहीं मिल रहा है। सरकार हमें सस्ती दर पर मिट्टी उपलब्ध करा दें तो बड़ी सहायता होगी। कुम्हार परिवारों का हाल जानने के लिए भास्कर रिपोर्टर जिला मुख्यालय से करीब 8 किलोमीटर दूर उजियारपुर प्रखंड के मालती बेदौलिया गांव पहुंचे। परिवार ने क्या कहा, पढ़िए रिपोर्ट… पहले कुछ तस्वीरें… मिट्टी के कारोबार से परिवार चलाना मुश्किल मालती गांव में कई परिवार मिट्टी के दीये, कुल्हड़ और मिट्टी के बर्तन बनाकर अपनी आजीविका चलाने की कोशिश कर रहे हैं। ग्रामीण अमरजीत पंडित ने कहा कि पहले दीपावली के मौके पर मिट्टी के दीयों और बर्तनों की इतनी मांग रहती थी कि पूरे परिवार को काम मिल जाता था। समय के साथ बाजार में इलेक्ट्रिक लाइट, चाइनीज दीए और दूसरे आधुनिक सजावटी सामान आ गए। इससे मिट्टी के दीयों की मांग लगातार कम होती गई। परेशानी सिर्फ मांग कम होने की नहीं है, बल्कि उत्पादन लागत भी लगातार बढ़ रही है। सुबह मिट्टी के दीये बनाते हैं और दोपहर में राजमिस्त्री का काम करते हैं। केवल मिट्टी के कारोबार से परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। इसी वजह से गांव के कई लोग दूसरे काम की तलाश में बाहर जा रहे हैं।
लॉकडाउन के बाद शुरू किया पुश्तैनी कारोबार गांव के विनोद पंडित बताते हैं कि उनके पिता भी मिट्टी के बर्तन बनाते थे। मुनाफा कम होने के कारण उन्हें प्रदेश जाना पड़ा। लॉकडाउन के दौरान वापस लौटे, फिर से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम शुरू किया। अब पूरा परिवार इस काम में लगा है, लेकिन बढ़ती लागत के कारण बचत नहीं हो पाती। अगर सरकार कुम्हारों को कम कीमत पर मिट्टी उपलब्ध कराने की व्यवस्था कर दे तो उनकी परेशानी कुछ कम हो सकती है।
BA पास राधा चला रही कारोबार गांव की महिला शिल्पकार राधा कुमारी भी मिट्टी के कारोबार से जुड़ी हैं। वह बताती हैं कि उनके पति पहले प्रदेश में रहते थे। लॉकडाउन के दौरान घर लौटे तो परिवार ने मिलकर दीये, कुल्हड़ और दूसरे सामान बनाने का काम शुरू किया। मैंने बीए तक पढ़ाई की है, लेकिन रोजगार के लिए पुश्तैनी कारोबार से जुड़ी हुई हूं। राधा के अनुसार गांव की 50 से अधिक महिलाएं अपने पति और परिवार के साथ मिट्टी के कारोबार में लगी हैं। पहले दीपावली और दूसरे पर्व-त्योहारों के मौसम में एक परिवार 50 हजार से एक लाख रुपए तक कमा लेता था। अब पूरे सीजन की कमाई घटकर करीब 15 से 20 हजार रुपए तक रह गई है। पहले परिवार के लोग दीपावली के दौरान एक लाख तक दीये बनाते थे। बिक्री भी हो जाती थी। अब 50 हजार दीये भी बिकना मुश्किल है।
सरकार से मोटर चालित चाक और सस्ती मिट्टी की मांग राधा बताती हैं कि सरकार की ओर से कुम्हारों को मोटर चालित चाक उपलब्ध कराने की बात कही गई थी, लेकिन उन्हें अब तक इसका लाभ नहीं मिला। कई कुम्हारों ने अपने पैसे से चाक खरीदा है। सरकार से मदद मिलने पर फिर से अपने पुश्तैनी काम को बेहतर तरीके से चला सकते हैं।
माटी कला बोर्ड नहीं बनने से भी परेशानी कुम्हार प्रजापति समन्वय समिति के जिला अध्यक्ष प्रमोद पंडित बताते हैं कि बिहार में लंबे समय से माटी कला बोर्ड के गठन की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक इसका गठन नहीं हुआ है। पड़ोसी राज्यों में माटी कला से जुड़े लोगों के लिए संस्थागत स्तर पर सुविधाएं उपलब्ध हैं, जबकि बिहार के कुम्हार अब भी अपने स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं।
प्रमोद पंडित के अनुसार यदि बिहार में माटी कला बोर्ड का गठन होता है तो कुम्हारों को कम कीमत पर मिट्टी, उपकरणों पर अनुदान और सस्ती दर पर ऋण जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं। इससे वे अपने कारोबार को आधुनिक तरीके से विकसित कर सकेंगे और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर भी बेहतर खर्च कर पाएंगे।
बंगाल में बाजार, यहां लागत ज्यादा कुम्हार समाज के लोगों का कहना है कि बंगाल में माटी कला से जुड़े लोगों को अपेक्षाकृत बेहतर बाजार और सुविधाएं मिलती हैं। वहां कई जगहों पर आज भी कुल्हड़ में चाय पीने का चलन है। इससे मिट्टी के बर्तनों की नियमित मांग बनी रहती है। बंगाल में कुल्हड़ की कीमत करीब 100 रुपए प्रति सैकड़ा तक मिल जाती है, जबकि बिहार के कुम्हारों को कई बार 60 से 65 रुपए प्रति सैकड़ा की दर पर ही कुल्हड़ बेचने पड़ते हैं। उत्पादन लागत बढ़ने और बिक्री मूल्य कम रहने से यहां मुनाफा बेहद कम बचता है। इसी वजह से गांव के कई कुम्हार काम की तलाश में बंगाल समेत दूसरे राज्यों की ओर चले गए हैं।
परंपरा बचाने के लिए बाजार और सरकारी मदद जरूरी मालती बेदौलिया के कुम्हारों की कहानी सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है। मिट्टी के दीये और बर्तन बनाने वाला यह पुश्तैनी हुनर आधुनिक बाजार, बढ़ती लागत और कम होती मांग के बीच संघर्ष कर रहा है। कुम्हारों का कहना है कि वे अपनी परंपरा छोड़ना नहीं चाहते, लेकिन केवल भावनाओं के सहारे परिवार नहीं चल सकता। उनकी मांग है कि सरकार मिट्टी की उपलब्धता आसान करे, आधुनिक उपकरण और प्रशिक्षण दे, सस्ता ऋण उपलब्ध कराए और बिहार में माटी कला बोर्ड का गठन करे। ताकि दीपावली पर दूसरों के घर रोशन करने वाले कुम्हारों के घरों में भी स्थायी रोशनी बनी रहे।

