ग्रीन इंडिया मिशन:14 लाख हेक्टेयर में जंगल बढ़ाने थे, 1.1 लाख में ही रोप पाए पौधे

ग्रीन इंडिया मिशन:14 लाख हेक्टेयर में जंगल बढ़ाने थे, 1.1 लाख में ही रोप पाए पौधे

देश को हराभरा बनाने और जंगलों की कार्बन सोखने की क्षमता बढ़ाने के लिए 2012 में शुरू किए गए ग्रीन इंडिया मिशन की 12 साल बाद भी तस्वीर निराशाजनक है। कैग के 16 राज्यों के ऑडिट में सामने आया कि 14 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र की गुणवत्ता सुधारने का लक्ष्य था, लेकिन काम सिर्फ 1.1 लाख हेक्टेयर में हुआ। यानी 92% लक्ष्य बाकी रहा। वन आवरण बढ़ाने का लक्ष्य भी 98% कम रह गया। मध्यप्रदेश में भी लक्ष्य का 7.91% ही हासिल हुआ। मिशन के तहत देश में 1,47,925.63 हेक्टेयर में वनीकरण हुआ, लेकिन 16 में सिर्फ मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ ने 2015-25 के दौरान कार्बन सीक्वेस्टरेशन का आकलन किया। कैग ने कहा कि ज्यादातर राज्यों ने कार्बन आकलन नहीं किया, इसलिए मिशन का जलवायु परिवर्तन पर वास्तविक असर मापा ही नहीं जा सका। मप्र में भी लक्ष्य से भारी दूरी
मप्र को 3 लाख 40 हजार 700 हेक्टेयर में काम का लक्ष्य मिला था, लेकिन उपलब्धि सिर्फ 26,939 हेक्टेयर रही। यानी लक्ष्य का 7.91% ही हासिल हुआ। कैग ने पाया कि प्रदेश में दूसरी योजनाओं के पहले से किए गए कामों को भी जीआईएम की उपलब्धि में जोड़ा गया। 2024 के निरीक्षण में छह वन प्रभागों की 13 साइट पर 20% से अधिक वन सघनता वाले क्षेत्रों में 6 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर 4 लाख पेड़ लगाने की बात सामने आई। मध्यप्रदेश में भी सिर्फ 7 प्रतिशत लक्ष्य ही पूरा बड़वानी में 444 हेक्टेयर में काम शुरू बताया गया, लेकिन कैग की जांच में आरएफ-269 सहित अन्य साइट पर कई जगह हरियाली नहीं मिली। 68 हेक्टेयर की एक साइट पर कोई काम ही नहीं मिला। 3.5 करोड़ कार्बन आकलन पर खर्च पर सिस्टम बेकार मिशन के तहत 2030 तक 2.5 से 3 अरब टन सीओ2 इक्विवेलेंट कार्बन सिंक क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है। अक्टूबर 2015 में राज्यों को निर्देश दिए गए, लेकिन मार्च 2025 तक उन्होंने पालन ही नहीं किया। मप्र और छग ने कार्बन सोखने की मात्रा मापने के लिए घाटपुर और सोनहट में दो फ्लक्स टावर लगाए। दोनों पर करीब 3.5 करोड़ रु. खर्च हुए। 2020 में शुरू हुई व्यवस्था में सेंसर और अन्य तकनीकी संसाधनों की कमी के कारण सिस्टम बेकार पड़ा है। खुलासा: 14 समितियों ने बिना प्लान काम किया मप्र के ऑडिट में पता चला, 14 समितियों ने बिना प्लान ही काम किया। 8 संभागों में 70.67 करोड़ का भुगतान विभागीय स्तर पर ही कर दिया। 145 में से 5 समितियों ने ही सीए से ऑडिट कराया। कैग का निष्कर्ष : मिशन में हर स्तर पर निगरानी में कमियां रहीं। यह भी पता नहीं चल सका कि जीआईएम ने जलवायु परिवर्तन से निपटने में कितना योगदान दिया।

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